- 14 जुलाई पुण्यतिथि पर विशेष

रूह में समा जाने वाली कशिश भरी आवाज, जिसे सुनकर मदन मोहन साहब के बारे में जानने की उत्सुकता जाग उठती है। सेना में बंदूक थामने वाले हाथ जाने कब हारमोनियम पर संगीत रचाने लगे, यह पता ही न चला और देश के महान संगीतकारों में से एक मदन मोहन का नाम भी इस क्षेत्र में मील का पत्थर बन गया। 1950 से 1970 तक के तीन दशकों में जिनके गीतों की धूम रही, ऐसे रूहानी संगीत के अनूठे फनकार, गजल के शहजादे का पूरा नाम था मदन मोहन कोहली।
इराक के बगदाद में 25 जून 1924 को रायबहादुर चुन्नीलाल के घर मदन मोहन का जन्म हुआ। पिता रायबहादुर साहब इराकी सेना में एकाउंटेट जनरल थे। भारत आने के बाद रायबहादुर फिल्म व्यवसाय से जुड़ गए और फिल्मीस्तान जैसे मशहूर स्टूडियो में साझीदार बन गए थे। वे फिल्मी दुनिया के मिजाज को समझते थे, इसलिए मदन मोहन को सेना में भर्ती होने के लिए देहरादून भेज दिया। जहां सन् 1943 में वे लेफ्टीनेंट बन गए। सेना में नौकरी करते हुए मदन मोहन का स्थानांतरण दिल्ली हो गया। वहां उनका मन सेना के कार्य में नहीं लगा और संगीत की तरफ खिंचाव होने लगा। तब उन्होंने सेना छोड़कर लखनऊ आकाशवाणी में नौकरी कर ली, जहां सुरों की मलिका सुरैया भी उनके साथ गाती थी।
इसी दौरान उस्ताद अकबर अली खान, उस्ताद फैयाज खान, तलत मेहमूद और बेगम अख्तर जैसे नामी गिरामी फनकारों से उनकी मुलाकात हुई। अपनी विलक्षण संगीत प्रतिभा के दम पर मदन मोहन को ख्यातिलब्ध संगीतकारों सी. रामचंद्र, एस. डी. बर्मन, श्याम सुंदर के साथ सहायक के रूप में काम करने का मौका मिला। उसके बाद पहली बार सन् 1950 में देवेन्द्र गोयल द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आंखें‘ के लिए स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनकर अपनी धुनें दी। नए-नवेले संगीतकार मदनमोहन के साथ उस जमाने के मशहूर गायक मुकेश, मो. रफी, शमशाद बेगम, राज खोसला तो गाने को तैयार हो गए, लेकिन लता मंगेशकर ने इंकार कर दिया। तब ‘मेरी अटरिया पे कागा बोले‘ गीत उन्होंने मीना कपूर से गवाया। यहां से शुरू हुआ संगीत का सफर तो जैसे तीन दशक तक बिना सांस लिए लगातार चलता रहा। उसके बाद लता जी भी उनके संगीत की कायल हो गईं और आपकी नजरों ने समझा, मेरा साया साथ होगा, नैना बरसे, नैनों में बदरा छाए, माई री मैं कासे कहूं, अगर मुझसे मोहब्बत है, खेलो न मेरे दिल से, लग जा गले, न तुम बेवफा हो, वो भूली दास्तां, मैं तो तुम संग नैन मिलाके सहित लगभग 210 गाने मदन मोहन की धुनों पर गाए। तलत महमूद, मुकेश, शमशाद बेगम, मो. रफी, मन्नाडे, आशा भोंसले, गीता दत्त,
किशोर कुमार आदि गायकों के साथ मदन मोहन के संगीत का सफर तीन दशक तक लगातार चलता रहा। लेकिन लता मंगेशकर के साथ तो उनकी संगत जैसे ईश्वर द्वारा नियत की गई कोई रूहानी रचना थी। संगीतकार ओ. पी. नैयर ने कभी लता जी से गाना नहीं गवाया, लेकिन दोनों के बारे में उन्होंने कहा था कि जिस तरह देश को लता दोबारा मिलना मुश्किल है, ठीक उसी तरह मदन जी जैसे संगीतकार भी दोबारा शायद ही मिलें। संगीतकार एस. डी. बर्मन ने कहा था कि जैसा संगीत मदन मोहन ने फिल्म हीर-रांझा में दिया था, वे उसका आधा संगीत भी नहीं दे सकते थे। लता जी उन्हें ‘गजल का शहजादा‘ कहती थीं। हंसते जख्म फिल्म का गीत ‘आज सोचा...तो आंसू भर आए‘ गाते वक्त लता जी रो पड़ी थीं। गीतकार जयदेव ने कहा कि मदन मोहन जैसा संगीतकार दूसरा नहीं हो सकता। मदन जी अति संवेदनशील इंसान थे, एक बार अगर कोई बात उनके दिल पे लग जाती थी तो उसे ताउम्र नहीं भूलते थे। ऐसा ही एक वाक्या सन् 1972 में तब हुआ, जब उनकी संगीत टीम के सितारवादक राईस खान ने अपने एक अन्य दोस्त के यहां दावत में गाने को कहा और यह पूछ लिया कि वहां गाने के कितने पैसे लोगे ? इस बात से मदन मोहन को दिल पर इतनी चोट लगी कि उस दिन के बाद से अपनी मृत्यु होने तक अपने संगीत में सितार का प्रयोग ही बंद कर दिया। चराग दिल का जलाओ, फिर वही शाम, वही गम, मेरी याद में तुम न आंसू बहाना, इक हसीन शाम को, रंग और नूर की बारात, तेरी आंखों के सिवा, हम चल रहे थे जैसे कई सुपरहिट गीतों पर अपनी संगीत रचना देने वाले मदन मोहन के जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आए। यह एक तरह का दुर्भाग्य ही था कि जिन फिल्मों में उन्होंने संगीत दिया, उनमें से अधिकतर बाक्स आफिस पर टिक नहीं सकीं। लेकिन उनके द्वारा रचित संगीत से सजा हर गीत सुनने के बाद लगता है
कि जैसे समां ठहर गया हो। फिल्मी दुनिया के स्वार्थ, खेमेबाजी, गुटबाजी के चक्कर में उन्हें कई बार नुकसान हुआ। जिसके कारण वे शराब के आदी हो गए थे। अंततः 14 जुलाई सन 1975 में लीवर में क्षति के कारण उनकी मौत हो गई। उनके संगीत निर्देशन में बन रही फिल्म मौसम व लैला मजनू उनकी मौत के बाद रिलीज हुई और सन् 2004 में यश चोपड़ा की फिल्म वीर-जारा में मदन मोहन की उन धुनों को लिया गया, जिन्हें वे अपने जीते-जी प्रयोग नहीं कर सके थे। संगीतकार होने के साथ-साथ वे अच्छे गायक भी थे। कुछ गीत जिन पर उन्होंने अपना संगीत तो दिया, लेकिन वे लोगों के सामने नहीं आ पाए। उनमें से एक गीत ‘कैसे कटेगी जिंदगी तेरे बगैर‘ मो. रफी ने गाया था और दूसरा दुर्लभ गीत ‘मेरे अश्कों का गम न कर ऐ दिल‘ लता जी ने गाया था। वैसे इस गीत की रिकार्डिंग उनके प्रशंसकों के पास स्व. मदन मोहन जी की पुरकशिश आवाज में भी सुनने को मिल जाती है। दुनिया से जो दर्द उन्हें मिला, उसकी तड़प इस दुर्लभ, अनछुए गीत से रूह को भी झकझोर देती है।

मेरे अश्कों का गम न कर ऐ दिल, अपनी बरबादियों से डर ऐ दिल,
सिलसिला रोक बीती बातों का, वरना तड़पेगा रात भर ऐ दिल।।


स्व. राहुल देव बर्मन, संगीतकार
जन्मतिथि- 27 जून 1939

जिसके रोने से पंचम सुर निकलता था और पारंपरिक वाद्य यंत्रों से हटकर नए प्रयोगों का केमिकल लोचा जिनके दिमाग में भरा हुआ था। सुमधुर संगीत की रचना में जिनका कोई सानी आज भी नहीं है, संगीत की ऐसी मसीहाई शख्सियत शायद ही दोबारा इस नश्वर संसार में जन्म लेगी। नाम था आर. डी. यानि राहुल देव बर्मन यानि पंचम दा, मां-पिता ने तो उसका नाम राहुल ही रखा था, लेकिन हीरे की पहचान जौहरी ही कर सकता था, अभिनय के क्षेत्र की जानी-मानी शख्सियत दादा मुनि अशोक कुमार ने उनकी असल पहचान की और उन्हें पंचम का उपनाम दिया। उनका कहना था कि रोते वक्त उनके गले से सरगम का पांचवा सुर ‘प‘ निकलता था।
विश्व के श्रेष्ठतम संगीतकारों में से एक और भारतीय संगीत के लिए अलग ही मुकाम बनाने़ वाले राहुल का जन्म 27 जून 1939 में हुआ था। पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। कलकत्ता में बंगाली परिवार में पैदा हुए राहुल देव के संगीत का चरम 70 के दशक में पूरे यौवन पर था और संगीतकार पिता सचिन देव बर्मन के सानिध्य में वाद्य यंत्रों की समझ और उनका प्रयोग करने की ललक पैदा हुई, उस्ताद अकबर अली खां से उन्होंने सरोद बजाने की तालीम ली। उन्होंने कंघी, कांच के गिलास, टेबल, झाड़ू का प्रयोग करके सुमधुर संगीत की रचना कर डाली। आशा भोंसले और रफी साहब का गाया यादगार गीत ‘‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को‘‘जब भी बजता है, तो आर डी के अनूठे प्रयोगों की याद ताजा हो जाती है। पंचम दा को माउथ आर्गन बजाने का बहुत शौक था, देवानंद अभिनीत फिल्म सोलहवां साल के गीत ‘है अपना दिल तो आवारा‘ में उन्हें आर्गन बजाने का मौका मिला तथा ‘दोस्ती‘ फिल्म के यादगार गीतों में संगीत संयोजन कर रहे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए आर डी ने माउथ आर्गन बजाया।
पिता एस. डी. बर्मन की संगीत रचनाओं में सहयोगी के रूप में कैरियर की शुरूआत करते हुए राहुल ने सन् 1957 में गुरूदत्त की फिल्म प्यासा तथा 1958 में गांगुली बंधु यानि अशोक, किशोर व अनूप कुमार अभिनीत ‘चलती का नाम गाड़ी‘ से अपने सफर की शुरूआत की। उसके बाद सन् 1961 में स्वतंत्र रूप से महमूद की फिल्म ‘छोटे नवाब‘ में राहुल ने संगीत दिया। इसके बावजूद वे अपने पिता के संगीत संयोजन में सहयोगी बने रहे। एस. डी. की अंतिम फिल्म आराधना थी, जिसके संगीत को राहुल ने पूरा किया।
पाश्चात्य संगीत का प्रयोग भी भारतीय फिल्मों में उन्होंने ही किया और दम मारो दम, दुनिया में लोगों को, ओ हसीना जुल्फों वाली, दोस्तों से प्यार किया जैसे गीतों पर युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। 70 के दशक में किशोर कुमार की गायकी, राजेश खन्ना के अभिनय और राहुल देव बर्मन के सुमधुर संगीत ने तो जैसे धूम ही मचा दी थी। कहा जाता है कि राजेश खन्ना के कैरियर को उंचाई तक मुकाम देने में पंचम दा के संगीत का बहुत बड़ा हाथ था। शम्मी कपूर अभिनीत तीसरी मंजिल फिल्म में संगीत देने के लिए जब नासिर हुसैन ने राहुल देव बर्मन को चुना, तो शम्मी नाखुश थे, वे शंकर-जयकिशन को बतौर संगीतकार लिए जाने की सिफारिश करते रहे। पर जब तीसरी मंजिल में मोहम्मद रफी तथा आशा भोंसले के गीतों ने देश भर में धूम मचाई, तब शम्मी को अहसास हुआ पंचम दा की अनोखी प्रतिभा का। उनके जीवन का अहम् मुकाम ‘पड़ोसन फिल्म के साथ भी जुड़ा हुआ है। हास्य रस से भरपूर इस फिल्म के गीत आज भी लोग गुनगुनाते हैं, खास कर ‘मेरे सामने वाली खिड़की में‘। जितना दम उनके पाश्चात्य संगीत से सजे गीतों में होता था, उतनी ही कशिश और गंभीरता गुलजार के गीतों पर दी गए धुनों में भी होती थी। आंधी, किनारा, खूशबू, परिचय, इजाजत जैसी फिल्मों का संगीत अलग ही अहसास दिलाता है।

उनका विवाह 1966 में रीता पटेल से हुआ लेकिन मनमौजी आरडी उनसे 5 साल में ही अलग हो गए और सुरों की मलिका आशा भोंसले से 1980 में शादी कर ली। पंचम दा ने आशा ताई के साथ कई गाने भी गाए। 2 फिल्मों अभिनय व 18 फिल्मों में गाने गाने वाले गुणी संगीतकार पंचम दा के कैरियर में आर्थिक तंगी भी आड़े आती रही, पर वे पूरी तन्मयता के साथ संगीत के क्षेत्र में डटे रहे। शोले, यादों की बारात, खेल खेल में, महबूबा, आपकी कसम, किनारा, कारवां, मासूम, बेताब, सागर जैसी फिल्मों में संगीत देकर कई पुरूस्कार जीते और भारतीय संगीत के मसीहा के रूप में स्थापित हो गए। अपने जीवन का अंतिम संगीत उन्होंने फिल्म 1942-ए लव स्टोरी के लिए दिया और फिल्म रिलीज होने से पहले ही वे 4 जनवरी 1994 को दुनिया छोड़ गए। मौसिकी के ऐसे अभूतपूर्व मसीहा राहुल देव बर्मन को मेरा शत् शत् नमन्।


17 जून का इतिहास यानि दो प्रसिध्द नारियों पर चर्चा का दिन, इसलिए कि आज ही के दिन एक ने जंग के मैदान में अपनी मर्दानगी दिखाकर अंग्रेजों के हौसले पस्त कर दिए और मातृभूमि पर कुर्बान हो गई। दूसरी पर किस्मत ही इतनी ज्यादा मेहरबान थी कि उसकी मौत के बाद उसके मजार पर दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत गढ़ी गई। जिसे लोग प्रेम का अनूठा प्रतीक मानते हैं। पर इनमें एक समानता है कि वे दोनों ही मातृत्व सुख नहीं पा सकीं।

पहली नारी मनु यानि खूब लड़ी मर्दानी, झांसी वाली रानी लक्ष्मीबाई की चर्चा आती है, तो नारियों के रौद्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हाथ में तलवार लेकर अंग्रेजों को ललकारती तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। वाराणसी के भदैनी में 19 नवंबर 1828 को मोरोपंत तांबे के घर जन्मी मणिकर्णिका उर्फ मनु का बचपन ही संघर्षों से शुरू हुआ, 4 वर्ष की उम्र में उसकी मां दुनिया छोड़ गए।
पिता मोरोपंत की लाडली छबीली ने कम उम्र में ही अस्त्र शस्त्र थाम लिए, और मराठा सम्राट पेशवा बाजीराव के राज्य की अपनी प्रतिभा के बल पर अलग पहचान बनाई।
सन् 1842 में झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर से परिणय के बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन वह भी चार महीने बाद काल कवलित हो गया। गंगाधर राव का स्वास्थ्य भी खराब रहता था, उन्होंने दामोदर राव को दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया और एक दिन वह भी छोड़ गए दुनिया को। उसके बाद झांसी का राजकाज रानी लक्ष्मीबाई ने सम्हाला। अंग्रेज हिन्दुस्तान को अपनी हड़प नीति के तहत् कब्जाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और खजाने पर कब्जा कर लिया। लेकिन फौलादी इरादों से लबरेज लक्ष्मीबाई आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की फौज भी तैयार की। तात्या टोपे के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए और 17 जून 1858 को अंग्रेजों से लोहा लेते वक्त रानी घायल हो गई तथा ग्वालियर में दम तोड़ दिया। इतिहास के पन्नों में दर्ज रानी लक्ष्मीबाई की मर्दानी छवि आज भी नारी शक्ति का प्रतीक है।

चर्चा अब दूसरी नारी पर यानि ताजमहल की मलिका, शाहजहां की बेगम मुमताज महल की। विश्वप्रसिध्द सबसे खूबसूरत मकबरा तो मुमताज महल की किस्मत में ही लिखा था, जिसे संसार में कोई पार नहीं पाया। जीते जी मुमताज ने यह स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी याद में बना ताजमहल विश्व की अनमोल धरोहरों में से एक होगा। शाहजहां की प्रेमसे लबालब परिकल्पना और मंजे हुए कारीगरों के सिध्दहस्त से निकली कलाकारी ने ताज को जो मशहूरियत दी, उसकी
कोई दूसरी मिसाल अब तक नहीं मिल सकी है। अप्रेल 1593 में मुगल सम्राट जहांगीर की मलिका नूरजहां के भाई अब्दुल हसन असफ खान के यहां जन्मी अर्जुमंद का निकाह शाहजहां से 19 वर्ष की उम्र में हुआ था। अर्जुमंद को शाहजहां ने मुमताज का नाम दिया। वह शाहजहां की तीसरी पत्नी थी, लेकिन खूबसूरत मुमताज मुगल सम्राट की सबसे चहेती बन गई। 17 जून 1631 को बुरहानपुर में बेटी गौहारा बेगम को जन्म देने के बाद मुमताज चल बसी। उसे आगरा में जिस स्थान पर दफनाया गया, उस मजार पर शाहजहां ने संगमरमर से ताजमहल बनवाया। जो आज विश्व प्रसिध्द धरोहर बन चुका है।
शाहजहां के प्रेम का चरम अद्भुत था, जिसकी कल्पना को साकार करने के लिए हजारों हाथी, घोड़े, कारीगर लगाकर वर्षों की मेहनत के बाद एक खूबसूरत ताज बन सका। लेकिन इतिहास में शाहजहां की एक कलंकित करने वाली गलती सदियों तक मानवता के नाम पर लानत बनी रहेगी कि जिन हाथों ने ताज को खूबसूरत शक्ल दी, बादशाह ने उन कारीगरों के हाथ तक कटवा दिए, ताकि कोई दूसरा ताजमहल न बन सके। एक इतिहासकार पी एन ओक ने ‘ताजमहल इज ए आफ हिन्दू टेम्पल पैलेस‘ नामक पुस्तक में 100 से अधिक तर्क दिए हैं कि यहां भगवान शिव का पांचवा रूप अग्रेश्वर महादेव नागेश्वर नाथ विराजित है। हालांकि चर्चा इस विषय से अलग है, इसलिए आगे की बात नारी सशक्तिकरण पर, दुनिया में नारी शक्ति ने समय समय पर अनेक मिसालें कायम की है।
आधुनिक होते भारत में अलग-अलग विधाओं, कलाओं से नारियों ने देश को गौरन्वित किया है, मान बढ़ाया है। लेकिन नारी का प्रतिनिधित्व मुमताज महल और वीरांगना लक्ष्मीबाई ही करती दिखती हैं। लक्ष्मीबाई साहस का, संघर्ष का प्रतीक है और दुनिया के अलग-अलग हिस्से में
साहस के साथ, समाज के बंधनों व मर्यादाओं के बीच, जुल्म सहती, आस्तित्व के लिए जूझ रही नारी किसी न किसी रूप में महारानी लक्ष्मीबाई को आत्मसात करती दिखती है। वहीं दूसरी ओर आधुनिक परिवेश में बदलती संस्कृति के बीच प्रेम की पींगे बढ़ाने वाली युवतियां मुमताज महल जैसी किस्मत पाने को बेचैन दिखती हैं। शाहजहां के प्रेम का अनोखा और खूबसूरत मकबरा ताजमहल देखकर जैसे मन में एक टीस उठती है और हिलारें मारते प्रेम का पावन पाठ पढ़ते हुए अपने प्रेमी से प्रेमिका इठलाती हुई कहती है, तुम मेरे लिए ताजमहल कब बनवाओगे !

14 जून - विश्व रक्तदाता दिवस पर विशेष
छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर की हरी-भरी धरती आए दिन लहू से लाल हो रही है। रोजाना लोग मारे जा रहे हैं, कभी पुलिस जवान, कभी नक्सली, कभी एसपीओ तो कभी भोले-भाले आदिवासी। बड़ा सवाल है कि आखिर ये अंधा युध्द कब खत्म होगा ? ऐसा लग रहा है जैसे अंग्रेजी उपान्यासकार ब्रैम स्टोकर का काल्पनिक पात्र डैकुला बस्तर में अपनी रक्तपिपासु इच्छा के साथ पूरे वेग से वर्चस्व कायम कर रहा है। दुनिया को अमन चैन की जरूरत है न कि नरसंहार की। इसीलिए जब भी धरती से किसी आततायी का अंत होता है तो पूरे विश्व में उस पर तीखी प्रतिक्रिया होती है, लोगों को तसल्ली होती है, दिली सूकुन मिलता है। धरती को लहू से सराबोर करने वालों का अंत कभी अच्छा नहीं रहा है, इतिहास इसका गवाह है। एडोल्फ हिटलर, मुसोलिनी, नेपोलियन बोनापार्ट, सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन लादेन समेत दुनिया में तमाम आततायी हुए हैं, जिन्होंने मानवता को कलंकित किया है, खून की होलियां खेली हैं, इन सबका हश्र दुनिया को पता है।
वर्तमान परिवेश में भले ही दुनिया की दूरी लोगों से सिमटकर कम होती जा रही है और विश्व के किसी भी कोने का परिदृश्य चंद मिनटों
में जाना जा सकता है। आधुनिक होते युग में बस्तर का नक्सलवाद भले ही अत्याधुनिक हथियारों के बल पर जवानों का खून बहाता रहे, एंटी लैंडमाइन गाड़ियों को ध्वस्त कर अपनी सफलता पर खुश होता रहे या फिर पुलिस और फौजी जवान नक्सलियों को मारकर फक्र महसूस करते रहें। लेकिन सच तो यही है कि ऐसे अंधे युध्द से न तो मानव जाति का भला हो सकता है और न ही किसी तरह का कोई विकास हो सकता है। दुनिया में मानववाद के लिए तमाम प्रयोग हुए हैं और कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। जिस रक्त की एक बूंद का महत्व अधिकतर लोग अब तक नहीं समझ पाए है, उसके लिए सैकड़ों वर्षों से वैज्ञानिकों ने कितना परिश्रम किया है। यह जानकर हैरानी होगी कि लगभग 500 वर्षों की मेहनत के बाद आज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह सफलता मिल सकी है कि किसी भी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का खून सुरक्षित तरीके से आधान कर उसकी जान बचाई जा सकती है। यदि एक व्यक्ति अपने शरीर का अनमोल रक्त देकर दूसरे की जिंदगी बचाता है तो ऐसा कार्य महादान की श्रेणी में आता है। रक्तदान और आधान के संबंध में जो जानकारियां अब तक सामने आई हैं वे कम दिलचस्प नहीं हैं। रक्ताधान के संबंध में 17 वीं शताब्दी के इतिहास लेखक स्टीफैनो इन्फेसुरा ने प्रथम ऐतिहासिक प्रयास का सर्वप्रथम वर्णन करते हुए लिखा है कि सन् 1492 में जब पोप इन्नोसेंट गहन मूर्छा (कोमा) में चले गए,
तो एक चिकित्सक के सुझाव पर जीवन के अंतिम क्षणों में पोप (बिशप) के शरीर में तीन लड़कों का रक्त डाला गया (मुख से, क्योंकि परिसंचरण की अवधारणा एवं अंतःशिरा प्रवेश की विधियां उस समय अस्तित्व में नहीं थी)। लड़के दस वर्ष की उम्र के थे, और उनमें से प्रत्येक को एक सोने के सिक्के देने का वचन दिया गया था. हालांकि पोप नहीं बच सके। कुछ लेखकों ने इन्फेसुरा पर पोपवाद का विरोधी होने का आरोप लगाते हुए उसके विवरण को सही नहीं माना।
रक्ताधान संबंधी परिष्कृत अनुसंधान 17 वीं सदी में शुरू हुआ, जिसमें पशुओं के बीच रक्ताधान संबंधी सफल प्रयोग हुए। लेकिन मनुष्यों पर किए जाने वाले क्रमिक प्रयासों का परिणाम घातक बना रहा। सर्वप्रथम पूर्ण रूप से दस्तावेजीकृत मानव रक्ताधान फ्रांस के सम्राट लुई के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. जीन बैप्टिस्ट डेनिस द्वारा जून 15, 1967 में किया गया। उन्होंने एक भेड़ का रक्ताधान एक 15 वर्ष के लड़के में किया, जो रक्ताधान के बाद जीवित बच गया। डेनिस ने एक मजदूर का भी रक्ताधान किया और वह भी जीवित बच गया। दोनों उदाहरण संभवत रक्त की छोटी मात्रा के कारण थे जिसका वास्तव में इन लोगों में रक्ताधान किया गया था. इसने उन्हें ऐलर्जी संबंधी प्रतिक्रिया का सामना करने की अनुमति प्रदान की. रक्ताधान से गुजरने वाला डेनिस का तीसरा मरीज स्वीडिश व्यापारी बैरन बॉन्ड था. उन्होंने दो आधान प्राप्त किए. दूसरे आधान के बाद बॉन्ड की मृत्यु हो गई। पशु रक्त के साथ डेनिस के प्रयोगों ने फ्रांस में एक गर्म विवाद छेड़ दिया, अंततः 1670 में इस प्रक्रिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सही समय पर, ब्रिटिश संसद और यहां तक कि पोप ने भी यही किया. रक्ताधान अगले 150 वर्षों के लिए गुमनामी में चला गया।
रक्त आधान का विज्ञान 19 वीं सदी के प्रथम दशक के समय तक पुराना है जब भिन्न रक्त प्रकारों के परिणामस्वरूप आधान के पूर्व रक्त दाता एवं रक्त प्राप्तकर्ता के कुछ रक्त मिश्रित करने की परिपाटी शुरू हुई।
1818 में, ब्रिटिश प्रसूति-विशेषज्ञ, डॉ. जेम्स ब्लूनडेल ने प्रसवोत्तर रक्तस्राव का उपचार करने के लिए मानव रक्त का प्रथम सफल रक्ताधान संपादित किया. उन्होंने मरीज के पति का दाता के रूप में उपयोग किया, और उसकी पत्नी में आधान करने के
लिए उसकी बांह से चार औंस रक्त निकाला। वर्ष 1825 और 1830 के दौरान डॉ. ब्लून्डेल ने 10 आधान संपादित किए, जिनमें से पांच लाभप्रद रहे, और उन्होंने उनका परिणाम प्रकाशित किया. उन्होंने रक्त के आधान के लिए कई उपकरणों का भी आविष्कार किया. अपने प्रयास से उन्होंने बहुत अधिक मात्रा में रूपया अर्जित किया, जो लगभग 50 मिलियन (1827 में लगभग 2 मिलियन) वास्तविक डॉलर (मुद्रास्फीति के लिए समायोजित) था।
1840 में सेंट जार्ज मेडिकल स्कूल लंदन में डॉ. ब्लून्डेल की सहायता से सैमुएल आर्मस्ट्रांग लेन ने प्रथम संपूर्ण रक्ताधान संपादित किया। रक्त संबंधी प्रयोगों के लिए जॉर्ज वॉशिंगटन क्राइल को क्लीवलैंड क्लिनिक में सीधे रक्ताधान का उपयोग कर शल्य-चिकित्सा संपादित करने का श्रेय दिया जाता है। सन् 1901 तक कई रोगियों की मृत्यु हो चुकी थी, जब ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिक डा. कार्ल लैंडस्टेनर ने मानव रक्त समूहों की खोज की, जिससे रक्ताधान सुरक्षित हो गया। दो व्यक्तियों के रक्त का मिश्रण रक्त का एकत्रीकरण या संलग्नता उत्पन्न कर
सकता है, एकत्रित लाल कोशिकाओं में दरार पड़ सकती है और वे विषाक्त प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर सकती हैं जिनके घातक परिणाम हो सकते हैं। कार्ल लैंडस्टेनर ने देखा कि रक्त का एकत्रीकरण एक रोगक्षमता संबंधी प्रक्रिया है जो उस समय उत्पन्न होता है जब रक्ताधान के प्राप्तकर्ता में दाता रक्त कोशिकाओं के विरुद्ध रोग-प्रतिकारक (ए,बी, ए एवं बी दोनों, या कोई भी नहीं) होते हैं. कार्ल लैंडस्टेनर के कार्य ने रक्त समूहों (ए, बी, एबी, ओ) के निर्धारण को संभव बना दिया एवं इस प्रकार सुरक्षित रूप से रक्ताधान क्रियान्वित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इस खोज के लिए उन्हें 1930 में शरीर विज्ञान एवं चिकित्सा के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हीं की याद में विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है।
1930 के अंतिम दशक एवं 1940 के दशक के आरंभ में, डॉ. चार्ल्स आर. ड्रियू के अनुसंधान ने इस खोज को जन्म दिया कि रक्त को रक्त प्लाज्मा एवं लाल रक्त कोशिकाओं में विभाजित किया जा सकता है एवं प्लाज्मा को अलग से जमाया जा सकता है। इस तरह से जमाया गया रक्त अधिक लंबे समय तक कायम रहा एवं उसके दूषित हो जाने की संभावना काफी कम थी।
1939-40 में एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली, जब डा. कार्ल लैंडस्टेनर, एलेक्स वीनर, फिलिप लेविन, एवं आर.ई. स्टेटसन ने रीसस रक्त समूह प्रणाली की खोज की, जिसे उस समय तक आधान संबंधी बहुसंख्यक प्रतिक्रियाओं का कारण माना गया। तीन साल बाद, जे.एफ. लूटिट एवं पैट्रिक एल. मॉलिसन के द्वारा स्कन्दनरोधी की मात्रा को कम करने वाले एसिड- साइट्रेट-डेक्स्ट्रोज (एसीडी) के घोल के व्यवहार ने अधिक परिमाण में रक्ताधान एवं दीर्घावधि तक भंडारण की अनुमति प्रदान की।
कार्ल वाल्टर और डब्ल्यू. पी. मर्फी जूनियर ने 1950 में रक्त संग्रह के लिए प्लास्टिक बैग के व्यवहार की शुरूआत की. भंगुर कांच के बोतलों की जगह टिकाऊ प्लास्टिक बैग के व्यवहार ने खून की एक संपूर्ण यूनिट से बहु रक्त अवयव की सुरक्षित एवं सरल तैयारी के लिए सक्षम एक संग्रह प्रणाली के विकास की अनुमति प्रदान की। इस तरह दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने मानव जाति को जीवन देने संबंधी रक्तदान पर अपना योगदान दिया है। मेरा स्वयं का अनुभव रहा है कि अपने सगे संबंधियों परिचितों को रक्तदान करने से कई लोग परहेज करते हैं। शहरी क्षेत्रों में तो कई संस्थाएं ऐसे कार्यों में लगी होती हैं, जिससे आसानी से खून उपलब्ध हो जाता है। लेकिन ग्रामीण तथा कस्बाई क्षेत्रों में जागरूकता के अभाव में यह समस्या अब भी बरकरार है। डाक्टरों के अनुसार एक बार रक्तदान करने के बाद तीन महीने तक दोबारा रक्त नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन कुछ लोग मजबूरी के चलते या फिर नशे से पीड़ित अपना शौक पूरा करने के लिए खून बेच देते हैं। लहू चाहे बस्तर में बहे या भारत-पाकिस्तान की सरहद पर या फिर विश्व के किसी भी हिस्से में, उसे किसी भी तरह से सही नहीं माना जा सकता। मानवता के लिए विश्व को शांति की जरूरत है न कि अंधे युध्द की। ऐसे में किसी का रक्त बहाने से ज्यादा जरूरी है जीवन देना। इसलिए रक्तपिपासा छोड़कर रक्तदाता बनना बेहतर है। इसीलिए तो कहा गया है कि
जीना तो है उसी का, जिसने ये राज जाना,
है काम आदमी का, औरों के काम आना।

विश्व भर में हवाई मौतों का सिलसिला खतरनाक हो चला है। आए दिन आसमानों की उड़ान भरने वाले विमान, हैलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त होते रहते हैं। ऐसे हादसों में लोगों का बचना नामुमकिन होता है। हवा में उड़ती मौतों ने अब तक हजारों जानें ली हैं। एक मामूली सी लापरवाही कई जिंदगियों को लील लेती है। हवाई सेवाओं के खतरों से लोग अनजान नहीं हैं। पहले भी ऐसी वारदातें हुई हैं, जिन्होंने मानव मन को झकझोरा है। ग्वालियर राजघराने के माधवराव सिंधिया, आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत हैलीकाप्टर हादसे से हुई थी। अब अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू भी इस हवाई मौत के शिकार हो गए।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि शिल्पराज विश्वकर्मा देव ने ब्रह्मा के लिए एक पुष्पक नाम के विमान का निर्माण किया था। जो इच्छा अनुसार छोटा या बड़ा किया जा सकता था और आदेश मात्र से ही वह स्वामी की आज्ञा का पालन करता था। कलयुग में वैज्ञानिकों ने विमान और हैलीकाप्टर का अविष्कार किया, जिससे विदेशों में आवागमन के साधन हो सकें और यह धनाढ्य वर्ग, नेताओं, मंत्रियों को कहीं दूर दराज तक कम समय में पहुंचाने का बेहतरीन उपाय भी था। लेकिन समय-समय पर इन विमानों और हैलीकाप्टरों से हुए हादसों ने हजारों लोगों की जानें भी ली हैं। विमानों से हुए कुछ बड़े हादसे इस प्रकार हैं, 1 जनवरी 1978 को अरब सागर में गिरे एयर इंडिया विमान से 213 लोगों की मौत, 19 अक्टूबर 1988 को अहमदाबाद में विमान हादसे से 124 मौतें, 14 फरवरी 1990 में बैंगलोर विमान हादसे में 92 मौतें, 16 अगस्त 1991 को इंफाल विमान हादसे में 69 मौतें, 26 अप्रेल 1993 में औरंगाबाद में हुए हादसे में 55 मौतें, 17 जुलाई 2000 में पटना हवाई अड्डे पर विमान हादसे से 60 मौतें हुई हैं। इसी तरह पिछले वर्ष मैंगलोर हवाई अड्डे पर एक बड़े विमान हादसे में 158 लोगों की मौत हो गई थी।
इसी तरह छत्तीसगढ़ सरकार का हैलीकाप्टर मैना सन् 2007 में लापता हो गया था, कई महीनों तक तलाश के बाद उसका मलबा मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में मिला था और उसमें सवार 4 लोगों की मौत हो चुकी थी। सन 2009 में आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी का हैलीकाप्टर भी लापता हो गया था और कई दिनों की तलाश के बाद हैलीकाप्टर का मलबा मिला था। 5 दिन पूर्व अरूणाचल के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू का विमान भी इसी तरह लापता हो गया था। अब जाकर उसका मलबा मिला है और उनकी मौत हो चुकी है। सवाल यह है कि आखिर हवाई सेवाओं के खतरों से लोग इतने लापरवाह क्यों हैं ? मौसम की खराबी से , पायलट की लापरवाही से, हवाई अड्डों पर विमान उतारते समय हादसे होते रहे हैं। यह तो तय है कि हवाई दुर्घटना में जितना भयानक विध्वंस होता है, उससे किसी का बच पाना नामुमकिन होता है। भौतिकवादी युग में पुष्पक की तरह का विमान बनाया नहीं जा सकता। मशीनी युग के विमानों ने जितनी ज्यादा उपलब्धियां हासिल की हैं, उससे ज्यादा गहरे जख्म भी दिए हैं। आधुनिक परिवेश के इन पुष्पक विमानों से आखिर किस तरह खतरे कम हो पाएंगे ? क्या ऐसे उपाय नहीं किए जा सकते कि हवाई सेवाओं से होने वाले खतरों को टाला जा सके। हमारा मानना तो यह भी है कि मानव चाहे जितनी तरक्की कर ले, प्रकृति से जीत नहीं सकता। क्योंकि प्रकृति से बड़ा कोई भगवान नहीं है।

विश्व मजदूर दिवस


जिंदगी में सफल होने के लिए दो चीजों की काफी जरूरत है, हिम्मत और मेहनत। हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, मेहनत करने वाले कभी विफल नहीं होते। दुनिया की संरचना में भी मेहनत करने वाले श्रमवीरों ने समय-समय पर नए इतिहास रचे हैं। अपना पसीना बहाकर आसमान छूती इमारतों को खड़ा करने वाले आज भी जमीन पर हैं और बुलंद इमारतों के उपर खड़ा धनाढ्य वर्ग मुस्कुराता हुआ इठला रहा है।
आज जिस खूबसूरत इमारत ताजमहल को देखने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। इस अजूबे को देखकर रोमांच सा महसूस करते हैं, शाहजहां को याद करते हैं, मुमताज की कहानियां कहते हैं, इसे प्यार का प्रतीक बताते हैं, पर उन श्रमवीरों को भूल जाते हैं, जिनकी कारीगरी का कोई सानी नहीं था। इतना सुंदर ताजमहल खड़ा करने के एवज में उन्हें क्या मिला ? बादशाह ने उनके हाथ कटवा दिए। इसलिए कि वे कोई दूसरा ताजमहल न बना सकें। क्या उनकी कारीगरी का यही वाजिब इनाम था ?
श्रमिकों का शोषण तो हर सदी में होता रहा है। मुगल काल में भी मजदूर वर्ग गुलाम की तरह थे। अंग्रेज भारत में आए तो यहां के लोगों को मजदूर से अधिक नहीं समझते थे। कोई भी मेहनत का काम वे भारतीयों से ही कराते थे। मजदूरों पर अत्याचार का सिलसिला आजाद भारत में भी खत्म नहीं हुआ और अब जब देश में कई यूनियन बन गए तब भी मजदूर वहीं का वहीं है। मजदूरों के हित में बने संगठन उनका कितना भला करते हैं, यह कहने को बाकी नहीं रहा। कुछेक मामले अपवाद हो सकते हैं, पर अधिकतर मामलों में मजदूर को उनका हक नहीं मिल पाता। छत्तीसगढ़ के मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के समय में एक क्रांति शुरू हुई थी मजदूरों को वाजिब हक दिलाने की। नियोगी की तर्कशक्ति और आक्रोश के आगे अच्छे-भले उद्योगपति ठहर नहीं पाते थे। लेकिन शोषक वर्ग की आंख का कांटा बन चुके नियोगी को मौत की नींद सुला दिया गया। यह दुनिया का दस्तूर ही है कि जो संघर्ष के लिए आगे आएगा, उसे तमाम समस्याएं झेलनी तो पड़ेंगी ही। मजदूरों के लिए सरकारों ने कई तरह के नियम-कानून बनाए हैं ताकि उन्हें उनके हक की कमाई मिलनी सके। लेकिन राजनीति की शह पर पलती नौकरशाही और उद्योगपतियों की मिलीजुली साजिशों ने श्रमवीरों के पसीने का पूरा हक नहीं मिलने दिया है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में पलायन की समस्या अब भी बरकरार है। सवाल यह उठता है कि जब सरकारें मजदूरों के लिए कई काम प्रदेश में ही उपलब्ध करा रही है, तो आखिर पलायन क्यों ? अपने बीवी बच्चों को लेकर दूसरे प्रदेशों में जाने वाले मजदूर वर्ग कई बार ठेकेदारों और दबंगों के चंगुल में फंस जाते हैं। उसके बाद तो न उनका परिवार सुरक्षित रह पाता है और न ही उसकी मेहनत की कमाई उसे मिल पाती है। आए दिन प्रशासन के पास बंधुआ मजदूरों के मामले आते रहते हैं। मजदूर की मजबूरी का फायदा उठाने
वालों को सोचना चाहिए कि आखिर उसकी मेहनत और कारीगरी से ही हम एक अदद घर-मकान में रहने का सुख हा
सिल कर पाते हैं। आखिर किसने धरती पर खड़ी इमारतों को विशाल और बुलंद बनाया, दुनिया में मिली सुख-सुविधाओं के लिए किसने पसीना बहाया, यह गंभीर सोच का विषय है। मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसके हक की कमाई मिल जानी चाहिए। लेकिन मजदूरों का खून चूस चूस कर एयर कंडीशनर कमरों में बैठने वाले, महंगी
लग्जरी गाड़ियों में घूमने वाले, मजदूरों को हेय दृष्टि से देखने वाले यह तक नहीं सोचते कि दुनिया में मजदूर न होते तो यह विश्व कैसा दिखता, कैसा लगता ? मजदूर, कालका, मजदूर जिन्दाबाद, कुली, काला पत्थर, इंसाफ की आवाज जैसी कई फिल्मों में मजदूर वर्ग के साथ हो रहे शोषण को दिखाया गया है। ऐसे मौके पर दिलीप कुमार अभिनीत मजदूर फिल्म का यह गीत भारत के एक मजदूर की आकांक्षा को चिन्हांकित करता है।

हम मेहनतकश इस दुनिया से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे
इक बाग नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।

आने वाले दिनों में मजदूरों की जीवनशैली बदलेगी, उनके हक की कमाई मिलेगी या फिर शोषक वर्ग मजदूरों की मेहनत और पसीने की कमाई पर साजिशें रचकर, उनका हक मारकर ऐसे ही इठलाता रहेगा, यह अंत्यंत सोचनीय है ।

कितना औद्योगिकरण जरूरी है ?


उद्योगों की चिमनियों से निकलता काला-सफेद धुआं, सरकारी जमीनों पर कब्जा करती राख, कम होती कृषि भूमि और जनता का विरोध, इन उद्योगों के लगने से देश, प्रदेश, शहर, गांव का विकास होगा, या फिर लोगों के हिस्से में आएगा धूल, धुआं और राख, बढ़ेगा तापमान, तो गर्मी से कैसे निजात पाएंगे लोग, धान का कटोरा बन जाएगा का राख का कटोरा, इसलिए ऐसे औद्योगीकरण के पहले ग्लोब वार्मिंग पर विचार करना भी जरूरी है। पर्यावरण के सौदागर भूल चुके हैं कि जो हम प्रकृति को देंगे, उसके बदले में हमें भी वैसा फल मिलेगा।
जिले में विद्युत संयंत्र लगाने के लिए सरकार ने उद्योगपतियों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। 34 पावर प्लांट लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने देश भर की नामी कंपनियों केएसके महानदी, वीडियोकान, मोजरबेयर, डी. बी. पावर, कर्नाटका पावर, श्याम सेंचुरी आदि से एमओयू हस्ताक्षरित किए हैं। 70 प्रतिशत से अधिक सिंचाई और कृषि प्रधान जिले में इतनी बड़ी संख्या में पावर प्लांट लगाए जाने से होने वाले नुकसान की फिक्र यहां की आम जनता को ही नहीं, जनप्रतिनिधियों को सता रही है। उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण से जिले की कृषि भूमि का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। पावर प्लांट प्रबंधन, जमीन दलालों, अधिकारियों और नेताओं की चौकड़ी की कुटिल रणनीति में फंसकर किसान अपनी दो फसली जमीन बेच रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में उद्योगों के लिए अनुमति दिए जाने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं, जैसे कि इन उद्योगों के लिए पानी कहां से आएगा, उद्योगों से निकलने वाले धुएं से लोगों के स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ेगा, तापमान बढ़ेगा, भारी वाहनों के आवागमन से दुर्घटनाएं बढ़ेंगी और सबसे अहम् सवाल है कि इन उद्योगों से निकलने वाली राख आखिर कहां जाएगी ?
जिले की तस्वीर भले ही औद्योगिक विकास से सुधर जाए लेकिन तकदीर आने वाले दिनों में बिलकुल भी अच्छी नहीं होगी। 70 प्रतिशत से अधिक खेती के लिए सिंचित जांजगीर-चांपा जिले के लिए सरकार ने 34 से अधिक पावर प्लांट के लिए एमओयू किया है। जिसके बाद आम जनता के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। जनसुनवाई में उद्योगों के खिलाफ जनता का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। आम जनता के अलावा जनप्रतिनिधि भी सरकार के इस कदम से खुश नहीं हैं। लेकिन वे सरकार का खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं।
सरकारी जमीनों पर उद्योगों से निकलती राख फेंकी जा रही है, उद्योग प्रबंधनों की मनमानी इतनी बढ़ गई है कि बिना अनुमति लिए ही नेशनल हाईवे के किनारे, नालों में और सरकारी भूमि पर राख फेंकी जा रही है। इस मामले में प्रशासन तो जैसे उद्योगों की हाथों की कठपुतली बन गया है। जिस तरह जांजगीर-चांपा जिले में पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं, वह उचित नहीं है, आने वाले दिनों में इससे कई तरह के नुकसान होंगे, लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा, उद्योगों में नौकरी नहीं मिलने पर पलायन होगा और कृषि भूमि भी कम होती जाएगी। सबसे बड़ी समस्या होगी तापमान की, प्रदेश में सबसे ज्यादा तापमान इसी जिले मंे होता है, उद्योग लगने के बाद गर्मी बढ़ेगी तो लोगों का जीना हराम हो जाएगा। कोरबा में उद्योग लगने के पहले वहां का तापमान 5 डिग्री कम था, आज जाकर वहां की स्थिति देख सकते हैं।
जिले में अब तक पांच बड़े उद्योग स्थापित हैं और 7 उद्योगों के लिए जनसुनवाई हो चुकी है। स्थापित हो चुके उद्योगों से आसपास के इलाके के ग्रामीण खासे परेशान हैं, चिमनियों से निकलता काला धुआं लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन के अधिकारियों के सामने इसकी शिकायत भी की है, लेकिन उद्योगों के हाथों की कठपुतली बन चुके अधिकारी इस मामले पर कोई पहल नहीं करते। प्रदूषण रोकने के लिए उद्योगों में लगाए गए ईएसपी संयंत्र बिजली बिल बचाने के चक्कर में बंद रखे जाते हैं, जिसकी वजह से धुआं आसपास के पंद्रह किलोमीटर क्षेत्र को प्रभावित करता है। उद्योग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, ग्रीन बेल्ट की स्थापना नहीं की जा रही है, जिससे लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। विधायकों द्वारा विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया गया है। लेकिन सरकार र्प्यावरण और प्रदूषण पर गंभीर नहीं है।
कुल मिलाकर इतने सारे उद्योगों के पक्ष में न तो आम जनता है और न ही अधिकतर जनप्रतिनिधि, फिर भी कृषि प्रधान जिले में इतने अधिक उद्योग लगाए जाने के नुकसान के बारे में सोचा नहीं जा रहा है। उद्योगों के बढ़़ने से जिले का विकास तो होगा, लेकिन इनसे निकलने वाली राख, धूल, धुआं और गर्मी आम जनता के हिस्से में ही आएगा, आने वाले दिनों में धान का कटोरा कहलाने वाला यह जिला और प्रदेश राख के कटोरे में तब्दील हो जाएगा। यह समझने की जरूरत है कि ऐसे औद्योगिकरण से जिले का विकास होगा या विनाश ? ग्लोबल वार्मिंग को लेकर पूरे विश्व में चिंता की जा रही है। लेकिन औद्योगिक प्रदूषण पर सरकारें लगाम नहीं लगा पा रही हैं। प्रकृति को दिए जा रहे जख्मों का बदला समय समय पर मानव समाज को मिल रहा है। जापान में हुई तबाही इसका ज्वलंत उदाहरण है। प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले भविष्य में क्या इसके विध्वंस से जनजीवन को बचा पाएंगे ? सिकंदर जब इस दुनिया से गया था तो उसके दोनों हाथ कफन के बाहर निकाले गए थे ताकि दुनिया को सबक मिल सके कि जो दुनिया से जाता है वह अपने साथ कुछ भी नहीं ले जाता। इस पाठ को वे लोग भूल चुके हैं, जिन्हें हर काम में लक्ष्मी प्राप्ति अहम् लगती है। क्या ऐसे लोग अपने साथ कफन में छुपाकर कुछ ले जा पाएंगे ?

0 बुजुर्ग ग्रामीण ने मुख्यमंत्री से कहा

0 कोसमंदा में उतरा मुख्यमंत्री का उड़नखटोला

मुख्यमंत्री डॉं. रमनसिंह जब कोसमंदा गांव पहुंचे तो एक बुजुर्ग ग्रामीण को भीड़ में जद्दोजहद करते देखकर उन्होंने अपने पास बुला लिया और पूछा - राम राम बबा, कईसे आए हस, कुछु समस्या हे का तब बुजुर्ग ने मुख्यमंत्री को जवाब दिया - नईं साहेब, तूंहर दरसन करे आए हवं। ग्रामीण की भावना से मुख्यमंत्री डा. सिंह काफी द्रवित हो गए, उसके बाद गांव की कई समस्याओं का निराकरण करने की लिए सौगातों की झड़ी लगा दी। मुख्यमंत्री ने गांव के युवकों की किक्रेट टीम को सामान खरीदने के लिए 10 हजार रूपए अनुदान देने की घोषणा भी की।

ग्राम सुराज अभियान के तहत चौथे दिन सवेरे राजधानी से हेलीकाप्टर द्वारा रवाना होकर सबसे पहले अचानक जांजगीर-चांपा जिले के विकासखण्ड डभरा के ग्राम कोसमंदा पहुंचे। मुख्यमंत्री ने गांव में चौपाल शैली में ग्रामीणों के साथ बैठकर स्थानीय समस्याओं और जरूरतों के बारे में लोगों से पूछताछ की। डॉं. सिंह ने कोसमंदा में ग्रामीणों की वर्षो पुरानी मांग को पल भर में स्वीकृति देते हुए वहां सिंचाई सुविधा के लिए नहर निर्माण कराने का ऐलान किया। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री की इस घोषणा का स्वागत् किया। किसानों का कहना था कि नहर बन जाने पर संपूर्ण कोसमंदा गांव व आसपास के गांवों में पर्याप्त सिंचाई हो सकेगी, इससे वहां हर मौसम में खेती हो सकेगी। मुख्यमंत्री ने सपोस से कोसमंदा नहर निर्माण हेतु ग्रामीणों की सहमति प्राप्त कर नहर निर्माण की कार्यवाही करने के निर्देश दिये।

मुख्यमंत्री ने ग्राम कोसमंदा तथा बगरैल में मंगल भवन निर्माण की मांग भी तुरंत पूरी कर दी। उन्होंने वहां सपोस से कोसमंदा और बगरैल तक 25 कि.मी.डब्ल्यू.बी.एम. सड़क निर्माण करने के निर्देश दिये जिसे बाद में मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना में शामिल करने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री ने कोसमंदा एवं बगरैल में सीमेंट कांक्रीट सड़क बनवाने की घोषणा की। उन्होने कोसमंदा में तालाब गहरीकरण कार्य कराने कहा। मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने ग्रामीणों की मांग पर कोसमंदा में एक अतिरिक्त ट्रांसफार्मर लगाने तथा पानी टंकी का निर्माण करने के निर्देश भी दिये। डॉं. सिंह ने ग्रामीणों की मांग पर गाड़ापाली में अतिरिक्त नल कूप खनन एवं पम्प लगाने के भी निर्देश दिये। डॉं. सिंह ने ग्रामीणों को ग्राम सुराज अभियान के उद्देश्यों की भी जानकारी दी। उन्होने ने ग्रामीणों की अन्य समस्याओं के निराकरण हेतु अधिकारियों को गॉंव में शिविर लगाने के निर्देश दिये। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार ग्राम कोसमंदा में 24 अप्रैल 2011 को शिविर लगाया जायेगा जिसमें विभागीय अधिकारी उपस्थित रहकर ग्रामीणों की समस्याओं का निराकरण करेगें। इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों सहित जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।

0 जलस्तर में लगातार गिरावट
0 10 वर्षों बाद उपजेगा घोर जल संकट
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने जांजगीर-चांपा जिले में 34 पावर कंपनियों से 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए एमओयू करके आम जनता के भविष्य को संकट में डाल दिया है। 40 हजार मेगावाट के विद्युत उत्पादन के लिए प्रतिवर्ष 16000 लाख घनमीटर पानी की जरूरत होगी, समझा जा सकता है कि इतनी बड़ी मात्रा में जब उद्योगों को पानी दिया जाएगा, तो आम जनता के लिए पानी कहां से आएगा ? सबसे खास बात यह है कि हर साल गर्मी के मौसम में इस जिले के जलस्तर में खासी गिरावट आ जाती है, तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे हालात में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जीवनदायिनी बनी नदियों का पानी सरकार ने उद्योगों को देने का फैसला कर भविष्य के लिए परेशानी पैदा कर दी है।
प्रदेश में सत्तासीन भाजपा सरकार ने उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से अपने हाथ खोल रखे हैं। देश की जानी मानी कंपनियां वीडियोकान, मोजरबेयर, केएसके महानदी, कर्नाटका पावर, एस्सार पावर आदि प्रदेश में अरबों-खरबों रूपए का निवेश बिजली उत्पादन के क्षेत्र में करने जा रही हैं। सरकार की इस सोच को हर कोई सराह सकता है कि उद्योगों से होने वाले विकास से आम जनता की आर्थिक परेशानियां कम होंगे, रोजगार के अवसर बढ़ेगे, अच्छी सड़कें बनेंगी, पढ़ाई का स्तर उंचा होगा और लोगों की बेरोजगारी खत्म होगी, लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरे पहलू पर गौर करें तो विकास के साथ साथ एक तरह का विनाश भी समानांतर चलता है। उद्योगों से होने वाले विनाश को देखें तो पता चलता है कि जहां जहां उद्योग लग रहे हैं, उन क्षेत्रों में सड़क दुर्घटनाओं में इजाफा हो रहा है, अपराध बढ़ रहे हैं, संयंत्र से निकलने वाले प्रदूषण से आम जनजीवन काफी प्रभावित होता है। संयंत्र से निकलने वाली राख का क्या वाजिब उपयोग होगा, इस बारे में कोई ठोस रणनीति सरकार नहीं बना सकी है, वहीं संयंत्रों की मशीनें चलने से तापमान भी बढ़ेगा। संयंत्रों की सुविधा के लिए राखड़ बांध बना दिए जाते हैं, जिससे हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि बेकार चली जाती है। हाल ही में पता चला है कि बिलासपुर जिले के सीपत में स्थापित नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन के राखड़ बांध में संयंत्र के अपशिष्ट जल के प्रवाह से रलिया तथा भिलाई गांव की 150 एकड़ भूमि दलदल हो गई है।
जांजगीर-चांपा जिला 80 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र माना जाता है, जहां नदियों का पानी नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुंचता हैऔर यहां के किसान साल भर में दो फसलें उत्पादन करते हैं। हरियाली से समृध्द ऐसे जिले में सरकार ने एक दो नहीं बल्कि 34 पावर कंपनियों से बिजली उत्पादन संयंत्र लगाने के लिए एमओयू कर लिया। इन कंपनियों द्वारा कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक एक हजार मेगावाट संयंत्र को 400 लाख घनमीटर पानी आदर्श अवस्था में प्रति वर्ष लगता है, लेकिन व्यवहारिक स्थिति में इससे भी ज्यादा पानी का उपयोग होता है। महानदी पर बनाए गए गंगरेल बांध की जलभराव क्षमता 800 लाख घनमीटर है तथा सहायक नदियां पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, अरपा, हसदेव, जोंक, तेल आदि हैं। राज्य सरकार ने पानी की उपलब्धता का गहन अध्ययन किए बगैर लगभग 20000 लाख घनमीटर पानी उद्योगों को देने का करार कर लिया है। यह आबंटन विगत तीस वर्षों के जल प्रवाह के आंकड़ों के हिसाब से काफी अधिक है।
जिले के नौ विकासखंडों में से डभरा, सक्ती व मालखरौदा में गर्मी के मौसम में जल संकट बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, यहां पर 250 मीटर तक जलस्तर नीचे चला जाता है, जिससे कई हैंडपंप सूख जाते हैं। इन क्षेत्रों की जमीन में शैल निर्मित चट्टानें हैं, जिसके कारण जल का स्तर वैसे भी काफी नीचे होता है। अधिकतर तालाब तेज गर्मी की वजह से सूख ही जाते हैं, तब ग्रामीणों को आसपास बहने वाले नदी के भरोसे रहना पड़ता है। गर्मी के दिनों में वैसे भी आजकल नदियों में दूर दूर तक रेत ही नजर आती है, पानी के नाम पर छोटा सा नाला बहता दिखाई देता है, ग्रामीण नालेनुमा बह रही नदी के जल का उपयोग पीने में भी करते हैं और नहाने में भी। बरसात के मौसम में वर्षा जल से ही नदियों में पानी आता है। लेकिन जब इतनी बड़ी मात्रा में उद्योगों को पानी दे दिया जाएगा, तो आगामी 10 वर्षों में ग्रामीणों का जीना दूभर हो जाएगा और जल संकट से आम जनता को खासी परेशानियां झेलनी पड़ेंगी, यह भी हो सकता है कि बाजार में बिकने वाले पानी के दाम पांच गुने हो जाएं और यह भी संभव है कि पानी की एक एक बूंद के लिए आम जनों को तरसना पड़े। ऐसे हालात पैदा होने से पहले सरकार को चिंतन करना चाहिए कि आम जनता के हितों के हिसाब से कितना औद्योगीकरण जरूरी है। अंधाधुंध औद्योगीकरण से त्रस्त आम जनता ने अब उद्योगों को स्थापित किए जाने का विरोध भी शुरू कर दिया है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश में 19 अप्रेल से ग्राम सुराज अभियान का आगाज हो चुका है। गांवों, गरीबों की समस्याओं की सुध लेने तथा उसे हल करने के लिए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह सहित कई मंत्री, विधायक, सरकारी अधिकारी गांवों में पहुंच रहे हैं, पर इस बार ग्रामीणों के तीखे तेवरों से नेताओं और अधिकारियों को दो चार होना पड़ रहा है। कारण साफ है कि पिछले वर्षों में चलाए गए सुराज अभियान के तहत् मिले आवेदनों, समस्याओं का निपटारा अब तक नहीं हुआ है। अधिकारियों कर्मचारियों ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए हजारों शिकायतें तथा लाखों आवेदन कागजों में निराकृत कर दिए। जाहिर है कि ऐसी खोखली कार्रवाईयों से छत्तीसगढ़ में सुराज तो आने से रहा। केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के मिश्रित अनुदान से चलने वाली कई योजनाओं में वैसे भी भ्रष्टाचार चरम पर है।
प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार के मुखिया डा. रमन सिंह ने तमाम प्रयासों से राज्य के विकास के लिए नए नए प्रयोग किए हैं, मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद राज्य का स्वरूप बदला भी है, लेकिन उतनी ही तेजी से भ्रष्टाचार बढ़ा है और सरकारी मशीनरी की मनमानी भी बढ़ गई है। भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ तमाम शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, वहीं आम जनता के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भी खासा घालमेल है। हालांकि मुख्यमंत्री पर सीधे तौर पर न तो कोई गंभीर आरोप लगे हैं और न ही भ्रष्टाचार के मामले विपक्ष सहित अन्य विरोधी दल उन पर साबित कर सके हैं। वर्ष 2010 के अप्रेल माह में चलाए गए ग्राम सुराज अभियान के तहत् सरकार को 7 लाख 40 हजार 298 आवेदन, शिकायतें मिली थी। जिनमें से 60 प्रतिशत मामलों का कागजों में निराकरण कर दिया गया है। जब पिछले वर्षों के दौरान मिले आवेदनों, शिकायतों का वास्तविकता में निराकरण हुआ ही नहीं, तो दोबारा उन्हीं गांवों में जा रहे नेताओं, अधिकारियों को आक्रोश तो झेलना पड़ेगा ही। कई गांवों में ग्रामीणों ने सुराज अभियान का बहिष्कार करने की ठान ली है। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में तो ग्रामीणों ने अनोखे तरीके से सुराज अभियान का बहिष्कार किया। गांव के सैकड़ों लोगों ने मुंडन कराकर सुराज अभियान की अर्थी निकाल दी। सवाल यह उठता है कि आखिर इस तरह कागजी निराकरण से क्या प्रदेश की समस्याएं खत्म हो जाएंगी, क्या सरकार की मंशा यही है कि समस्याओं का निराकरण इस तरह से हो ? प्रदेश के मुखिया छत्तीसगढ़ में सुराज लाना चाहते हैं और अधिकारी इसमें पलीता लगा रहे हैं तो जाहिर है कि ऐसे में छत्तीसगढ़ प्रदेश की जनता को सुराज का बरसों बरस इंतजार करना पड़ेगा।

ग्राम सुराज अभियान के पहले दिन ही कई सुराज दलों को ग्रामीणों के आक्रोश से दो चार होना पड़ा। बिर्रा क्षेत्र में प्रस्तावित मोजरबेयर पावर कंपनी के प्लांट का विरोध करते हुए सिलादेही के ग्रामीणों ने सुराज दल को स्कूल के अंदर जाने ही नहीं दिया। सुराज दल को रोके जाने की सूचना पर गांव पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को भी कई घंटे बिठाए रखा और सुराज अभियान का बहिष्कार कर दिया।
बम्हनीडीह विकासखंड के गांव सिलादेही के प्राथमिक शाला में सुराज अभियान हेतु ग्रामीणों से बातचीत व शिकायतों के लिए पहले दिन 19 अप्रेल को जैसे ही अधिकारी पहुंचे, सैकड़ों ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया और स्कूल
के अंदर जाने से रोक दिया। सूचना मिलने पर एसडीएम चांपा सी. डी. वर्मा, नायब तहसीलदार बी. एस. कंवर, जनपद पंचायत के सीईओ सी. एस. चंद्रा, थाना प्रभारी उषा सोंधिया गांव पहुंचे। तब कहीं जाकर सुराज दल
को स्कूल के अंदर जाने दिया गया। अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाईश देकर सुराज में हिस्सा लेने के लिए उनकी समस्याएं पूछी तो ग्रामीणों ने दो टूक अपनी मांगें रख दी। ग्रामीणों ने अधिकारियों से साफ तौर पर कहा कि मोजरबेयर पावर प्लांट यहां स्थापित न किया जाए, वहीं सरपंच व उपसरपंच का इस्तीफा स्वीकार किया जाए। अधिकारियों ने पावर प्लांट के मामले को शासन स्तर का बताते हुए ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि वे उनकी बात सरकार तक पहुंचा देंगे। वहीं जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे के संबंध में जानकारी लिए जाने पर पता चला कि सरपंच व उपसरपंच ग्रामीणों के दबाव में आकर इस्तीफा दे रहे हैं।
विदित हो कि बम्हनीडीह विकासखंड के बिर्रा क्षेत्र में मोजरबेयर पावर कंपनी द्वारा 1320 मेगावाट के दो संयंत्र प्रस्तावित हैं। पावर प्लांट की स्थापना के लिए सिलादेही, गतवा तथा बिर्रा की लगभग 1000 एकड़ भूमि अधिग्रहित की जानी है। सिलादेही के ग्रामीणों ने गांव पहुंचने वाले कंपनी प्रबंधन को भी दुर्व्यवहार कर लौटा दिया था, वहीं कंपनी द्वारा स्कूली बच्चों को बस्ता बांटे जाने का विरोध करते हुए हंगामा भी किया था। सैकड़ों की संख्या में कलेक्टोरेट पहुंचकर किसान अपना विरोध जता चुके हैं कि मोजरबेयर पावर कंपनी को वे अपनी जमीन नहीं देना चाहते, लेकिन प्रशासन के अधिकारी इसे आवश्यक अधिग्रहण बता कर प्रक्रिया में लगे हुए हैं। सिलादेही के ग्रामीण हर कदम पर पावर कंपनी का विरोध करने में जुटे हुए हैं। इसी वजह से उन्होंने ग्राम
सुराज अभियान का भी बहिष्कार कर दिया और वहां पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को चार घंटे तक बिठाए रखा लेकिन एक भी आवेदन नहीं दिया।
सबसे बड़ी समस्या पावर कंपनी
सिलादेही के ग्रामीणों का कहना है कि आने वाले दिनों में उनकी सबसे बड़ी समस्या पावर कंपनी की स्थापना किए जाने से होगी। इस क्षेत्र में द्विफसली कृषि भूमि है, अधिकतर किसान सिंचाई सुविधा के चलते यहां साल भर में दो फसलें उपजाते हैं, लेकिन शासन के अधिकारी पावर कंपनी से मिलीभगत के चलते कृषि भूमि को बंजर बताकर प्लांट के लिए देने की तैयारी में हैं। यहां के किसानों की मुख्य आजीविका कृषि ही है। पावर प्लांट को जमीन दिए जाने के बाद किसान कहां जाएंगे ? इसके अलावा उद्य़ोग लगने से प्रदूषण तथा अन्य समस्याएं भी क्षेत्र में पैदा हो जाएंगी।

देश में हर तरफ अण्णा राग की धूम है। फेसबुक अण्णा हजारे की खबरों से भरी पड़ी है, मोबाईल में संदेश आ रहे हैं उनके आंदोलन को समर्थन देने के लिए। ब्लाग पर भी अण्णा की ही बातें पढ़ने को मिल रही हैं। हालात कुछ उसी तरह के बन गए हैं जैसे तमाम भ्रष्ट मंत्रियों, संतरियों की लाइलाज बीमारी का तोड़ एक अनार (अन्ना) ही हो। कोई सत्याग्रही बापू से उनकी तुलना कर रहा है, कोई उन्हें जेपी जैसा क्रांतिकारी बता रहा है। उनके एक उपवास, आमरण अनशन पर अब तक महाराष्ट्र सरकार सकते में आ जाती थी, इस बार उन्होंने केंद्र सरकार को हिला कर रख दिया है। अण्णा जैसे साफ-सुथरे व्यक्त्वि अकेले ही पूरे देश की सरकार का पसीना निकाल सकते हैं। यह बात लोगों को अब महसूस हो रही है। अण्णा हजारे के बारे में ज्यादा कुछ कहना गुस्ताखी होगी। लेकिन उनके आंदोलन का जो हाल है, उसमें एक बात तो जुड़ी हुई दिखती है कि लोग भेड़ों के रेवड़ की तरह उनके पीछे हो लिए हैं। भ्रष्टाचार ने इस कदर लोगों के मन मष्तिष्क को अवसादग्रस्त कर दिया है कि लोग चाहे-अनचाहे ही इस अभियान में जुड़ते जा रहे हैं यह सोचे बिना ही कि उसके पारित होने से किस तरह के फायदे आम जनता को होंगे, नुकसान किस रूप में होगा या फिर सीवीसी की तरह बिना नाखूनों, दांतों का शेर खोखली गुर्राहट के दम पर भ्रष्टों को डराएगा ?
भ्रष्टाचार के कड़वी कहानियां, पढ़ पढ़ के लोग यह मान चुके हैं कि देश का लोकतंत्र भ्रष्टाचारियों के काले कारनामों से खुद को बीमार महसूस कर रहा है। राजनीति की धमनियों में कैंसर की तरह बस चुके भ्रष्टाचार की कैमो-थेरेपी होनी चाहिए। इस बात के समर्थन में हर खास, आम आदमी का सिर हामी भरने को तैयार बैठा है। क्योंकि यह सिर अब भ्रष्टाचारियों की करनी का फल अपने सिर पर लादे हुए परेशान है। देश की छाती पर मंूग दल रहे भ्रष्टाचारियों को न तो सुप्रीम कोर्ट की परवाह है और न ही उस आम जनता की, जिनके सामने, कुर्सी पाने के लिए पांच साल में एकाध बार गिड़गिड़ाते हुए वोट मांगने के लिए ऐसे लोगों को खड़ा होना पड़ता है। अण्णा को समर्थन देने के लिए हजारों नहीं, लाखों लोग उठ खड़े हुए हैं। बाबा रामदेव ने भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी। विदेशों में जमा काले धन के खुलासे और उसे वापस लाने की मांग की थी। लेकिन केंद्र की सत्ता पर काबिज यूपीए गठबंधन की सरकार दलीलें देकर इससे बचने की कोशिश करती रही। सुप्रीम कोर्ट की कई फटकारों के बाद ले देकर कुछ लोगों के नाम उजागर किए गए। उसके बाद जब बाबा रामदेव पर आरोप लगने लगे तो उनकी मुहिम सुस्त पड़ गई। दरअसल भ्रष्टाचार की परत देश और समाज में इतनी गहरी पैठ बना चुकी है कि उसे उखाड़ना आम आदमी के बस में नहीं रह गया है। एक मामूली से अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार सिध्द होने के बावजूद वर्षों तक कार्रवाई नहीं हो पाती और उसे बचाने के लिए पूरा सरकारी कुनबा लग जाता है। ऐसे में जनता के खून पसीने की कमाई पर डाका डालने वालों, हजारों करोड़ के घोटाले, महाघोटाले करने वालों पर कार्रवाई के लिए निष्पक्ष, हौसलामंद और ईमानदार जनप्रतिनिधि चाहिए। जनता ने बाबा रामदेव को योगगुरू के रूप में देखा, सराहा और उन्हें उनकी उम्मीद से अधिक मान सम्मान भी दिया, लेकिन राजनीति से जुड़ने के उनके फैसलों को जनता पचा नहीं पा रही है। सवाल यह है कि जब आप किसी पर आरोप लगाते हैं भ्रष्ट व्यवस्था, नेता, अफसर को पानी पी पीकर गालियां देते हैं, उसके भ्रष्टाचार पर कसमसाते हैं, तो इस बात की फिक्र भी होनी चाहिए कि हम खुद कितने साफ सुथरे और ईमानदार हैं ? खुद की भ्रष्टता पर हमें न शर्म आती है न ही नैतिकता की याद आती है। यही कारण है कि देश में गांधी एक ही हो सके और अब उनके सत्याग्रही तरीकों को गांधीगिरी का नाम दिया जा चुका है। अण्णा में भी लोग बापू का अक्स देखते हैं। इसकी वजह है उनकी सादगी, सिध्दांत, बेबाकपन और समाज विकास की सोच। आजादी के 64 वर्षों बाद देश को एक और सत्याग्रह की जरूरत आन पड़ी है। सादगी भरी यह जंग तब अंग्रेजों के खिलाफ और अब देश को खोखला कर रहे भ्रष्टाचारियों के खिलाफ। नासिक के पास रालेगन सिध्दी नामक आदर्श गांव बनाने वाले अण्णा को अब पूरे देश की खरपतवार नष्ट करने का जुनून हो गया है। अण्णा के इस कदम से हिली सरकारों, भ्रष्ट नेताओं को तनिक भी शर्म आएगी ? भ्रष्टाचार की कहानियां सुन सुनकर देश का आम तबका इतना बीमार हो गया है कि अब उसे अण्णा हजारे एक अनार की तरह दिख रहे हैं, जो इस नासूर को ठीक करने में कारगर साबित हो सकते हैं।


37 वर्षों से एक ही बिस्तर पर कोमा का दंश झेल रही अरूणा शानबाग को इच्छा मृत्यु दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने भी असहमति जता दी है यानि फिलहाल उसकी मौत अब हरि इच्छा पर ही निर्भर है। पुरूष प्रधान देश में सदियों से नारी शोषण का शिकार होती आई है। खुद को पाक साफ बताने माता सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी थी, अहिल्या को पत्थर की मूरत बनकर श्राप झेलना पड़ा और कृष्णभक्त मीरा को जहर का प्याला पीना पड़ा। पुरूषत्व के दंभ और अत्याचार की कलयुगी परिणिति शाहबानो, नैना साहनी, जेसिका और अब अरूणा शानबाग के रूप में सामने आई है। अरूणा शानबाग की कहानी भी एक बहुत ही भयानक नाइंसाफी की मिसाल है। जो उसके साथ काम करने वाले वार्ड ब्वाय सोहनलाल ने की, क्योंकि अरूणा ने सोहनलाल के खिलाफ अस्पताल प्रबंधन से की थी और जिसकी सजा वह 37 वर्षों से झेल रही है। पर सोहनलाल को सिर्फ 7 बरस की सजा हुई और उसके बाद वह जेल से छूट गया, अब कहां है किसी को मालूम नहीं। नाइंसाफी जो उसके साथ कुदरत ने की है उसकी पीड़ा देखते हुए भी जिंदा रखा और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे इच्छा मृत्यु दिए जाने पर मनाही कर दी।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन पहले अरूणा शानबाग को इच्छा मृत्यु दिए जाने संबंधित खबरें चैनलों पर देखकर इस मुद्दे पर खुद को लिखने से नहीं रोक पाया। यह महज एक संयोग भी हो सकता है कि जिस दिन 27 नवंबर 1973 को अरूणा शानबाग के साथ अत्याचार हुआ, उसके 4 दिन पहले ही यानि 23 नवंबर 1973 को मैंने भी इस नश्वर संसार में जन्म लिया। अब जब महिला दिवस के एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है 7 मार्च को, तो 8 मार्च यानि महिला दिवस का दिन भी मेरे लिए खासा महत्व रखता है मेरे लिए, क्योंकि इसी तारीख को मेरे जीवन में एक नारी का प्रवेष हुआ था। जो मेरी अर्धांगिनी है।
दुनिया में नारी पर हुए अत्याचारों की दास्तान बहुत लंबी है। नारी सिर्फ उपभोग की चीज है या फिर अत्याचार किए जाने का सामान ? मैं तो यह सोचता हूं कि जो पुरूष इस दंभ के साथ जीता है कि वह पुरूष है, उसे भगवान को एक बार जरूर नारी बनने का मौका देना चाहिए। बचपन में घर से शुरू हुआ भेदभाव, जवानी में जमाने की तीखी नजरों से खुद को बचाए रखने की कवायद, शादी के बाद ससुराल में मिले दंश, नौ महीने तक गर्भ में पल रहे शिशु का बोझ, चिंता, प्रसव पीड़ा और जिंदगी में कई तरह के संघर्ष से लदी नारी के मुकाबले पुरूष का जीवन काफी सरल होता है। संघर्ष तो पुरूष के हिस्से में भी कम नहीं होते, लेकिन जो शारिरिक कष्ट एक नारी सहती है, उसकी तुलना पुरूष से किया जाना तो संभव ही नहीं।
इसके साथ ही नारी की महानता को भी कम नहीं आंका जा सकता, एक मां, बहन, पत्नी और बेटी के रूप में पुरूष को उसका सहयोग अविस्मरणीय होता है। लेकिन नारी पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि अगले जनम मोहे बिटिया न दीजो। अधिकतर लोगों की आस होती है कि उनके घर में पहले बेटा ही जन्म ले, बिटिया का नंबर उसके बाद हो। इसका सबसे बड़ा कारण की बेटे को कुलदीपक यानि वंश को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है। क्या कोई यह चाहेगा कि उसका वंश आगे न चले। लेकिन जब कुलदीपक घर-परिवार का नाम रोशन करने की बजाय घर को ही फूंक देते हैं। तब याद आती है कि इससे अच्छा तो भगवान मुझे एक बेटी दे देता। बुजुर्ग मां-बाप के साथ रहते हुए भी बेटे को उसकी कोई खास चिंता नहीं होती, लेकिन ससुराल में रहते हुए भी बेटियां अपने मां-पिता की बराबर चिंता करती हैं। यह एक बड़ी बहस का मुद्दा है कि स्त्री और पुरूष में क्या अंतर हैं जो उनके सामाजिक जीवन पर कितना अंतर, किस तरह से डालते हैं। बहरहाल बात अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की है, अरूणा शानबाग की है, जेसिका, शाहबानो, नैना साहनी पर हुए अत्याचार की है। मेरा तो यही मानना है कि चाहे जितने भी अधिकार संविधान में नारी को मिल जाएं, पर उसका असली सम्मान तब होगा, जब पुरूष वर्ग अपना दंभ छोड़कर यह मानने को तैयार हों कि स्त्री और पुरूष एक ही रथ के दो पहिए है। जिस तरह ताली एक हाथ से नहीं बजती, उसी तरह स्त्री के बिना पुरूष का और पुरूष के बिना स्त्री का जीवन अधूरा है। लेकिन यह बात देश नारियों पर अत्याचार करने वालों को आखिर कब समझ में आएगी ?


बाबा रामदेव ने विदेशों में जमा कालेधन को उजागर करने की पैरवी की है, पर दांव उल्टा पड़ गया और अब उनके वक्तव्यों से खार खाए लोग, उनके ट्रस्ट की संपत्ति का खुलासा करने की मांग कर रहे हैं। यह तो सर्वविदित है कि जिनके घर शीशे को हों, वे दूसरे के घरों पर पत्थर न उछालें, वरना नुकसान शीशे के घर में रहने वालों का ही अधिक होगा। बाबा रामदेव का फेंका हुआ तीर अब बूमरेंग की तरह वापिस लौटकर उन्हीं की तरफ आ रहा है। योगगुरू को यह तो सोच लेना चाहिए था कि राजनीति नाम की तलवार हर क्षेत्र पर लटक रही है, चाहे वह संसद हो, मीडिया हो या फिर अन्य उपक्रम, राजनीति की जद में हर कोई आ चुका है, तो योगगुरू कैसे राजनीति से बच सकते हैं, वह भी तब, जब उन्होंने राजनीति में आने का फैसला कर लिया है।
बहुत पुरानी कहावत है कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे यानि दूसरों को उपदेश देने वाले बहुत मिल जाएंगे। उपदेश देना बहुत आसान है, खुद उन बातों पर अमल करना उतना ही मुश्किल। कलयुग में पाप बढ़े हैं, अत्याचार बढ़े हैं, मानवीयता रोज तिल-तिल कर मरती जा रही है। तो लोगों के मन में आध्यात्मिकता भी जमकर हिलोरें मार रही हैं। लगता है कि सतयुग, तेत्रायुग, द्वापरयुग और कलयुग में से, सबसे ज्यादा आध्यात्मिकता कलयुग में ही हो सकती है। हर रोज नया बाबा, नया प्रवचनकर्ता चैनलों पर दिखने लगे हैं। अहम् बात तो यह है कि तरह तरह के उलजलूल हरकतों, रहन-सहन से मानव जाति ने अपने लिए नई-नई मुश्किलें खड़ी की हैं। अब उनसे उबरने के लिए सबसे सस्ता और सरल तरीका उन्हें यही नजर आता है कि सीधे किसी बाबा की शरण में जाओ। कहा जाता है कि बिना गुरू के, भगवान नहीं मिलते, क्योंकि भगवान तक पहुंचने का ज्ञान और मार्ग गुरू ही बता सकते हैं। लेकिन गुरूओं को लेकर भी कई तरह के भ्रम की स्थिति है। देश में चल रहे एक बड़े पंथ के बाबा कहते हैं कि मांसाहार मत करो, यह राक्षसी प्रवृत्ति है। वहीं उसके समकक्ष चल रहे दूसरे पंथ के बाबा कहते हैं कि जो मन में आए वही करो, यदि मांसाहार करने की इच्छा है तो करो, इसमें कोई बुराई नहीं। बाबाओं के भक्त ऐसे मामले पर अलग-अलग तर्क देते हैं। पानी पियो छान के, गुरू बनाओ जान के जैसी बातें अब दरकिनार होने लगी हैं। लोग एक दूसरे के झांसे में आकर बिना किसी परख के बाबाओं को अपना हितचिंतक, दुख दर्द दूर करने और मुक्ति दिलाने वाला मानने लगे हैं। मुझे भी कई रिश्तेदारों ने तरह-तरह के तर्क देकर किसी गुरू, किसी बाबा का भक्त बनने के लिए कई खूबियां गिनाई। उन्हें चमत्कारी पुरूष बताया। सन् 2005 में दिल्ली में मैंने खुद अंधभक्ति की मिसाल देखी। एक विशाल प्रवचन शिविर में तीन दिनों तक रहा और कई प्रपंच देखे। बाबा की भक्त एक महिला, जो सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। वह सुबह सुबह ही शिविर में आसपास मौजूद भक्तों को मिठाई बांट रही थी और काफी खुश थी। मैंने जिज्ञासावश पूछ लिया कि क्या बात है किस बात की मिठाई बांटी जा रही है। महिला ने बताया कि उसका प्रमोशन हो गया है, अब वह प्रिसीपल बन गई है और यह सब बाबा का चमत्कार है। मैंने बातों ही बातों में उसकी बेटी से कुछ और जानकारियां ली, तो पता चला कि पिछले डेढ़ वर्ष से महिला के प्रमोशन की प्रक्रिया चल रही थी और इसी के तहत् उन्हें स्कूल का प्राचार्य बनाया गया है। भला बताईए, इसमें बाबा ने क्या चमत्कार किया, जो सरकारी प्रक्रिया थी उसी के कारण प्रमोशन हुआ, लेकिन अंधभक्ति या अंधविश्वास के चलते महिला को सबकुछ बाबा का किया धरा दिख रहा था।
आजकल छत्तीसगढ़ प्रदेश में एक बौध्द भंते बुध्द प्रकाश घूम-घूमकर अंधविश्वास के खिलाफ लोगों को जगाने का काम कर रहे हैं और चमत्कार, जादू के सच से परिचित करा रहे हैं। उनका कहना है कि अशिक्षितों की बात तो दूर है, देश का एक बड़ा शिक्षित वर्ग ही अंधविश्वास की चपेट में है। सबसे पहले उन्हें जगाना होगा।
कालेधन की बात करें तो यह 100 फीसदी सच है कि मठों में, धर्मादा ट्रस्टों में, किसी धर्म-कर्म वाले संस्थानों में जो भी धन आता है, क्या वो मेहनत से, ईमानदारी से, बिना किसी छलकपट के कमाया गया धन होता है ? एक और बात सामने आती रही है कि कई पूंजीपति अपना धन कथित कालाधन धार्मिक संस्थानों में लगाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यही दिखता है कि धार्मिक संस्थानों के प्रति लोगों के मन में एक श्रध्दाभाव होता है, जिसे पहली बार में शक की नजर से नहीं देखा जा सकता। ऐसे में उन पूंजीपतियों के कथित कालेधन की रक्षा हो जाती है। उस धन को अन्य धंधों में भी लगाया जा सकता है। एक सच यह भी है कि देश में जितने भी बाबा नामी हैं, प्रसिध्द हैं, शोहरत वाले हैं, कम से कम मैंने उन्हें किसी गरीब की कुटिया में जाकर भोजन करते नहीं देखा, सुना और पढ़ा है। यानि जो धन देगा, वहीं बाबाओं का कृपापात्र होगा। अमीरों और गरीबों के लिए बाबाओं का अलग-अलग मापदंड एक बड़ा भेदभाव नहीं है ? सोचा जा सकता है कि क्या इस तरह के भेदभाव से कोई गुरू, किसी भक्त को भगवान से मिलवा सकता है ? ईश्वर ने तो गरीब रैदास, तुलसी, वाल्मिकी, मीरा और सूरदास को उनकी संपत्ति, धन धान्य और हैसियत देखकर दर्शन नहीं दिए थे। फिर परमपिता परमेश्वर तक पहुंचाने का दावा करने वाले बाबाओं को ऐसी दरकार क्यों ? लोगों को उपदेश देकर व्यवहार सुधारने, लोभ, मोहमाया से दूर रहने, अत्याचार, भेदभाव नहीं करने की सीख देने वाले बाबा क्या खुद इन चीजों से दूर हैं ? शास्त्रों में तो यही लिखा है कि भगवान का सच्चे मन से, निर्मल भाव से, छलकपट से दूर रहकर ध्यान करो तो एक दिन वे जरूर मिलेंगे। आत्मा में परमात्मा है, यह सोचकर ही कोई कार्य करें तो व्यर्थ के प्रपंच से बच सकते हैं, बाकी सब तो कलयुगी करामातें हैं।


सूनी सड़क पर सुबह-सुबह एक काफिला सा चला रहा था, आगे-आगे कुछ लोग अर्थी लिए हुए तेज कदमों से चल रहे थे। राम नाम सत्य है के नारे बुलंद हो रहे थे। शहर में ये कौन भला मानुष स्वर्गधाम की यात्रा को निकल गया, पूछने पर कुछ पता नहीं चला। मैने एक परिचित को रोका, लेकिन वह भी रूका नहीं। मैं हैरान हो गया, हर चीज में खबर ढूंढने की आदत जो है, तो मैने अपने शहर के ही एक खबरीलाल को मोबाईल से काल करके पूछा। उसने कहा घर पर हूं, यहीं जाओ फिर आराम से बताउंगा। मेरी दिलचस्पी और भी बढ़ती जा रही थी। आखिर शहर के भले मानुषों को हो क्या गया है जो एकबारगी मुझे बताने को तैयार नहीं कि धल्ले आवे नानका, सद्दे उठी जाए कार्यक्रम आखिर किसका हो गया था। फिर भी जिज्ञासावश मैं खबरीलाल के घर पहुंच गया। बदन पर लुंगी, बनियान ताने हुए खबरीलाल ने मुझे बिठाया और अपनी इकलौती पत्नी को चाय-पानी भेजने का आर्डर दे दिया। मैंने कहा, अरे यार, कुछ बताओ भी तो सही, तुम इतनी देर लगा रहे हो और मैं चिंता में पड़ा हुआ हूं कि कौन बंदा यह जगमगाती, लहलहाती, इठलाती दुनिया छोड़ गया। खबरीलाल ने कहा थोड़ा सब्र कर भाई, जल्दी किस बात की है।

फिर उसने गला खंखारकर अपना राग खबरिया शुरू किया, क्या है मित्र, दरअसल देश में इन दिनों महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाला, हत्याएं, लूट अब घर के मुर्गे की तरह हो गए हैं। ऐसा मुर्गा, जिसकी दो-चार नहीं, हजार टांगें हैं, कद भी बहुत बड़ा है, सिर पर मन को मोहने वाली कलगी भी लगी है, लेकिन बेचारा पोलियोग्रस्त है, यानि मजबूर है। अब इस हजार टांग वाले मुर्गे की एक-एक टांग खींच-खांचकर कई घोटालेबाजे, इसकी बलि लेने में लग गए हैं। पहले तो इसे काजू, किसमिस, ब्रेड, बिस्किट, चारा, दाना सबकुछ खिलाया, अब इसका मांस नोचने की तैयारी है।
मैंने कहा, मुर्गे की किस्मत में कटना तो लिखा ही होता है। अब इसमें बेचारे घोटालेबाजों का क्या दोष।
खबरीलाल ने फिर से अपना ज्ञान बघारते हुए कहा, तुम समझ नहीं रहे हो। अरे भाई, मुर्गे को पालने वाली मालकिन के बारे में तुम्हें पता नहीं है। उसने इस कलगी वाले मजबूर मुर्गे को क्यों पाला ? यह मुर्गा लड़ाकू मुर्गों जैसा नहीं है। यह तो बिलकुल सीधा-सादा है, इसने अब तक घर के बाहर दूर-दूर क्या, आसपास की गंदगी पर फैला भ्रष्टाचार का दाना भी कभी नहीं चुगा। मालकिन कहती है कि बैठ जा, तो बैठ जाता है, फिर कहती है कि खड़े हो जा, तो खड़े हो जाता है। बेचारा जगमगाती दुनिया में हो रहे तरह-तरह के करम-कुकर्म से दूर है। लेकिन क्या करें, मालकिन के पड़ोसियों की नजर इस पर कई दिनों से गड़ गई है। इसलिए बिना कोई अगड़म-बगड़म की परवाह किए इसे निपटाने के लिए प्रपंच रचते रहते हैं। इतना स्वामीभक्त है कि एक बार इसके साथी मुर्गे ने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है, तो पता है इसने क्या कहा। इसने कहा कि मेरा नाम तो सुंदरलाल है, फिर भी मालकिन से पूछ कर बताउंगा, बताओ भला, कोई और होता तो इतना आज्ञाकारी होता क्या ? अब ऐसे मुर्गे को भाई लोग बलि चढ़ा देना चाहते हैं।
मैंने झल्लाते हुए कहा कि अरे यार, मैं उस अर्थी के बारे में पूछने आया था और तुमने मुर्गा, मालकिन, घोटाला की कहानी शुरू कर दी।
उसने हाथ उठाकर किसी दार्शनिक की तरह कहा, अरे शांत हो जा भाई, यह सब उसी अर्थी से जुड़ी कहानी का हिस्सा है। असल में गांव, शहर, महानगर के भले लोग, रोज-रोज घोटालों से तंग आ चुके हैं। अब घोटाले हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे, तो भलेमानुषों ने सोचा कि जब घोटाला, भ्रष्टाचार करने वाले इतनी दीदादिलेरी से इतरा रहे हैं, खुलेआम घूम रहे हैं, निडर हैं, बेधड़क हैं, शान से मूंछें ऐंठ रहे हैं, तो हम क्यों स्वाभिमानी, ईमानदार, सदाचारी, देशप्रेमी बने रहें। इसीलिए अपना यह सुघ्घड़ सा चोला उतारकर उसकी अर्थी निकाल दी है और उसे फंूकने के लिए शमशान घाट गए हैं। शाम को श्रध्दांजली सभा भी है, तुम चलोगे ?
मैंने खबरीलाल को दोनों हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर कहा कि धन्य हो श्रीमान, आप और आपका ज्ञान दोनों ही सत्य है।
खबरीलाल ने कहा, याद रखो मित्र कि जीवन का अंतिम सच, राम नाम सत्य ही है। जाने कब, इस सीधे-सादे, कलगीवाले, आज्ञाकारी मुर्गे का भी राम नाम सत्य हो जाए ?

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