विश्व भर में हवाई मौतों का सिलसिला खतरनाक हो चला है। आए दिन आसमानों की उड़ान भरने वाले विमान, हैलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त होते रहते हैं। ऐसे हादसों में लोगों का बचना नामुमकिन होता है। हवा में उड़ती मौतों ने अब तक हजारों जानें ली हैं। एक मामूली सी लापरवाही कई जिंदगियों को लील लेती है। हवाई सेवाओं के खतरों से लोग अनजान नहीं हैं। पहले भी ऐसी वारदातें हुई हैं, जिन्होंने मानव मन को झकझोरा है। ग्वालियर राजघराने के माधवराव सिंधिया, आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत हैलीकाप्टर हादसे से हुई थी। अब अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू भी इस हवाई मौत के शिकार हो गए।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि शिल्पराज विश्वकर्मा देव ने ब्रह्मा के लिए एक पुष्पक नाम के विमान का निर्माण किया था। जो इच्छा अनुसार छोटा या बड़ा किया जा सकता था और आदेश मात्र से ही वह स्वामी की आज्ञा का पालन करता था। कलयुग में वैज्ञानिकों ने विमान और हैलीकाप्टर का अविष्कार किया, जिससे विदेशों में आवागमन के साधन हो सकें और यह धनाढ्य वर्ग, नेताओं, मंत्रियों को कहीं दूर दराज तक कम समय में पहुंचाने का बेहतरीन उपाय भी था। लेकिन समय-समय पर इन विमानों और हैलीकाप्टरों से हुए हादसों ने हजारों लोगों की जानें भी ली हैं। विमानों से हुए कुछ बड़े हादसे इस प्रकार हैं, 1 जनवरी 1978 को अरब सागर में गिरे एयर इंडिया विमान से 213 लोगों की मौत, 19 अक्टूबर 1988 को अहमदाबाद में विमान हादसे से 124 मौतें, 14 फरवरी 1990 में बैंगलोर विमान हादसे में 92 मौतें, 16 अगस्त 1991 को इंफाल विमान हादसे में 69 मौतें, 26 अप्रेल 1993 में औरंगाबाद में हुए हादसे में 55 मौतें, 17 जुलाई 2000 में पटना हवाई अड्डे पर विमान हादसे से 60 मौतें हुई हैं। इसी तरह पिछले वर्ष मैंगलोर हवाई अड्डे पर एक बड़े विमान हादसे में 158 लोगों की मौत हो गई थी।
इसी तरह छत्तीसगढ़ सरकार का हैलीकाप्टर मैना सन् 2007 में लापता हो गया था, कई महीनों तक तलाश के बाद उसका मलबा मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में मिला था और उसमें सवार 4 लोगों की मौत हो चुकी थी। सन 2009 में आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी का हैलीकाप्टर भी लापता हो गया था और कई दिनों की तलाश के बाद हैलीकाप्टर का मलबा मिला था। 5 दिन पूर्व अरूणाचल के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू का विमान भी इसी तरह लापता हो गया था। अब जाकर उसका मलबा मिला है और उनकी मौत हो चुकी है। सवाल यह है कि आखिर हवाई सेवाओं के खतरों से लोग इतने लापरवाह क्यों हैं ? मौसम की खराबी से , पायलट की लापरवाही से, हवाई अड्डों पर विमान उतारते समय हादसे होते रहे हैं। यह तो तय है कि हवाई दुर्घटना में जितना भयानक विध्वंस होता है, उससे किसी का बच पाना नामुमकिन होता है। भौतिकवादी युग में पुष्पक की तरह का विमान बनाया नहीं जा सकता। मशीनी युग के विमानों ने जितनी ज्यादा उपलब्धियां हासिल की हैं, उससे ज्यादा गहरे जख्म भी दिए हैं। आधुनिक परिवेश के इन पुष्पक विमानों से आखिर किस तरह खतरे कम हो पाएंगे ? क्या ऐसे उपाय नहीं किए जा सकते कि हवाई सेवाओं से होने वाले खतरों को टाला जा सके। हमारा मानना तो यह भी है कि मानव चाहे जितनी तरक्की कर ले, प्रकृति से जीत नहीं सकता। क्योंकि प्रकृति से बड़ा कोई भगवान नहीं है।

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