विश्व मजदूर दिवस


जिंदगी में सफल होने के लिए दो चीजों की काफी जरूरत है, हिम्मत और मेहनत। हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, मेहनत करने वाले कभी विफल नहीं होते। दुनिया की संरचना में भी मेहनत करने वाले श्रमवीरों ने समय-समय पर नए इतिहास रचे हैं। अपना पसीना बहाकर आसमान छूती इमारतों को खड़ा करने वाले आज भी जमीन पर हैं और बुलंद इमारतों के उपर खड़ा धनाढ्य वर्ग मुस्कुराता हुआ इठला रहा है।
आज जिस खूबसूरत इमारत ताजमहल को देखने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। इस अजूबे को देखकर रोमांच सा महसूस करते हैं, शाहजहां को याद करते हैं, मुमताज की कहानियां कहते हैं, इसे प्यार का प्रतीक बताते हैं, पर उन श्रमवीरों को भूल जाते हैं, जिनकी कारीगरी का कोई सानी नहीं था। इतना सुंदर ताजमहल खड़ा करने के एवज में उन्हें क्या मिला ? बादशाह ने उनके हाथ कटवा दिए। इसलिए कि वे कोई दूसरा ताजमहल न बना सकें। क्या उनकी कारीगरी का यही वाजिब इनाम था ?
श्रमिकों का शोषण तो हर सदी में होता रहा है। मुगल काल में भी मजदूर वर्ग गुलाम की तरह थे। अंग्रेज भारत में आए तो यहां के लोगों को मजदूर से अधिक नहीं समझते थे। कोई भी मेहनत का काम वे भारतीयों से ही कराते थे। मजदूरों पर अत्याचार का सिलसिला आजाद भारत में भी खत्म नहीं हुआ और अब जब देश में कई यूनियन बन गए तब भी मजदूर वहीं का वहीं है। मजदूरों के हित में बने संगठन उनका कितना भला करते हैं, यह कहने को बाकी नहीं रहा। कुछेक मामले अपवाद हो सकते हैं, पर अधिकतर मामलों में मजदूर को उनका हक नहीं मिल पाता। छत्तीसगढ़ के मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के समय में एक क्रांति शुरू हुई थी मजदूरों को वाजिब हक दिलाने की। नियोगी की तर्कशक्ति और आक्रोश के आगे अच्छे-भले उद्योगपति ठहर नहीं पाते थे। लेकिन शोषक वर्ग की आंख का कांटा बन चुके नियोगी को मौत की नींद सुला दिया गया। यह दुनिया का दस्तूर ही है कि जो संघर्ष के लिए आगे आएगा, उसे तमाम समस्याएं झेलनी तो पड़ेंगी ही। मजदूरों के लिए सरकारों ने कई तरह के नियम-कानून बनाए हैं ताकि उन्हें उनके हक की कमाई मिलनी सके। लेकिन राजनीति की शह पर पलती नौकरशाही और उद्योगपतियों की मिलीजुली साजिशों ने श्रमवीरों के पसीने का पूरा हक नहीं मिलने दिया है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में पलायन की समस्या अब भी बरकरार है। सवाल यह उठता है कि जब सरकारें मजदूरों के लिए कई काम प्रदेश में ही उपलब्ध करा रही है, तो आखिर पलायन क्यों ? अपने बीवी बच्चों को लेकर दूसरे प्रदेशों में जाने वाले मजदूर वर्ग कई बार ठेकेदारों और दबंगों के चंगुल में फंस जाते हैं। उसके बाद तो न उनका परिवार सुरक्षित रह पाता है और न ही उसकी मेहनत की कमाई उसे मिल पाती है। आए दिन प्रशासन के पास बंधुआ मजदूरों के मामले आते रहते हैं। मजदूर की मजबूरी का फायदा उठाने
वालों को सोचना चाहिए कि आखिर उसकी मेहनत और कारीगरी से ही हम एक अदद घर-मकान में रहने का सुख हा
सिल कर पाते हैं। आखिर किसने धरती पर खड़ी इमारतों को विशाल और बुलंद बनाया, दुनिया में मिली सुख-सुविधाओं के लिए किसने पसीना बहाया, यह गंभीर सोच का विषय है। मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसके हक की कमाई मिल जानी चाहिए। लेकिन मजदूरों का खून चूस चूस कर एयर कंडीशनर कमरों में बैठने वाले, महंगी
लग्जरी गाड़ियों में घूमने वाले, मजदूरों को हेय दृष्टि से देखने वाले यह तक नहीं सोचते कि दुनिया में मजदूर न होते तो यह विश्व कैसा दिखता, कैसा लगता ? मजदूर, कालका, मजदूर जिन्दाबाद, कुली, काला पत्थर, इंसाफ की आवाज जैसी कई फिल्मों में मजदूर वर्ग के साथ हो रहे शोषण को दिखाया गया है। ऐसे मौके पर दिलीप कुमार अभिनीत मजदूर फिल्म का यह गीत भारत के एक मजदूर की आकांक्षा को चिन्हांकित करता है।

हम मेहनतकश इस दुनिया से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे
इक बाग नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।

आने वाले दिनों में मजदूरों की जीवनशैली बदलेगी, उनके हक की कमाई मिलेगी या फिर शोषक वर्ग मजदूरों की मेहनत और पसीने की कमाई पर साजिशें रचकर, उनका हक मारकर ऐसे ही इठलाता रहेगा, यह अंत्यंत सोचनीय है ।

कितना औद्योगिकरण जरूरी है ?


उद्योगों की चिमनियों से निकलता काला-सफेद धुआं, सरकारी जमीनों पर कब्जा करती राख, कम होती कृषि भूमि और जनता का विरोध, इन उद्योगों के लगने से देश, प्रदेश, शहर, गांव का विकास होगा, या फिर लोगों के हिस्से में आएगा धूल, धुआं और राख, बढ़ेगा तापमान, तो गर्मी से कैसे निजात पाएंगे लोग, धान का कटोरा बन जाएगा का राख का कटोरा, इसलिए ऐसे औद्योगीकरण के पहले ग्लोब वार्मिंग पर विचार करना भी जरूरी है। पर्यावरण के सौदागर भूल चुके हैं कि जो हम प्रकृति को देंगे, उसके बदले में हमें भी वैसा फल मिलेगा।
जिले में विद्युत संयंत्र लगाने के लिए सरकार ने उद्योगपतियों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। 34 पावर प्लांट लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने देश भर की नामी कंपनियों केएसके महानदी, वीडियोकान, मोजरबेयर, डी. बी. पावर, कर्नाटका पावर, श्याम सेंचुरी आदि से एमओयू हस्ताक्षरित किए हैं। 70 प्रतिशत से अधिक सिंचाई और कृषि प्रधान जिले में इतनी बड़ी संख्या में पावर प्लांट लगाए जाने से होने वाले नुकसान की फिक्र यहां की आम जनता को ही नहीं, जनप्रतिनिधियों को सता रही है। उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण से जिले की कृषि भूमि का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। पावर प्लांट प्रबंधन, जमीन दलालों, अधिकारियों और नेताओं की चौकड़ी की कुटिल रणनीति में फंसकर किसान अपनी दो फसली जमीन बेच रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में उद्योगों के लिए अनुमति दिए जाने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं, जैसे कि इन उद्योगों के लिए पानी कहां से आएगा, उद्योगों से निकलने वाले धुएं से लोगों के स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ेगा, तापमान बढ़ेगा, भारी वाहनों के आवागमन से दुर्घटनाएं बढ़ेंगी और सबसे अहम् सवाल है कि इन उद्योगों से निकलने वाली राख आखिर कहां जाएगी ?
जिले की तस्वीर भले ही औद्योगिक विकास से सुधर जाए लेकिन तकदीर आने वाले दिनों में बिलकुल भी अच्छी नहीं होगी। 70 प्रतिशत से अधिक खेती के लिए सिंचित जांजगीर-चांपा जिले के लिए सरकार ने 34 से अधिक पावर प्लांट के लिए एमओयू किया है। जिसके बाद आम जनता के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। जनसुनवाई में उद्योगों के खिलाफ जनता का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। आम जनता के अलावा जनप्रतिनिधि भी सरकार के इस कदम से खुश नहीं हैं। लेकिन वे सरकार का खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं।
सरकारी जमीनों पर उद्योगों से निकलती राख फेंकी जा रही है, उद्योग प्रबंधनों की मनमानी इतनी बढ़ गई है कि बिना अनुमति लिए ही नेशनल हाईवे के किनारे, नालों में और सरकारी भूमि पर राख फेंकी जा रही है। इस मामले में प्रशासन तो जैसे उद्योगों की हाथों की कठपुतली बन गया है। जिस तरह जांजगीर-चांपा जिले में पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं, वह उचित नहीं है, आने वाले दिनों में इससे कई तरह के नुकसान होंगे, लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा, उद्योगों में नौकरी नहीं मिलने पर पलायन होगा और कृषि भूमि भी कम होती जाएगी। सबसे बड़ी समस्या होगी तापमान की, प्रदेश में सबसे ज्यादा तापमान इसी जिले मंे होता है, उद्योग लगने के बाद गर्मी बढ़ेगी तो लोगों का जीना हराम हो जाएगा। कोरबा में उद्योग लगने के पहले वहां का तापमान 5 डिग्री कम था, आज जाकर वहां की स्थिति देख सकते हैं।
जिले में अब तक पांच बड़े उद्योग स्थापित हैं और 7 उद्योगों के लिए जनसुनवाई हो चुकी है। स्थापित हो चुके उद्योगों से आसपास के इलाके के ग्रामीण खासे परेशान हैं, चिमनियों से निकलता काला धुआं लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन के अधिकारियों के सामने इसकी शिकायत भी की है, लेकिन उद्योगों के हाथों की कठपुतली बन चुके अधिकारी इस मामले पर कोई पहल नहीं करते। प्रदूषण रोकने के लिए उद्योगों में लगाए गए ईएसपी संयंत्र बिजली बिल बचाने के चक्कर में बंद रखे जाते हैं, जिसकी वजह से धुआं आसपास के पंद्रह किलोमीटर क्षेत्र को प्रभावित करता है। उद्योग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, ग्रीन बेल्ट की स्थापना नहीं की जा रही है, जिससे लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। विधायकों द्वारा विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया गया है। लेकिन सरकार र्प्यावरण और प्रदूषण पर गंभीर नहीं है।
कुल मिलाकर इतने सारे उद्योगों के पक्ष में न तो आम जनता है और न ही अधिकतर जनप्रतिनिधि, फिर भी कृषि प्रधान जिले में इतने अधिक उद्योग लगाए जाने के नुकसान के बारे में सोचा नहीं जा रहा है। उद्योगों के बढ़़ने से जिले का विकास तो होगा, लेकिन इनसे निकलने वाली राख, धूल, धुआं और गर्मी आम जनता के हिस्से में ही आएगा, आने वाले दिनों में धान का कटोरा कहलाने वाला यह जिला और प्रदेश राख के कटोरे में तब्दील हो जाएगा। यह समझने की जरूरत है कि ऐसे औद्योगिकरण से जिले का विकास होगा या विनाश ? ग्लोबल वार्मिंग को लेकर पूरे विश्व में चिंता की जा रही है। लेकिन औद्योगिक प्रदूषण पर सरकारें लगाम नहीं लगा पा रही हैं। प्रकृति को दिए जा रहे जख्मों का बदला समय समय पर मानव समाज को मिल रहा है। जापान में हुई तबाही इसका ज्वलंत उदाहरण है। प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले भविष्य में क्या इसके विध्वंस से जनजीवन को बचा पाएंगे ? सिकंदर जब इस दुनिया से गया था तो उसके दोनों हाथ कफन के बाहर निकाले गए थे ताकि दुनिया को सबक मिल सके कि जो दुनिया से जाता है वह अपने साथ कुछ भी नहीं ले जाता। इस पाठ को वे लोग भूल चुके हैं, जिन्हें हर काम में लक्ष्मी प्राप्ति अहम् लगती है। क्या ऐसे लोग अपने साथ कफन में छुपाकर कुछ ले जा पाएंगे ?

0 बुजुर्ग ग्रामीण ने मुख्यमंत्री से कहा

0 कोसमंदा में उतरा मुख्यमंत्री का उड़नखटोला

मुख्यमंत्री डॉं. रमनसिंह जब कोसमंदा गांव पहुंचे तो एक बुजुर्ग ग्रामीण को भीड़ में जद्दोजहद करते देखकर उन्होंने अपने पास बुला लिया और पूछा - राम राम बबा, कईसे आए हस, कुछु समस्या हे का तब बुजुर्ग ने मुख्यमंत्री को जवाब दिया - नईं साहेब, तूंहर दरसन करे आए हवं। ग्रामीण की भावना से मुख्यमंत्री डा. सिंह काफी द्रवित हो गए, उसके बाद गांव की कई समस्याओं का निराकरण करने की लिए सौगातों की झड़ी लगा दी। मुख्यमंत्री ने गांव के युवकों की किक्रेट टीम को सामान खरीदने के लिए 10 हजार रूपए अनुदान देने की घोषणा भी की।

ग्राम सुराज अभियान के तहत चौथे दिन सवेरे राजधानी से हेलीकाप्टर द्वारा रवाना होकर सबसे पहले अचानक जांजगीर-चांपा जिले के विकासखण्ड डभरा के ग्राम कोसमंदा पहुंचे। मुख्यमंत्री ने गांव में चौपाल शैली में ग्रामीणों के साथ बैठकर स्थानीय समस्याओं और जरूरतों के बारे में लोगों से पूछताछ की। डॉं. सिंह ने कोसमंदा में ग्रामीणों की वर्षो पुरानी मांग को पल भर में स्वीकृति देते हुए वहां सिंचाई सुविधा के लिए नहर निर्माण कराने का ऐलान किया। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री की इस घोषणा का स्वागत् किया। किसानों का कहना था कि नहर बन जाने पर संपूर्ण कोसमंदा गांव व आसपास के गांवों में पर्याप्त सिंचाई हो सकेगी, इससे वहां हर मौसम में खेती हो सकेगी। मुख्यमंत्री ने सपोस से कोसमंदा नहर निर्माण हेतु ग्रामीणों की सहमति प्राप्त कर नहर निर्माण की कार्यवाही करने के निर्देश दिये।

मुख्यमंत्री ने ग्राम कोसमंदा तथा बगरैल में मंगल भवन निर्माण की मांग भी तुरंत पूरी कर दी। उन्होंने वहां सपोस से कोसमंदा और बगरैल तक 25 कि.मी.डब्ल्यू.बी.एम. सड़क निर्माण करने के निर्देश दिये जिसे बाद में मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना में शामिल करने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री ने कोसमंदा एवं बगरैल में सीमेंट कांक्रीट सड़क बनवाने की घोषणा की। उन्होने कोसमंदा में तालाब गहरीकरण कार्य कराने कहा। मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने ग्रामीणों की मांग पर कोसमंदा में एक अतिरिक्त ट्रांसफार्मर लगाने तथा पानी टंकी का निर्माण करने के निर्देश भी दिये। डॉं. सिंह ने ग्रामीणों की मांग पर गाड़ापाली में अतिरिक्त नल कूप खनन एवं पम्प लगाने के भी निर्देश दिये। डॉं. सिंह ने ग्रामीणों को ग्राम सुराज अभियान के उद्देश्यों की भी जानकारी दी। उन्होने ने ग्रामीणों की अन्य समस्याओं के निराकरण हेतु अधिकारियों को गॉंव में शिविर लगाने के निर्देश दिये। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार ग्राम कोसमंदा में 24 अप्रैल 2011 को शिविर लगाया जायेगा जिसमें विभागीय अधिकारी उपस्थित रहकर ग्रामीणों की समस्याओं का निराकरण करेगें। इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों सहित जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।

0 जलस्तर में लगातार गिरावट
0 10 वर्षों बाद उपजेगा घोर जल संकट
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने जांजगीर-चांपा जिले में 34 पावर कंपनियों से 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए एमओयू करके आम जनता के भविष्य को संकट में डाल दिया है। 40 हजार मेगावाट के विद्युत उत्पादन के लिए प्रतिवर्ष 16000 लाख घनमीटर पानी की जरूरत होगी, समझा जा सकता है कि इतनी बड़ी मात्रा में जब उद्योगों को पानी दिया जाएगा, तो आम जनता के लिए पानी कहां से आएगा ? सबसे खास बात यह है कि हर साल गर्मी के मौसम में इस जिले के जलस्तर में खासी गिरावट आ जाती है, तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे हालात में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जीवनदायिनी बनी नदियों का पानी सरकार ने उद्योगों को देने का फैसला कर भविष्य के लिए परेशानी पैदा कर दी है।
प्रदेश में सत्तासीन भाजपा सरकार ने उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से अपने हाथ खोल रखे हैं। देश की जानी मानी कंपनियां वीडियोकान, मोजरबेयर, केएसके महानदी, कर्नाटका पावर, एस्सार पावर आदि प्रदेश में अरबों-खरबों रूपए का निवेश बिजली उत्पादन के क्षेत्र में करने जा रही हैं। सरकार की इस सोच को हर कोई सराह सकता है कि उद्योगों से होने वाले विकास से आम जनता की आर्थिक परेशानियां कम होंगे, रोजगार के अवसर बढ़ेगे, अच्छी सड़कें बनेंगी, पढ़ाई का स्तर उंचा होगा और लोगों की बेरोजगारी खत्म होगी, लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरे पहलू पर गौर करें तो विकास के साथ साथ एक तरह का विनाश भी समानांतर चलता है। उद्योगों से होने वाले विनाश को देखें तो पता चलता है कि जहां जहां उद्योग लग रहे हैं, उन क्षेत्रों में सड़क दुर्घटनाओं में इजाफा हो रहा है, अपराध बढ़ रहे हैं, संयंत्र से निकलने वाले प्रदूषण से आम जनजीवन काफी प्रभावित होता है। संयंत्र से निकलने वाली राख का क्या वाजिब उपयोग होगा, इस बारे में कोई ठोस रणनीति सरकार नहीं बना सकी है, वहीं संयंत्रों की मशीनें चलने से तापमान भी बढ़ेगा। संयंत्रों की सुविधा के लिए राखड़ बांध बना दिए जाते हैं, जिससे हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि बेकार चली जाती है। हाल ही में पता चला है कि बिलासपुर जिले के सीपत में स्थापित नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन के राखड़ बांध में संयंत्र के अपशिष्ट जल के प्रवाह से रलिया तथा भिलाई गांव की 150 एकड़ भूमि दलदल हो गई है।
जांजगीर-चांपा जिला 80 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र माना जाता है, जहां नदियों का पानी नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुंचता हैऔर यहां के किसान साल भर में दो फसलें उत्पादन करते हैं। हरियाली से समृध्द ऐसे जिले में सरकार ने एक दो नहीं बल्कि 34 पावर कंपनियों से बिजली उत्पादन संयंत्र लगाने के लिए एमओयू कर लिया। इन कंपनियों द्वारा कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक एक हजार मेगावाट संयंत्र को 400 लाख घनमीटर पानी आदर्श अवस्था में प्रति वर्ष लगता है, लेकिन व्यवहारिक स्थिति में इससे भी ज्यादा पानी का उपयोग होता है। महानदी पर बनाए गए गंगरेल बांध की जलभराव क्षमता 800 लाख घनमीटर है तथा सहायक नदियां पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, अरपा, हसदेव, जोंक, तेल आदि हैं। राज्य सरकार ने पानी की उपलब्धता का गहन अध्ययन किए बगैर लगभग 20000 लाख घनमीटर पानी उद्योगों को देने का करार कर लिया है। यह आबंटन विगत तीस वर्षों के जल प्रवाह के आंकड़ों के हिसाब से काफी अधिक है।
जिले के नौ विकासखंडों में से डभरा, सक्ती व मालखरौदा में गर्मी के मौसम में जल संकट बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, यहां पर 250 मीटर तक जलस्तर नीचे चला जाता है, जिससे कई हैंडपंप सूख जाते हैं। इन क्षेत्रों की जमीन में शैल निर्मित चट्टानें हैं, जिसके कारण जल का स्तर वैसे भी काफी नीचे होता है। अधिकतर तालाब तेज गर्मी की वजह से सूख ही जाते हैं, तब ग्रामीणों को आसपास बहने वाले नदी के भरोसे रहना पड़ता है। गर्मी के दिनों में वैसे भी आजकल नदियों में दूर दूर तक रेत ही नजर आती है, पानी के नाम पर छोटा सा नाला बहता दिखाई देता है, ग्रामीण नालेनुमा बह रही नदी के जल का उपयोग पीने में भी करते हैं और नहाने में भी। बरसात के मौसम में वर्षा जल से ही नदियों में पानी आता है। लेकिन जब इतनी बड़ी मात्रा में उद्योगों को पानी दे दिया जाएगा, तो आगामी 10 वर्षों में ग्रामीणों का जीना दूभर हो जाएगा और जल संकट से आम जनता को खासी परेशानियां झेलनी पड़ेंगी, यह भी हो सकता है कि बाजार में बिकने वाले पानी के दाम पांच गुने हो जाएं और यह भी संभव है कि पानी की एक एक बूंद के लिए आम जनों को तरसना पड़े। ऐसे हालात पैदा होने से पहले सरकार को चिंतन करना चाहिए कि आम जनता के हितों के हिसाब से कितना औद्योगीकरण जरूरी है। अंधाधुंध औद्योगीकरण से त्रस्त आम जनता ने अब उद्योगों को स्थापित किए जाने का विरोध भी शुरू कर दिया है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश में 19 अप्रेल से ग्राम सुराज अभियान का आगाज हो चुका है। गांवों, गरीबों की समस्याओं की सुध लेने तथा उसे हल करने के लिए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह सहित कई मंत्री, विधायक, सरकारी अधिकारी गांवों में पहुंच रहे हैं, पर इस बार ग्रामीणों के तीखे तेवरों से नेताओं और अधिकारियों को दो चार होना पड़ रहा है। कारण साफ है कि पिछले वर्षों में चलाए गए सुराज अभियान के तहत् मिले आवेदनों, समस्याओं का निपटारा अब तक नहीं हुआ है। अधिकारियों कर्मचारियों ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए हजारों शिकायतें तथा लाखों आवेदन कागजों में निराकृत कर दिए। जाहिर है कि ऐसी खोखली कार्रवाईयों से छत्तीसगढ़ में सुराज तो आने से रहा। केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के मिश्रित अनुदान से चलने वाली कई योजनाओं में वैसे भी भ्रष्टाचार चरम पर है।
प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार के मुखिया डा. रमन सिंह ने तमाम प्रयासों से राज्य के विकास के लिए नए नए प्रयोग किए हैं, मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद राज्य का स्वरूप बदला भी है, लेकिन उतनी ही तेजी से भ्रष्टाचार बढ़ा है और सरकारी मशीनरी की मनमानी भी बढ़ गई है। भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ तमाम शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, वहीं आम जनता के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भी खासा घालमेल है। हालांकि मुख्यमंत्री पर सीधे तौर पर न तो कोई गंभीर आरोप लगे हैं और न ही भ्रष्टाचार के मामले विपक्ष सहित अन्य विरोधी दल उन पर साबित कर सके हैं। वर्ष 2010 के अप्रेल माह में चलाए गए ग्राम सुराज अभियान के तहत् सरकार को 7 लाख 40 हजार 298 आवेदन, शिकायतें मिली थी। जिनमें से 60 प्रतिशत मामलों का कागजों में निराकरण कर दिया गया है। जब पिछले वर्षों के दौरान मिले आवेदनों, शिकायतों का वास्तविकता में निराकरण हुआ ही नहीं, तो दोबारा उन्हीं गांवों में जा रहे नेताओं, अधिकारियों को आक्रोश तो झेलना पड़ेगा ही। कई गांवों में ग्रामीणों ने सुराज अभियान का बहिष्कार करने की ठान ली है। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में तो ग्रामीणों ने अनोखे तरीके से सुराज अभियान का बहिष्कार किया। गांव के सैकड़ों लोगों ने मुंडन कराकर सुराज अभियान की अर्थी निकाल दी। सवाल यह उठता है कि आखिर इस तरह कागजी निराकरण से क्या प्रदेश की समस्याएं खत्म हो जाएंगी, क्या सरकार की मंशा यही है कि समस्याओं का निराकरण इस तरह से हो ? प्रदेश के मुखिया छत्तीसगढ़ में सुराज लाना चाहते हैं और अधिकारी इसमें पलीता लगा रहे हैं तो जाहिर है कि ऐसे में छत्तीसगढ़ प्रदेश की जनता को सुराज का बरसों बरस इंतजार करना पड़ेगा।

ग्राम सुराज अभियान के पहले दिन ही कई सुराज दलों को ग्रामीणों के आक्रोश से दो चार होना पड़ा। बिर्रा क्षेत्र में प्रस्तावित मोजरबेयर पावर कंपनी के प्लांट का विरोध करते हुए सिलादेही के ग्रामीणों ने सुराज दल को स्कूल के अंदर जाने ही नहीं दिया। सुराज दल को रोके जाने की सूचना पर गांव पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को भी कई घंटे बिठाए रखा और सुराज अभियान का बहिष्कार कर दिया।
बम्हनीडीह विकासखंड के गांव सिलादेही के प्राथमिक शाला में सुराज अभियान हेतु ग्रामीणों से बातचीत व शिकायतों के लिए पहले दिन 19 अप्रेल को जैसे ही अधिकारी पहुंचे, सैकड़ों ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया और स्कूल
के अंदर जाने से रोक दिया। सूचना मिलने पर एसडीएम चांपा सी. डी. वर्मा, नायब तहसीलदार बी. एस. कंवर, जनपद पंचायत के सीईओ सी. एस. चंद्रा, थाना प्रभारी उषा सोंधिया गांव पहुंचे। तब कहीं जाकर सुराज दल
को स्कूल के अंदर जाने दिया गया। अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाईश देकर सुराज में हिस्सा लेने के लिए उनकी समस्याएं पूछी तो ग्रामीणों ने दो टूक अपनी मांगें रख दी। ग्रामीणों ने अधिकारियों से साफ तौर पर कहा कि मोजरबेयर पावर प्लांट यहां स्थापित न किया जाए, वहीं सरपंच व उपसरपंच का इस्तीफा स्वीकार किया जाए। अधिकारियों ने पावर प्लांट के मामले को शासन स्तर का बताते हुए ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि वे उनकी बात सरकार तक पहुंचा देंगे। वहीं जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे के संबंध में जानकारी लिए जाने पर पता चला कि सरपंच व उपसरपंच ग्रामीणों के दबाव में आकर इस्तीफा दे रहे हैं।
विदित हो कि बम्हनीडीह विकासखंड के बिर्रा क्षेत्र में मोजरबेयर पावर कंपनी द्वारा 1320 मेगावाट के दो संयंत्र प्रस्तावित हैं। पावर प्लांट की स्थापना के लिए सिलादेही, गतवा तथा बिर्रा की लगभग 1000 एकड़ भूमि अधिग्रहित की जानी है। सिलादेही के ग्रामीणों ने गांव पहुंचने वाले कंपनी प्रबंधन को भी दुर्व्यवहार कर लौटा दिया था, वहीं कंपनी द्वारा स्कूली बच्चों को बस्ता बांटे जाने का विरोध करते हुए हंगामा भी किया था। सैकड़ों की संख्या में कलेक्टोरेट पहुंचकर किसान अपना विरोध जता चुके हैं कि मोजरबेयर पावर कंपनी को वे अपनी जमीन नहीं देना चाहते, लेकिन प्रशासन के अधिकारी इसे आवश्यक अधिग्रहण बता कर प्रक्रिया में लगे हुए हैं। सिलादेही के ग्रामीण हर कदम पर पावर कंपनी का विरोध करने में जुटे हुए हैं। इसी वजह से उन्होंने ग्राम
सुराज अभियान का भी बहिष्कार कर दिया और वहां पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को चार घंटे तक बिठाए रखा लेकिन एक भी आवेदन नहीं दिया।
सबसे बड़ी समस्या पावर कंपनी
सिलादेही के ग्रामीणों का कहना है कि आने वाले दिनों में उनकी सबसे बड़ी समस्या पावर कंपनी की स्थापना किए जाने से होगी। इस क्षेत्र में द्विफसली कृषि भूमि है, अधिकतर किसान सिंचाई सुविधा के चलते यहां साल भर में दो फसलें उपजाते हैं, लेकिन शासन के अधिकारी पावर कंपनी से मिलीभगत के चलते कृषि भूमि को बंजर बताकर प्लांट के लिए देने की तैयारी में हैं। यहां के किसानों की मुख्य आजीविका कृषि ही है। पावर प्लांट को जमीन दिए जाने के बाद किसान कहां जाएंगे ? इसके अलावा उद्य़ोग लगने से प्रदूषण तथा अन्य समस्याएं भी क्षेत्र में पैदा हो जाएंगी।

देश में हर तरफ अण्णा राग की धूम है। फेसबुक अण्णा हजारे की खबरों से भरी पड़ी है, मोबाईल में संदेश आ रहे हैं उनके आंदोलन को समर्थन देने के लिए। ब्लाग पर भी अण्णा की ही बातें पढ़ने को मिल रही हैं। हालात कुछ उसी तरह के बन गए हैं जैसे तमाम भ्रष्ट मंत्रियों, संतरियों की लाइलाज बीमारी का तोड़ एक अनार (अन्ना) ही हो। कोई सत्याग्रही बापू से उनकी तुलना कर रहा है, कोई उन्हें जेपी जैसा क्रांतिकारी बता रहा है। उनके एक उपवास, आमरण अनशन पर अब तक महाराष्ट्र सरकार सकते में आ जाती थी, इस बार उन्होंने केंद्र सरकार को हिला कर रख दिया है। अण्णा जैसे साफ-सुथरे व्यक्त्वि अकेले ही पूरे देश की सरकार का पसीना निकाल सकते हैं। यह बात लोगों को अब महसूस हो रही है। अण्णा हजारे के बारे में ज्यादा कुछ कहना गुस्ताखी होगी। लेकिन उनके आंदोलन का जो हाल है, उसमें एक बात तो जुड़ी हुई दिखती है कि लोग भेड़ों के रेवड़ की तरह उनके पीछे हो लिए हैं। भ्रष्टाचार ने इस कदर लोगों के मन मष्तिष्क को अवसादग्रस्त कर दिया है कि लोग चाहे-अनचाहे ही इस अभियान में जुड़ते जा रहे हैं यह सोचे बिना ही कि उसके पारित होने से किस तरह के फायदे आम जनता को होंगे, नुकसान किस रूप में होगा या फिर सीवीसी की तरह बिना नाखूनों, दांतों का शेर खोखली गुर्राहट के दम पर भ्रष्टों को डराएगा ?
भ्रष्टाचार के कड़वी कहानियां, पढ़ पढ़ के लोग यह मान चुके हैं कि देश का लोकतंत्र भ्रष्टाचारियों के काले कारनामों से खुद को बीमार महसूस कर रहा है। राजनीति की धमनियों में कैंसर की तरह बस चुके भ्रष्टाचार की कैमो-थेरेपी होनी चाहिए। इस बात के समर्थन में हर खास, आम आदमी का सिर हामी भरने को तैयार बैठा है। क्योंकि यह सिर अब भ्रष्टाचारियों की करनी का फल अपने सिर पर लादे हुए परेशान है। देश की छाती पर मंूग दल रहे भ्रष्टाचारियों को न तो सुप्रीम कोर्ट की परवाह है और न ही उस आम जनता की, जिनके सामने, कुर्सी पाने के लिए पांच साल में एकाध बार गिड़गिड़ाते हुए वोट मांगने के लिए ऐसे लोगों को खड़ा होना पड़ता है। अण्णा को समर्थन देने के लिए हजारों नहीं, लाखों लोग उठ खड़े हुए हैं। बाबा रामदेव ने भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी। विदेशों में जमा काले धन के खुलासे और उसे वापस लाने की मांग की थी। लेकिन केंद्र की सत्ता पर काबिज यूपीए गठबंधन की सरकार दलीलें देकर इससे बचने की कोशिश करती रही। सुप्रीम कोर्ट की कई फटकारों के बाद ले देकर कुछ लोगों के नाम उजागर किए गए। उसके बाद जब बाबा रामदेव पर आरोप लगने लगे तो उनकी मुहिम सुस्त पड़ गई। दरअसल भ्रष्टाचार की परत देश और समाज में इतनी गहरी पैठ बना चुकी है कि उसे उखाड़ना आम आदमी के बस में नहीं रह गया है। एक मामूली से अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार सिध्द होने के बावजूद वर्षों तक कार्रवाई नहीं हो पाती और उसे बचाने के लिए पूरा सरकारी कुनबा लग जाता है। ऐसे में जनता के खून पसीने की कमाई पर डाका डालने वालों, हजारों करोड़ के घोटाले, महाघोटाले करने वालों पर कार्रवाई के लिए निष्पक्ष, हौसलामंद और ईमानदार जनप्रतिनिधि चाहिए। जनता ने बाबा रामदेव को योगगुरू के रूप में देखा, सराहा और उन्हें उनकी उम्मीद से अधिक मान सम्मान भी दिया, लेकिन राजनीति से जुड़ने के उनके फैसलों को जनता पचा नहीं पा रही है। सवाल यह है कि जब आप किसी पर आरोप लगाते हैं भ्रष्ट व्यवस्था, नेता, अफसर को पानी पी पीकर गालियां देते हैं, उसके भ्रष्टाचार पर कसमसाते हैं, तो इस बात की फिक्र भी होनी चाहिए कि हम खुद कितने साफ सुथरे और ईमानदार हैं ? खुद की भ्रष्टता पर हमें न शर्म आती है न ही नैतिकता की याद आती है। यही कारण है कि देश में गांधी एक ही हो सके और अब उनके सत्याग्रही तरीकों को गांधीगिरी का नाम दिया जा चुका है। अण्णा में भी लोग बापू का अक्स देखते हैं। इसकी वजह है उनकी सादगी, सिध्दांत, बेबाकपन और समाज विकास की सोच। आजादी के 64 वर्षों बाद देश को एक और सत्याग्रह की जरूरत आन पड़ी है। सादगी भरी यह जंग तब अंग्रेजों के खिलाफ और अब देश को खोखला कर रहे भ्रष्टाचारियों के खिलाफ। नासिक के पास रालेगन सिध्दी नामक आदर्श गांव बनाने वाले अण्णा को अब पूरे देश की खरपतवार नष्ट करने का जुनून हो गया है। अण्णा के इस कदम से हिली सरकारों, भ्रष्ट नेताओं को तनिक भी शर्म आएगी ? भ्रष्टाचार की कहानियां सुन सुनकर देश का आम तबका इतना बीमार हो गया है कि अब उसे अण्णा हजारे एक अनार की तरह दिख रहे हैं, जो इस नासूर को ठीक करने में कारगर साबित हो सकते हैं।


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दैनिक छत्‍तीसगढ में ब्‍यूरो चीफ जिला जांजगीर-चांपा
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