स्व. राहुल देव बर्मन, संगीतकार
जन्मतिथि- 27 जून 1939

जिसके रोने से पंचम सुर निकलता था और पारंपरिक वाद्य यंत्रों से हटकर नए प्रयोगों का केमिकल लोचा जिनके दिमाग में भरा हुआ था। सुमधुर संगीत की रचना में जिनका कोई सानी आज भी नहीं है, संगीत की ऐसी मसीहाई शख्सियत शायद ही दोबारा इस नश्वर संसार में जन्म लेगी। नाम था आर. डी. यानि राहुल देव बर्मन यानि पंचम दा, मां-पिता ने तो उसका नाम राहुल ही रखा था, लेकिन हीरे की पहचान जौहरी ही कर सकता था, अभिनय के क्षेत्र की जानी-मानी शख्सियत दादा मुनि अशोक कुमार ने उनकी असल पहचान की और उन्हें पंचम का उपनाम दिया। उनका कहना था कि रोते वक्त उनके गले से सरगम का पांचवा सुर ‘प‘ निकलता था।
विश्व के श्रेष्ठतम संगीतकारों में से एक और भारतीय संगीत के लिए अलग ही मुकाम बनाने़ वाले राहुल का जन्म 27 जून 1939 में हुआ था। पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। कलकत्ता में बंगाली परिवार में पैदा हुए राहुल देव के संगीत का चरम 70 के दशक में पूरे यौवन पर था और संगीतकार पिता सचिन देव बर्मन के सानिध्य में वाद्य यंत्रों की समझ और उनका प्रयोग करने की ललक पैदा हुई, उस्ताद अकबर अली खां से उन्होंने सरोद बजाने की तालीम ली। उन्होंने कंघी, कांच के गिलास, टेबल, झाड़ू का प्रयोग करके सुमधुर संगीत की रचना कर डाली। आशा भोंसले और रफी साहब का गाया यादगार गीत ‘‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को‘‘जब भी बजता है, तो आर डी के अनूठे प्रयोगों की याद ताजा हो जाती है। पंचम दा को माउथ आर्गन बजाने का बहुत शौक था, देवानंद अभिनीत फिल्म सोलहवां साल के गीत ‘है अपना दिल तो आवारा‘ में उन्हें आर्गन बजाने का मौका मिला तथा ‘दोस्ती‘ फिल्म के यादगार गीतों में संगीत संयोजन कर रहे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए आर डी ने माउथ आर्गन बजाया।
पिता एस. डी. बर्मन की संगीत रचनाओं में सहयोगी के रूप में कैरियर की शुरूआत करते हुए राहुल ने सन् 1957 में गुरूदत्त की फिल्म प्यासा तथा 1958 में गांगुली बंधु यानि अशोक, किशोर व अनूप कुमार अभिनीत ‘चलती का नाम गाड़ी‘ से अपने सफर की शुरूआत की। उसके बाद सन् 1961 में स्वतंत्र रूप से महमूद की फिल्म ‘छोटे नवाब‘ में राहुल ने संगीत दिया। इसके बावजूद वे अपने पिता के संगीत संयोजन में सहयोगी बने रहे। एस. डी. की अंतिम फिल्म आराधना थी, जिसके संगीत को राहुल ने पूरा किया।
पाश्चात्य संगीत का प्रयोग भी भारतीय फिल्मों में उन्होंने ही किया और दम मारो दम, दुनिया में लोगों को, ओ हसीना जुल्फों वाली, दोस्तों से प्यार किया जैसे गीतों पर युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। 70 के दशक में किशोर कुमार की गायकी, राजेश खन्ना के अभिनय और राहुल देव बर्मन के सुमधुर संगीत ने तो जैसे धूम ही मचा दी थी। कहा जाता है कि राजेश खन्ना के कैरियर को उंचाई तक मुकाम देने में पंचम दा के संगीत का बहुत बड़ा हाथ था। शम्मी कपूर अभिनीत तीसरी मंजिल फिल्म में संगीत देने के लिए जब नासिर हुसैन ने राहुल देव बर्मन को चुना, तो शम्मी नाखुश थे, वे शंकर-जयकिशन को बतौर संगीतकार लिए जाने की सिफारिश करते रहे। पर जब तीसरी मंजिल में मोहम्मद रफी तथा आशा भोंसले के गीतों ने देश भर में धूम मचाई, तब शम्मी को अहसास हुआ पंचम दा की अनोखी प्रतिभा का। उनके जीवन का अहम् मुकाम ‘पड़ोसन फिल्म के साथ भी जुड़ा हुआ है। हास्य रस से भरपूर इस फिल्म के गीत आज भी लोग गुनगुनाते हैं, खास कर ‘मेरे सामने वाली खिड़की में‘। जितना दम उनके पाश्चात्य संगीत से सजे गीतों में होता था, उतनी ही कशिश और गंभीरता गुलजार के गीतों पर दी गए धुनों में भी होती थी। आंधी, किनारा, खूशबू, परिचय, इजाजत जैसी फिल्मों का संगीत अलग ही अहसास दिलाता है।

उनका विवाह 1966 में रीता पटेल से हुआ लेकिन मनमौजी आरडी उनसे 5 साल में ही अलग हो गए और सुरों की मलिका आशा भोंसले से 1980 में शादी कर ली। पंचम दा ने आशा ताई के साथ कई गाने भी गाए। 2 फिल्मों अभिनय व 18 फिल्मों में गाने गाने वाले गुणी संगीतकार पंचम दा के कैरियर में आर्थिक तंगी भी आड़े आती रही, पर वे पूरी तन्मयता के साथ संगीत के क्षेत्र में डटे रहे। शोले, यादों की बारात, खेल खेल में, महबूबा, आपकी कसम, किनारा, कारवां, मासूम, बेताब, सागर जैसी फिल्मों में संगीत देकर कई पुरूस्कार जीते और भारतीय संगीत के मसीहा के रूप में स्थापित हो गए। अपने जीवन का अंतिम संगीत उन्होंने फिल्म 1942-ए लव स्टोरी के लिए दिया और फिल्म रिलीज होने से पहले ही वे 4 जनवरी 1994 को दुनिया छोड़ गए। मौसिकी के ऐसे अभूतपूर्व मसीहा राहुल देव बर्मन को मेरा शत् शत् नमन्।


17 जून का इतिहास यानि दो प्रसिध्द नारियों पर चर्चा का दिन, इसलिए कि आज ही के दिन एक ने जंग के मैदान में अपनी मर्दानगी दिखाकर अंग्रेजों के हौसले पस्त कर दिए और मातृभूमि पर कुर्बान हो गई। दूसरी पर किस्मत ही इतनी ज्यादा मेहरबान थी कि उसकी मौत के बाद उसके मजार पर दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत गढ़ी गई। जिसे लोग प्रेम का अनूठा प्रतीक मानते हैं। पर इनमें एक समानता है कि वे दोनों ही मातृत्व सुख नहीं पा सकीं।

पहली नारी मनु यानि खूब लड़ी मर्दानी, झांसी वाली रानी लक्ष्मीबाई की चर्चा आती है, तो नारियों के रौद्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हाथ में तलवार लेकर अंग्रेजों को ललकारती तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। वाराणसी के भदैनी में 19 नवंबर 1828 को मोरोपंत तांबे के घर जन्मी मणिकर्णिका उर्फ मनु का बचपन ही संघर्षों से शुरू हुआ, 4 वर्ष की उम्र में उसकी मां दुनिया छोड़ गए।
पिता मोरोपंत की लाडली छबीली ने कम उम्र में ही अस्त्र शस्त्र थाम लिए, और मराठा सम्राट पेशवा बाजीराव के राज्य की अपनी प्रतिभा के बल पर अलग पहचान बनाई।
सन् 1842 में झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर से परिणय के बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन वह भी चार महीने बाद काल कवलित हो गया। गंगाधर राव का स्वास्थ्य भी खराब रहता था, उन्होंने दामोदर राव को दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया और एक दिन वह भी छोड़ गए दुनिया को। उसके बाद झांसी का राजकाज रानी लक्ष्मीबाई ने सम्हाला। अंग्रेज हिन्दुस्तान को अपनी हड़प नीति के तहत् कब्जाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और खजाने पर कब्जा कर लिया। लेकिन फौलादी इरादों से लबरेज लक्ष्मीबाई आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की फौज भी तैयार की। तात्या टोपे के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए और 17 जून 1858 को अंग्रेजों से लोहा लेते वक्त रानी घायल हो गई तथा ग्वालियर में दम तोड़ दिया। इतिहास के पन्नों में दर्ज रानी लक्ष्मीबाई की मर्दानी छवि आज भी नारी शक्ति का प्रतीक है।

चर्चा अब दूसरी नारी पर यानि ताजमहल की मलिका, शाहजहां की बेगम मुमताज महल की। विश्वप्रसिध्द सबसे खूबसूरत मकबरा तो मुमताज महल की किस्मत में ही लिखा था, जिसे संसार में कोई पार नहीं पाया। जीते जी मुमताज ने यह स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी याद में बना ताजमहल विश्व की अनमोल धरोहरों में से एक होगा। शाहजहां की प्रेमसे लबालब परिकल्पना और मंजे हुए कारीगरों के सिध्दहस्त से निकली कलाकारी ने ताज को जो मशहूरियत दी, उसकी
कोई दूसरी मिसाल अब तक नहीं मिल सकी है। अप्रेल 1593 में मुगल सम्राट जहांगीर की मलिका नूरजहां के भाई अब्दुल हसन असफ खान के यहां जन्मी अर्जुमंद का निकाह शाहजहां से 19 वर्ष की उम्र में हुआ था। अर्जुमंद को शाहजहां ने मुमताज का नाम दिया। वह शाहजहां की तीसरी पत्नी थी, लेकिन खूबसूरत मुमताज मुगल सम्राट की सबसे चहेती बन गई। 17 जून 1631 को बुरहानपुर में बेटी गौहारा बेगम को जन्म देने के बाद मुमताज चल बसी। उसे आगरा में जिस स्थान पर दफनाया गया, उस मजार पर शाहजहां ने संगमरमर से ताजमहल बनवाया। जो आज विश्व प्रसिध्द धरोहर बन चुका है।
शाहजहां के प्रेम का चरम अद्भुत था, जिसकी कल्पना को साकार करने के लिए हजारों हाथी, घोड़े, कारीगर लगाकर वर्षों की मेहनत के बाद एक खूबसूरत ताज बन सका। लेकिन इतिहास में शाहजहां की एक कलंकित करने वाली गलती सदियों तक मानवता के नाम पर लानत बनी रहेगी कि जिन हाथों ने ताज को खूबसूरत शक्ल दी, बादशाह ने उन कारीगरों के हाथ तक कटवा दिए, ताकि कोई दूसरा ताजमहल न बन सके। एक इतिहासकार पी एन ओक ने ‘ताजमहल इज ए आफ हिन्दू टेम्पल पैलेस‘ नामक पुस्तक में 100 से अधिक तर्क दिए हैं कि यहां भगवान शिव का पांचवा रूप अग्रेश्वर महादेव नागेश्वर नाथ विराजित है। हालांकि चर्चा इस विषय से अलग है, इसलिए आगे की बात नारी सशक्तिकरण पर, दुनिया में नारी शक्ति ने समय समय पर अनेक मिसालें कायम की है।
आधुनिक होते भारत में अलग-अलग विधाओं, कलाओं से नारियों ने देश को गौरन्वित किया है, मान बढ़ाया है। लेकिन नारी का प्रतिनिधित्व मुमताज महल और वीरांगना लक्ष्मीबाई ही करती दिखती हैं। लक्ष्मीबाई साहस का, संघर्ष का प्रतीक है और दुनिया के अलग-अलग हिस्से में
साहस के साथ, समाज के बंधनों व मर्यादाओं के बीच, जुल्म सहती, आस्तित्व के लिए जूझ रही नारी किसी न किसी रूप में महारानी लक्ष्मीबाई को आत्मसात करती दिखती है। वहीं दूसरी ओर आधुनिक परिवेश में बदलती संस्कृति के बीच प्रेम की पींगे बढ़ाने वाली युवतियां मुमताज महल जैसी किस्मत पाने को बेचैन दिखती हैं। शाहजहां के प्रेम का अनोखा और खूबसूरत मकबरा ताजमहल देखकर जैसे मन में एक टीस उठती है और हिलारें मारते प्रेम का पावन पाठ पढ़ते हुए अपने प्रेमी से प्रेमिका इठलाती हुई कहती है, तुम मेरे लिए ताजमहल कब बनवाओगे !

14 जून - विश्व रक्तदाता दिवस पर विशेष
छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर की हरी-भरी धरती आए दिन लहू से लाल हो रही है। रोजाना लोग मारे जा रहे हैं, कभी पुलिस जवान, कभी नक्सली, कभी एसपीओ तो कभी भोले-भाले आदिवासी। बड़ा सवाल है कि आखिर ये अंधा युध्द कब खत्म होगा ? ऐसा लग रहा है जैसे अंग्रेजी उपान्यासकार ब्रैम स्टोकर का काल्पनिक पात्र डैकुला बस्तर में अपनी रक्तपिपासु इच्छा के साथ पूरे वेग से वर्चस्व कायम कर रहा है। दुनिया को अमन चैन की जरूरत है न कि नरसंहार की। इसीलिए जब भी धरती से किसी आततायी का अंत होता है तो पूरे विश्व में उस पर तीखी प्रतिक्रिया होती है, लोगों को तसल्ली होती है, दिली सूकुन मिलता है। धरती को लहू से सराबोर करने वालों का अंत कभी अच्छा नहीं रहा है, इतिहास इसका गवाह है। एडोल्फ हिटलर, मुसोलिनी, नेपोलियन बोनापार्ट, सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन लादेन समेत दुनिया में तमाम आततायी हुए हैं, जिन्होंने मानवता को कलंकित किया है, खून की होलियां खेली हैं, इन सबका हश्र दुनिया को पता है।
वर्तमान परिवेश में भले ही दुनिया की दूरी लोगों से सिमटकर कम होती जा रही है और विश्व के किसी भी कोने का परिदृश्य चंद मिनटों
में जाना जा सकता है। आधुनिक होते युग में बस्तर का नक्सलवाद भले ही अत्याधुनिक हथियारों के बल पर जवानों का खून बहाता रहे, एंटी लैंडमाइन गाड़ियों को ध्वस्त कर अपनी सफलता पर खुश होता रहे या फिर पुलिस और फौजी जवान नक्सलियों को मारकर फक्र महसूस करते रहें। लेकिन सच तो यही है कि ऐसे अंधे युध्द से न तो मानव जाति का भला हो सकता है और न ही किसी तरह का कोई विकास हो सकता है। दुनिया में मानववाद के लिए तमाम प्रयोग हुए हैं और कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। जिस रक्त की एक बूंद का महत्व अधिकतर लोग अब तक नहीं समझ पाए है, उसके लिए सैकड़ों वर्षों से वैज्ञानिकों ने कितना परिश्रम किया है। यह जानकर हैरानी होगी कि लगभग 500 वर्षों की मेहनत के बाद आज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह सफलता मिल सकी है कि किसी भी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का खून सुरक्षित तरीके से आधान कर उसकी जान बचाई जा सकती है। यदि एक व्यक्ति अपने शरीर का अनमोल रक्त देकर दूसरे की जिंदगी बचाता है तो ऐसा कार्य महादान की श्रेणी में आता है। रक्तदान और आधान के संबंध में जो जानकारियां अब तक सामने आई हैं वे कम दिलचस्प नहीं हैं। रक्ताधान के संबंध में 17 वीं शताब्दी के इतिहास लेखक स्टीफैनो इन्फेसुरा ने प्रथम ऐतिहासिक प्रयास का सर्वप्रथम वर्णन करते हुए लिखा है कि सन् 1492 में जब पोप इन्नोसेंट गहन मूर्छा (कोमा) में चले गए,
तो एक चिकित्सक के सुझाव पर जीवन के अंतिम क्षणों में पोप (बिशप) के शरीर में तीन लड़कों का रक्त डाला गया (मुख से, क्योंकि परिसंचरण की अवधारणा एवं अंतःशिरा प्रवेश की विधियां उस समय अस्तित्व में नहीं थी)। लड़के दस वर्ष की उम्र के थे, और उनमें से प्रत्येक को एक सोने के सिक्के देने का वचन दिया गया था. हालांकि पोप नहीं बच सके। कुछ लेखकों ने इन्फेसुरा पर पोपवाद का विरोधी होने का आरोप लगाते हुए उसके विवरण को सही नहीं माना।
रक्ताधान संबंधी परिष्कृत अनुसंधान 17 वीं सदी में शुरू हुआ, जिसमें पशुओं के बीच रक्ताधान संबंधी सफल प्रयोग हुए। लेकिन मनुष्यों पर किए जाने वाले क्रमिक प्रयासों का परिणाम घातक बना रहा। सर्वप्रथम पूर्ण रूप से दस्तावेजीकृत मानव रक्ताधान फ्रांस के सम्राट लुई के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. जीन बैप्टिस्ट डेनिस द्वारा जून 15, 1967 में किया गया। उन्होंने एक भेड़ का रक्ताधान एक 15 वर्ष के लड़के में किया, जो रक्ताधान के बाद जीवित बच गया। डेनिस ने एक मजदूर का भी रक्ताधान किया और वह भी जीवित बच गया। दोनों उदाहरण संभवत रक्त की छोटी मात्रा के कारण थे जिसका वास्तव में इन लोगों में रक्ताधान किया गया था. इसने उन्हें ऐलर्जी संबंधी प्रतिक्रिया का सामना करने की अनुमति प्रदान की. रक्ताधान से गुजरने वाला डेनिस का तीसरा मरीज स्वीडिश व्यापारी बैरन बॉन्ड था. उन्होंने दो आधान प्राप्त किए. दूसरे आधान के बाद बॉन्ड की मृत्यु हो गई। पशु रक्त के साथ डेनिस के प्रयोगों ने फ्रांस में एक गर्म विवाद छेड़ दिया, अंततः 1670 में इस प्रक्रिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सही समय पर, ब्रिटिश संसद और यहां तक कि पोप ने भी यही किया. रक्ताधान अगले 150 वर्षों के लिए गुमनामी में चला गया।
रक्त आधान का विज्ञान 19 वीं सदी के प्रथम दशक के समय तक पुराना है जब भिन्न रक्त प्रकारों के परिणामस्वरूप आधान के पूर्व रक्त दाता एवं रक्त प्राप्तकर्ता के कुछ रक्त मिश्रित करने की परिपाटी शुरू हुई।
1818 में, ब्रिटिश प्रसूति-विशेषज्ञ, डॉ. जेम्स ब्लूनडेल ने प्रसवोत्तर रक्तस्राव का उपचार करने के लिए मानव रक्त का प्रथम सफल रक्ताधान संपादित किया. उन्होंने मरीज के पति का दाता के रूप में उपयोग किया, और उसकी पत्नी में आधान करने के
लिए उसकी बांह से चार औंस रक्त निकाला। वर्ष 1825 और 1830 के दौरान डॉ. ब्लून्डेल ने 10 आधान संपादित किए, जिनमें से पांच लाभप्रद रहे, और उन्होंने उनका परिणाम प्रकाशित किया. उन्होंने रक्त के आधान के लिए कई उपकरणों का भी आविष्कार किया. अपने प्रयास से उन्होंने बहुत अधिक मात्रा में रूपया अर्जित किया, जो लगभग 50 मिलियन (1827 में लगभग 2 मिलियन) वास्तविक डॉलर (मुद्रास्फीति के लिए समायोजित) था।
1840 में सेंट जार्ज मेडिकल स्कूल लंदन में डॉ. ब्लून्डेल की सहायता से सैमुएल आर्मस्ट्रांग लेन ने प्रथम संपूर्ण रक्ताधान संपादित किया। रक्त संबंधी प्रयोगों के लिए जॉर्ज वॉशिंगटन क्राइल को क्लीवलैंड क्लिनिक में सीधे रक्ताधान का उपयोग कर शल्य-चिकित्सा संपादित करने का श्रेय दिया जाता है। सन् 1901 तक कई रोगियों की मृत्यु हो चुकी थी, जब ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिक डा. कार्ल लैंडस्टेनर ने मानव रक्त समूहों की खोज की, जिससे रक्ताधान सुरक्षित हो गया। दो व्यक्तियों के रक्त का मिश्रण रक्त का एकत्रीकरण या संलग्नता उत्पन्न कर
सकता है, एकत्रित लाल कोशिकाओं में दरार पड़ सकती है और वे विषाक्त प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर सकती हैं जिनके घातक परिणाम हो सकते हैं। कार्ल लैंडस्टेनर ने देखा कि रक्त का एकत्रीकरण एक रोगक्षमता संबंधी प्रक्रिया है जो उस समय उत्पन्न होता है जब रक्ताधान के प्राप्तकर्ता में दाता रक्त कोशिकाओं के विरुद्ध रोग-प्रतिकारक (ए,बी, ए एवं बी दोनों, या कोई भी नहीं) होते हैं. कार्ल लैंडस्टेनर के कार्य ने रक्त समूहों (ए, बी, एबी, ओ) के निर्धारण को संभव बना दिया एवं इस प्रकार सुरक्षित रूप से रक्ताधान क्रियान्वित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इस खोज के लिए उन्हें 1930 में शरीर विज्ञान एवं चिकित्सा के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हीं की याद में विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है।
1930 के अंतिम दशक एवं 1940 के दशक के आरंभ में, डॉ. चार्ल्स आर. ड्रियू के अनुसंधान ने इस खोज को जन्म दिया कि रक्त को रक्त प्लाज्मा एवं लाल रक्त कोशिकाओं में विभाजित किया जा सकता है एवं प्लाज्मा को अलग से जमाया जा सकता है। इस तरह से जमाया गया रक्त अधिक लंबे समय तक कायम रहा एवं उसके दूषित हो जाने की संभावना काफी कम थी।
1939-40 में एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली, जब डा. कार्ल लैंडस्टेनर, एलेक्स वीनर, फिलिप लेविन, एवं आर.ई. स्टेटसन ने रीसस रक्त समूह प्रणाली की खोज की, जिसे उस समय तक आधान संबंधी बहुसंख्यक प्रतिक्रियाओं का कारण माना गया। तीन साल बाद, जे.एफ. लूटिट एवं पैट्रिक एल. मॉलिसन के द्वारा स्कन्दनरोधी की मात्रा को कम करने वाले एसिड- साइट्रेट-डेक्स्ट्रोज (एसीडी) के घोल के व्यवहार ने अधिक परिमाण में रक्ताधान एवं दीर्घावधि तक भंडारण की अनुमति प्रदान की।
कार्ल वाल्टर और डब्ल्यू. पी. मर्फी जूनियर ने 1950 में रक्त संग्रह के लिए प्लास्टिक बैग के व्यवहार की शुरूआत की. भंगुर कांच के बोतलों की जगह टिकाऊ प्लास्टिक बैग के व्यवहार ने खून की एक संपूर्ण यूनिट से बहु रक्त अवयव की सुरक्षित एवं सरल तैयारी के लिए सक्षम एक संग्रह प्रणाली के विकास की अनुमति प्रदान की। इस तरह दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने मानव जाति को जीवन देने संबंधी रक्तदान पर अपना योगदान दिया है। मेरा स्वयं का अनुभव रहा है कि अपने सगे संबंधियों परिचितों को रक्तदान करने से कई लोग परहेज करते हैं। शहरी क्षेत्रों में तो कई संस्थाएं ऐसे कार्यों में लगी होती हैं, जिससे आसानी से खून उपलब्ध हो जाता है। लेकिन ग्रामीण तथा कस्बाई क्षेत्रों में जागरूकता के अभाव में यह समस्या अब भी बरकरार है। डाक्टरों के अनुसार एक बार रक्तदान करने के बाद तीन महीने तक दोबारा रक्त नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन कुछ लोग मजबूरी के चलते या फिर नशे से पीड़ित अपना शौक पूरा करने के लिए खून बेच देते हैं। लहू चाहे बस्तर में बहे या भारत-पाकिस्तान की सरहद पर या फिर विश्व के किसी भी हिस्से में, उसे किसी भी तरह से सही नहीं माना जा सकता। मानवता के लिए विश्व को शांति की जरूरत है न कि अंधे युध्द की। ऐसे में किसी का रक्त बहाने से ज्यादा जरूरी है जीवन देना। इसलिए रक्तपिपासा छोड़कर रक्तदाता बनना बेहतर है। इसीलिए तो कहा गया है कि
जीना तो है उसी का, जिसने ये राज जाना,
है काम आदमी का, औरों के काम आना।

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