वो गली हुस्‍न की, ये आशिकी का शहर
दिल में जिंदा है तेरी, तीरे नजर तीरे नजर
वो गली हुस्‍न की....
दिल में तूफ़ान उठा ये चांदनी देखकर
चांद शर्मिंदा हुआ तुझको दिलनशीं पाकर
फिर उठी दर्दे लहर,एक नजर एक नजर
वो गली हुस्‍न की.....

मय से मयकदा से, इश्‍क इक अदा से
जिंदगी है आज मेरी, तेरी ही सदा से
मय से मयकदा से........
सुर्ख सुर्ख आंखों में अश्‍क थे भरे
मेरी ये दिले हालत क्‍या बयां करें
अलविदा करके तुझे हो गए जुदा से
मय से मयकदा से्....
तू नहीं तो ऐ दिलबर, जाम साथ है
फानी दुनिया में जीना अपने हाथ है
अब शिकवा किससे करें, खुद से या खुदा से
मय से मयकदा से.....

केन्‍द्र में सत्‍तारुढ यूपीए नीत गठबंधन की कांग्रेस सरकार अल्‍पमत में आने की स्थिति में है। खिचडी सरकारों का कामकाज वैसे भी सहयोगी दलों के दबाव में चलता है, और कई मुददों पर सत्‍तासीन सरकार को शर्मनाक स्थिति से गुजरना पडता है। आम जनता की हितों के मुददों को राजनीतिक दबाव के चलते रोक दिया जाता है। केन्‍द्र सरकार का कार्यकाल अब अंतिम बरस में है और हर बार कुछ मुददों को लेकर सरकार के खिलाफ आंखे तरेरने वाले वाम मोर्चा का आक्रोश नूरा कुश्‍ती ही साबित होता आया है। कई बार तो वाम दलों का यह खोखला विरोध देखकर लगता है कि उनकी सिर्फ आंखे ही लाल दिखती है और खून में सफेदी आने लगी है,वरना बार बार विरोध करने के बाद किन कारणों के चलते कांग्रेस को समर्थन देकर रखा है। केन्‍द्र सरकार का कार्यकाल पूरा होते देखते हुए वाम मोर्चा अब उंगली कटाकर खुद को शहीद बताने की तैयारी में है। केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों के गठबंधन के मुददे पर समर्थन देना और वापस लेना मेरे हिसाब से पूरी तरह भारतीय लोकतंत्र का मखौल उडाने के समान है। सरकार को जनहित के बजाय खुद के स्‍वार्थों के चलते समर्थन देकर सहयोगी दल खडा रखते हैं और समर्थन वाली सरकार की आड में पार्टी के चेले चप्‍पूओं को लाभ दिलाने का खेल चलता रहता है। भारत में लोकतंत्र के प्रभाव को और मजबूत करने संविधान में बहुत से संशोधन किए जाने की जरुरत है और खिचडी सरकारों के कामकाज से वैसे भी संतुष्टि तो सिर्फ लाभ मिलने वालों और संबंधित पार्टियों के लोगों को होती दिखती है। भारतीय भोजन में खिचडी को सादा और फायदेमंद माना जाता है पर यह खिचडी किसी के लिए घर में तभी बनती है जब कोई बीमार हो या उसे अनाप शनाप खाने पर रोक हो। ऐसी ही खिचडी सरकार बीमार सोच की सरकार बन जाती है। देश में सरकार तो ऐसी हो कि कम से कम जनहित के लिए लागू होने वाले संविधान को पास करने के लिए अतिरिक्‍त समर्थन की जरूरत न पडे। यह तो विडंबना है कि सत्‍ता की कुर्सी पर काबिज होने के लिए तमाम काबिल ना‍काबिल समझौते कर लिए जाते हैं। पिछले चार बरस से केन्‍द्र सरकार वाम मोर्चा को और वाम दल कांग्रेस सरकार को झेलते आ रहे हैं आखिर किसलिए, जनता के हितों के लिए या खुद कुर्सी पर बैठने के लिए। बहरहाल देश भर में वाम दलों की समर्थन वापसी पर सबकी निगाहें हैं और विपक्षी दलों को भी सरकार गिरने का इंतजार है। पर बात बात पर आंखे लाल करने वाले वामपंथी इस तरह से न तो जनता का भला कर सकेंगे और न ही खुद का, सफेद होते खून को अब हीमोग्‍लोवीन की जरुरत है और खून में लाली बनाए रखने के लिए अपनी नीतियों पर मजबूती से कायम रहने की जरूरत है।





कुदरत का करिश्‍मा भी अजीब और चमत्‍कार भरा होता है, कहीं भैंस को पानी में आराम करते देखकर आनंद महसूस होता है,तो कहीं तितली की तरह का कीट देखकर, प्रवासी पक्षी पाउला रुबीनो हो या मटरगश्‍ती करती बत्‍तखें,छायाकार अपने कैमरे को रोक नहीं पाता। ऐसी ही कुछ तस्‍वीरें...







जांजगीर की छात्रा का फर्जीवाडा
खबर एक्‍सप्रेस की खबर हुई सच
जांजगीर चांपा जिले में पिछले चार दिनों से बारहवीं की प्रावीण्‍यता सूची में फर्जीवाडा उजागर होने के बाद शिक्षा जगत में हलचल है, खबर एक्‍सप्रेस में नकल की स्थिति पर लिखा गया आखिर सच साबित हुआ कि किस तरह कामचोरी नकल करके कसडोल क्षेत्र के सेमरा गांव की छात्रा पोरा बाई ने जांजगीर के बिर्रा गांव से बारहवी की परीक्षा दिलाई और प्रदेश के सभी मेधावी छात्र छात्राओं को पीछे छोडते हुए प्रथम स्‍थान हासिल किया, बारहवीं का परिणाम घोषित होने के बाद शंका के आधार पर प्रावीण्‍यता सूची में नंबर एक पर आने वाली पोरा बाई की उत्‍तरपुस्तिका की जांच माध्‍यमिक शिक्षा मंडल के अध्‍यक्ष बी के एस रे ने कराई तो जो सच सामने आया उसने प्रदेश के शिक्षा जगत को तार तार कर दिया पिछले चार दिनों से इस मामले का खुलासा होने के बाद प्रतिभावान विद्यार्थी भी सकते में हैं, नकल के संबंध में हमने कर्मवीरों पर हावी कामचोरों की नस्‍ल में लिखा था कि किस तरह बडे पैमाने पर यहां शिक्षा जैसे पवित्र पेशे को दागदार किया जा रहा है, जब बारहवीं की परीक्षा चल रही थी तब माध्‍यमिक शिक्षा मंडल के अध्‍यक्ष श्री रे ने नकल का असली रुप देखा और उन्‍होंने स्‍वीकार किया था कि जिले भर में बडे पैमाने पर शिक्षा के नाम पर खेल जारी है, पर यह जानने के बाद भी उन्‍होंने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, शिक्षा विभाग के अफसरों कर्मचारियों व निजी स्‍कूलों के संचालकों की मिलीभगत से वर्षों से इस जिले में यह धंधा फल फूल रहा है पर ऐसे सारे अधिकार प्राप्‍त लोगों ने कार्रवाई के बजाए अपना स्‍वार्थ ही देखा और बोर्ड परीक्षा का परिणाम बताने में जल्‍दबाजी कर दी नकल के नाम पर कुख्‍यात हो चुके जांजगीर जिले के बारे में अफसरों को पहले से मालूम था तो प्रावीण्‍यता सूची जारी करने में आखिर जल्‍दबाजी क्‍यों दिखाई गई यह सवाल अब भी अपनी जगह कायम है कि प्रावीण्‍यता सूची में आने वाले विद्यार्थियों की उत्‍तरपुस्तिका की दो तीन बार जांच की जाती है पर ऐसा नहीं किया गया और इस मामले ने शिक्षा विभाग की कार्य प्रणाली को संदेह के दायरे में खडा कर दिया, नियमों को ताक में रखते हुए अनेक परीक्षा केन्‍द्रों को मान्‍यता दी गई और माशिम के तत्‍कालीन सचिव एल एन सूर्यवंशी ने इसे छात्र हित बताया नतीजतन ऐसे छात्रहित को अब प्रतिभावान विद्यार्थियों को झेलना पड रहा है, इस फर्जीवाडे के उजागर होने के बाद अब जांच की जा रही है और इसके लिए कार्रवाई करने बलि के बकरे ढूढे जा रहे हैं सवाल यह भी उठता है कि जिले में शिक्षा के नाम पर चल रहे खेल में अधिकारियों को कोई जिम्‍मेदारी नहीं बनती तो क्‍या ऐसे लोगों को जिम्‍मेदार मानकर उन पर कार्रवाई की जाएगी अब यह तो आने वाले समय में पता चलेगा क‍ि राजधानी में बैठे अधिकारियों की शह पर नासूर बन चुकी नकल को बढावा देने वालों पर भी कोई कार्रवाई होगी या बलि के बकरों से ही काम चलाया जाएगा,

छत्‍तीसगढ की भाजपा सरकार अपनी उपलब्धियों पर काफी खुश दिखती है, विकास यात्रा निकाल कर हूजूर देखना चाहते हैं कि चुनाव के इंतजार में बैठा गली मो‍हल्‍ले और श‍हर की तेज भागती दुनिया से अलग कमाने खाने की चिंता में दुबला होता गरीब किस हालत में है अभी अभी ग्राम सुराज का जिन्‍न पूरे जिलों में घूम घामकर बोतल में बंद हुआ है और अब विकास यात्रा का सैलाब पूरे प्रदेश में आने को बेताब है प्रदेश के बीसों गुना बढ चुके बजट और विकास का अनुपात देखें तो लगता है कि भारी भरकम बजट के अनुरुप आधा काम हो रहा है गांव और गरीब के नाम पर निकलने वाले नोटों से रसूखदार अफसरों ठेकेदारों दलालों के घर भरते जा रहे हैं सरकार की न्‍यायप्रणाली तो जैसे कुंभकरण की तरह छह महीने की नींद के बजाय कई महीनों तक सोई दिखती है सरकार के अन्‍यायपूर्ण फैसलों को लेकर अधिकतर मामलों में लोग हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं
सरकारी अफसरों का अन्‍याय बढता जा रहा है,भ्रष्‍ट अफसर तरक्‍की पा रहे हैं और इन अफसरों की जी हूजूरी कर कर के आम और गरीब भी थकने लगे हैं, राज्‍य का मुखिया कैसा है इस पर कुछ कहना बेमानी होगा पर यह सौ फीसदी सत्‍य है कि उनके मंत्रीमंडल के सदस्‍य और उन मंत्रियों के चहेते अफसर बेखौफ बेलगाम और बेबाक हो कर मनमानी करते हैं,जांजगीर जिले में ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे जहां राजनीतिज्ञों की सरपरस्‍ती के चलते अधिकतर विभागों के अफसर मानों अपनी मर्जी के मालिक हो चुके हों, मुख्‍यमंत्री डा रमन सिंह ने पिछले दिनों कहा था कि वे गरीबी रेखा के तहत मिलने वाले चांवल के बारे में अगले सौ बरसों तक कुछ नहीं सुनेंगे राज्‍य के मुखिया की यह सोच काफी अभिभूत करने वाली है, यह बात तब और भी प्रभावी होती जब वे गरीबों तक राशन पहुंचाने वाले खाद्य विभाग नागरि‍क आपूति और स्‍टेट वेयर हाउस व ठेकेदारों की चांडाल चौकडी पर कोई लगाम लगा पाते, सवाल यह नहीं कि राज्‍य सरकार पर्याप्‍त राशन नहीं दे रही है सवाल तो यह है कि क्‍या वाकई में इसके पात्र गरीब हितग्राही को राशन का लाभ मिल पा रहा है अब सरकार की विकास यात्रा राज्‍य भर के दौरे के लिए निकली हुई है इसके क्‍या प्रभाव पडे यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा पर यह बात तो मुख्‍यमंत्री जी को भली भांति समझनी होगी कि सरकार की प्रणाली आम लोगों को न्‍याय नहीं दे पा रही है सरकार के कई अन्‍यायपूर्ण फैसलों से आम लोग बहुत खुश नहीं हैं जांजगीर चांपा की आने वाली सबसे बडी समस्‍या प्रदुषण और पर्यावरण ही होगी जहां गरीब किसानों की जमीनों पर बडे उद्योग स्‍थापित किए जा रहे हैं किसानों की जमीन पर जब उद्योग लगेंगे तब वह माटीपुत्र बोएगा क्‍या और खाएगा क्‍या यह देखना तो सरकार का काम्‍ा है कि अधिकतर क्षेत्र सिंचित होने के बावजूद धान की फसल पिछले वर्ष की तुलना में कम क्‍यों हुई किसानों के हिस्‍से का पानी जब उद्योगों को दिया जाएगा तब बेचारा किसान अपने सूखते खेतों की प्‍यास कैसे बुझा पाएगा जिले की जीवनदायिनी हसदेव नदी में लगातार उद्योगों का प्रदूषित पानी छोडा जा रहा है इसमें निस्‍तार करने वालों और सिंचाई के उपयोग में आने वाले पानी से क्‍या क्‍या बीमारियां फैल सकती हैं इसकी तनिक भी परवाह किए बिना नित नए उद्योंगो के साथ सरकार एमओयू किए जा रही है औद्योगिक विकास के हम तनिक भी खिलाफ नहीं हैं पर कुदरत को नुकसान पहुंचाए बिना किया गया विकास ज्‍यादा लंबे समय तक चल सकता है छत्‍तीसगढ राज्‍य में कुदरत के नियमों के खिलाफ किया गया औद्योगिक विकास एक न एक दिन कैटरिना, नर्गिस और सुनामी को आमंत्रण ही देगा पूरी दुनिया में आज भी ग्‍लोबल वार्मिंग को लेकर बहस चलती रही है पर सरकार के सरोकार इससे जुडे हो ऐसा दिखता नहीं बहरहाल गरीबों की मसीहाई करने वाले राज्‍य के मुखिया,जरा इधर भी देखें



नकल कैसे रुके ,इसकी चिंता किसे है?



रतन जैसवानी




जांजगीर जिले में नकल ने हर बरस क्षेत्र को पूरे प्रदेश में बदनाम किया हुआ है। पिछले कई बरसों से यह जिला नकल के लिए खासा कुख्यात रहा है। लगभग तीन वर्षो से मैं खुद यहाँ की प‍रीक्षाओं का हाल देख रहा हूं सतही खबरों से छनते-छनते अब थोडा-बहुत इस बारे में सही जानकारी मिलने लगी है। चोर का माल चंडाल खाए, की तर्ज पर स्कूल संचालकों से लेकर शिक्षा विभाग के कर्मचारी,अधिकारी,गांव के दबंग जनप्रतिनिधि जिसे जैसा मौका मिला,स्वार्थ सिध्द करने में नहीं चूकते। हर साल परीक्षाओं के शुरू होने से लेकर खत्म होने तक अखबार और टीवी पर जांजगीर जिले की नकल की खबरें अमूमन रोज देखने को मिलती हैं,और शिक्षा में सुधार की गुंजाइश को सरकारी अमला सिरे से खारिज करते अपने ही तर्क-कुतर्क पेश करता है। बोर्ड परीक्षाएं शुरु होने के दूसरे दिन जिले के दौरे पर पहुंचे माध्यमिक शिक्षा मंडल के अध्यक्ष बी के एस रे ने दो दिनों तक ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया। अखबार वाले इस फिराक में बैठे रहे कि माशिम अध्यक्ष से कब वार्ता हो और नकल के संबंध उन्हें घेरा जाए। मगर श्री रे इस मामले में काफी चतुर निकले, जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा पत्रकारों को यह खबर मिली कि वे दूसरे दिन परीक्षा केन्द्रों का दौरा करने के बाद बातचीत करेंगे। पर दूसरे दिन वे बलौदा क्षेत्र का दौरा करने के बाद वापस ही नहीं लौटे और वहीं से बिलासपुर होते हुए रायपुर वापस चले गए। उनके साथ पत्रकार वार्ता नहीं हो सकी।




सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कि श्री रे साहब के दौरे के दूसरे दिन हम सुबह आठ बजे ही उनके काफिले के पीछे लग चुके थे। बलौदा क्षेत्र के करमंदा, पहरिया,पोंच,पंचगवां के स्कूलों में, नकल कैसे होती है यह पहली बार करीब से देखने को मिला। स्कूलों के आसपास नकल कराने वालों की भीड़,और अंदर में बेखौफ नकल करने वाले छात्र-छात्राएं हाथों में पुस्तक कापियां चिट के पुर्जे लिए हुए थे। रे साहब तो यह देखकर हैरत में ही पड़ गए थे कि नकल इस तरह भी होती है। पोंच के परीक्षा केन्द्र के बाहर उनसे कुछ देर खड़े-खड़े ही बातचीत हो सकी। बातचीत के दौरान उन्होंने माना कि नकल को रोकना यहाँ बहुत कठिन है। कोई कड़क नीति बनाए बिना यह संभव ही नहीं कि आने वाले बरसों में यहाँ नकल होना रुक जाए या निजी स्कूलों के फर्जीवाड़े को रोका जा सका। यह सब देखकर भी वे इसे रोकने के बारे में कोई ठोस कदम उठाने की चर्चा से बचते रहे। फिर वे वहाँ से बिलासपुर की ओर निकल गए।




सत्रह मार्च को परीक्षा के मूल्यांकन हेतु बनाए गए केन्द्र का निरीक्षण करने माध्यमिक शिक्षा मंडल के सचिव एल.एन. सूर्यवंशी यहाँ पहुंचे तो इत्तेफाकन पता चलने के बाद रेस्ट हाउस में उनसे बातचीत हुई। लगभग एक घंटे की बातचीत में उन्होंने हर प्रश्न का जवाब घुमा फिरा कर दिया।




कार्रवाईयों के आधार पर देखें तो जितना बड़ा गोलमाल नकल के नाम पर होता है। उसके बनिस्बत मामूली सी कार्रवाईयां हुई,पुलिस ने सौ-पचास लोगों को नकल कराने के आरोप में हवालात की राह दिखाई। उड़नदस्तों की टीम ने लगभग एक हजार नकल प्रकरण बनाए।




नकल के विषय में काफी बातों को गौर करने के बाद यह भी समझ में आता है कि या बातों की लप्फाजी से इसका हल निकल पाएगा या विधानसभा के उपचुनाव की तरह एसएएफ बटालियन के साए में एकाध बार बोर्ड परीक्षाएं कराई जाएंगी?




एक बात और है कि अभिभावक भी ऐसे मामलों में अपने बच्चों का साथ देते दिखते हैं। बच्चों को डिग्रियां दिलाने और उसके जायज नाजायज कर्मों पर नजर न रखने वाले,उसे रोकने में कोताही बरतने वाले या इस अव्यवस्था के दोषी नहीं हैं?


नकल के विषय को लेकर मैं इतना क्‍यों सोचता हूं और भी कई बुध्दजीवी इस बारे में सोचते हैं। पर मुझे यह लगता है कि शिक्षा की अव्यवस्था,सोचा-समझा और संगठित भ्रष्टाचार आने वाले दिनों में क्‍या- क्‍या नतीजे लाएगा,इस पर सरकार भी गंभीर नहीं दिखती।



फोटो फाईल



आठ से दस फरवरी तक जांजगीर में हुए जाज्वल्य देव लोक महोत्सव में पहुंचे ख्यातिलब्ध संगीतकार,गायक रविन्द्र जैन, मशहूर शायर व गजलकार निदा फाजली, लाफटर चैलेंज शो में प्रतिभागी रहे नागौद क्षेत्र के कवि अशोक सुंदरानी।

चांपा को कोसा,कांसा और कंचन की नगरी कहा जाता है। कोसे ने चांपा को अंतर्राष्‍टीय पहचान दिलाई है। कोसा बुनते बुनकरों के कुछ फोटो।

एक गरीब के आत्महत्या की कहानी
जांजगीर-चांपा जिले के गोविंदा गांव का मामला
रतन जैसवानी

जांजगीर से 30 किमी। दूर बम्हनीडीह विकासखंड के गोविंदा ग्राम पंचायत में रामशनि पटेल ने 5 मार्च को कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। चांपा विधायक मोतीलाल देवांगन ने इस खबर की विज्ञप्ति व एक सीडी ६ मार्च की शाम को लगभग सभी अखबारों के कार्यालयों में भिजवाई थी। साथ में वहां की महिला सरपंच द्वारा विधायक को इस मौत के बारे में दी गई शिकायत की प्रतिलिपि भी भेजी गई थी। दूसरे दिन कुछ अखबारों में विधायक के हवाले से यह खबर छपी थी कि रामशनि ने रोजगार गारंटी का भुगतान न मिलने के कारण आत्महत्या कर ली, इस बात का उल्लेख भी था कि उसकी पत्नी गर्भवती थी और रामशनि आर्थिक अभाव के कारण उसका इलाज कराने में असमर्थ था जिसके कारण गर्भ में पल रहे दो बच्चों की मौत हो गई। पर पूरी तरह से रोजगार गारंटी का तीन हफतों तक भुगतान न मिलने वाली बात को इसका कारण ठहराया गया था।

मार्च को इस खबर की विस्तृत जानकारी लेने के लिए मैं और सहारा समय के संवाददाता राजेश सिंह क्षत्री मोटर सायकिल पर गोविंदा गांव पहुंचे। उस वक्त दिन के लगभग साढ़े ग्यारह बज रहे थे। मुख्य सड़क से लगा हुआ ग्राम पंचायत भवन है। जब हम वहाँ पहुंचे तो ग्राम पंचायत भवन के साथ बने हुए मंच पर चांपा के एसडीएम सुशील चंद्र श्रीवास्तव,ग्रामीण यात्रिंकी विभाग के कार्यपालन यंत्री पी। के। गुप्ता,बम्हनीडीह जनपद की सीईओ वंदना गबेल और कुछ अन्य अफसर गांव के ही कुछ ग्रामीणों से बात कर रहे थे। हमने वहां मौजूद अफसरों से रामशनि की आत्महत्या के बारे में चर्चा की। एसडीएम श्रीवास्तव ने कहा कि रामशनि ने निश्चित ही आर्थिक अभाव के कारण आत्महत्या की है। पर रोजगार गारंटी का भुगतान न होना इसका कारण नहीं है। उन्होंने गांववालों से बात की है जिसमें यह तथ्य सामने आया है कि पत्नी का इलाज न करा पाने से वह बहुत दुखी था। फिर हमने गांव के सरपंच के बारे में पूछा तो ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ महिला सरपंच है, ग्राम पंचायत का अधिकतर कामकाज उसका पति रामसहाय सोनवानी ही देखता है। वह कहाँ मिलेगा, पूछने पर गांववालों ने बताया कि वह सामने पान दुकान पर बैठा हुआ है।

हम दोनों मंच से उठे और पान दुकान पर पहुंचे। उसे अपना परिचय देने के बाद हमने रामशनि के संबंध में बात की। उसने भी यह कहा कि तीन हफतों की मजदूरी का पैसा नहीं मिलने से वह परेशान था,आत्महत्या के एक दिन पहले ही वह उससे मिला था और पैसे मांगे,रामसहाय ने पैसे नहीं होने की बात कही तब उसने आक्रोश में कहा था कि वह सरपंच को मार डालेगा या खुदकुशी कर लेगा। दूसरे दिन सुबह उसने कीटनाशक पीकर जान दे दी। हमने रामशनि के परिजनों से मिलने की बात कही तो रामसहाय ने कहा कि अभी कुछ देर पहले ही उसके परिवार के लोग अस्थि फूल चुनने के बाद तालाब से लौटे हैं,एकाध घंटे बाद ही मिलना ठीक रहेगा। इसी बीच एसडीएम व अन्य अफसर मंच से उतर कर अपने चार पहिया वाहनों में वापस हो गए।

हम वहीं एक घंटा इतजार करते रहे। एक घंटे के बाद हम तीनों एक ही मोटर सायकल पर बैठकर रामशनि के घर पहुंचे। रामशनि का घर ग्राम पंचायत से लगभग आधा किमी। दूर था। जब हम लोग वहाँ पहुंचे तब उसके परिवार के लोग व कुछ रिश्तेदार घर के अंदर भोजन करते दिखे,हम तीनों पड़ोस के एक मकान के बरामदे में बैठकर इंतजार करने लगे। लगभग पंद्रह मिनट बाद रामशनि के पिता श्यामलाल पटेल ने हमसे बात की। उन्होंने बताया कि रामशनि के पास कमाई का कोई जरिया नहीं था। पिछले साल ही उसकी शादी हुई थी तब उसके पिता ने ही सारा खर्च उठाया था। उसकी पत्नी अनिता और वह मजदूरी करके गुजर-बसर करते थे। कुछ माह पहले ही उन्होंने बँटवारा कर लिया था। इस बार खेती से उसे चार बोरा धान मिला था जिसे वह आर्थिक अभाव के कारण बेचने की बात करता तो पत्नी व उसकी मां ने मना कर दिया। पैसों के अभाव में वह परेशान रहा करता था। कई लोगों से कर्ज ले लिया था,इसलिए पत्नी के इलाज के लिए उसे कहीं से पैसा नहीं मिला। गांव में ही रोजगार गारंटी योजना के तहत नए तालाब निर्माण में उसने कुछ दिन काम किया था,जिसका भुगतान अब तक किसी को नहीं मिला है। दो हफतों का भुगतान पहले मिला था,उसके बाद पैसा नहीं मिला। बताते वक्त श्यामलाल की आंखों में आंसू आ गए। उसके बाद हम वहाँ से लौटे। रामसहाय को ग्राम पंचायत भवन के पास छोड़कर वापस लौट गए। लौटते वक्त रामसहाय ने कहा कि अफसर उसे जेल भेजने की धमकी दे रहे थे। पर वे ग्रामीणों की गालियां खाने से अच्छा है कि पद से हटा दिया जाए या भले ही जेल भेज दिया जाए। इसके बाद लौटते वक्त बम्हनीडीह जनपद में एसडीएम की गाड़ी खड़ी देखकर हम उनसे मिलने रूक गए।

जनपद कार्यालय में एसडीएम श्रीवास्तव,सीईओ वंदना गबेल बैठे हुए थे तथा रोजगार गारंटी के मस्टररोल की जांच कर रहे थे। मैंने और राजेश ने भी वहाँ रखे मस्टर रोल को लगभग 40 मिनट तक देखा, कि आखिर रामशनि को कितने दिन की मजदूरी का भुगतान मिलना बाकी था। पांच हफतों के मस्टररोल देखने के बाद पाया कि पहले व दूसरे हफते के काम का भुगतान उसे मिल चुका था। तीसरे हप्ते में उसने 4 दिन व उसकी पत्नी अनिता ने 6 दिन मजदूरी की थी जिसका कुल भुगतान 690 रूपए उन्हें नहीं मिला था। चौथे व पांचवें हप्ते के मस्टररोल में उनका कहीं नाम नहीं था। गोविंदा का सचिव दिलहरण केंवट भी वहीं मौजूद था। उससे इस संबंध में बात की गई तो उसने बताया कि 5 मार्च को तीन हप्तों के मस्टररोल जमा किए थे। और उसी दिन रामशनि ने आत्महत्या कर ली थी। रोजगार गारंटी का मूल्यांकन करने वाले उप-अभियंता भी हड़ताल पर रहे जिसके कारण कार्य का मूल्यांकन नहीं हो पाया। ग्रामीणों और अफसरों से एक और बात पता चला कि रोजगार गारंटी में नए तालाब की प्रशासकीय स्वीकृति से ज्यादा का काम कराया गया है और इसके भुगतान को लेकर विवाद बना हुआ है।

रामशनि की मौत आर्थिक अभाव के कारण ही हुई है, पत्नी का इलाज न करा पाने से वह काफी दुखी था और उसके दो बच्चे जन्म से पहले ही काल कवलित हो गए थे। पर इससे सिर्फ रोजगार गारंटी के भुगतान न होने को कारण ठहराना उचित नहीं है। गोविन्दा गांव के रामशनि की आत्महत्या के जिम्मेदारों पर पूरी जांच पड़ताल के विश्लेषण के बाद कार्रवाई होना भी जरुरी है।

रतन जैसवानी

जांजगीर-चाम्पा,१४ मार्च। नक़ल के लिए बदनाम जिले में बेकाबू हो रही स्थिति पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन व पुलिस को आखिरकर सख्त रवैया अपनाना ही पड़ा,बीते दो दिनों में लगभग १०५ लोगों के खिलाफ नक़ल कराने के आरोप में प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई,प्रभारी कलेक्टर एस के चाँद व पुलिस अधीक्षक विवेकानन्द ने कई संवेदनशील केन्द्रों पर छापा मार कर नक़ल कराने वालों को पकडा,जिला शिक्षा अधिकारी आनंद दासगुप्ता ने भी सख्त रवैया अपनाते हुए कई नकाल्चियों को पकडा,प्रशासन व पुलिस के इस कार्रवाई के बाद नकाल्चियों तथा नक़ल कराने वालों में दहशत है,जिले में बेलगाम होती जा रही शिक्षा प्रणाली पर अंकुश लगाने के लिए यह जरुरी था कि सख्त कदम उठाया जाये,जैजैपुर के किकिरदा परीक्षा केन्द्र में पुलिस बल कि उपस्थिति में परीक्षा हुई पुलिस अधीक्षक ने खुद ही वहां पहुँच कर छापा मार कार्रवाई की बहरहाल बोर्ड परीक्षा अन्तिम चरण में है और प्रशासन की कार्रवाई सख्त हो चली है। नकल

रोकने वाले उड़नदस्ते को जांजगीर-चांपा में 3 विद्यार्थी नकल मारते हुए मिले। बस्तर और कोरिया जिलों के उड़नदस्तों ने दो-दो अफसरों को चिट मारते हुए पकड़ा और नकल का केस बना दिया। जांजगीर जिले में माशिमं के चेयरमैन बीकेएस रे ने नकलचियों को खुद पकड़ा।


चेयरमैन ने जांजगीर-चांपा जिले में डेरा डाल दिया है। पिछले साल की परीक्षाओं में इसी जिले से सबसे ज्यादा (1400) नकलची पकड़े गए थे, इसलिए उन्होंने ऐसा किया। वे महत्वपूर्ण परचों के दौरान वहीं जमे रहेंगे। जांजगीर-चांपा में उड़नदस्तों ने आज श्री रे के नेतृत्व में ही छापे मारे।

खबर एक्सप्रेस : रतन जैसवानी

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दैनिक छत्‍तीसगढ में ब्‍यूरो चीफ जिला जांजगीर-चांपा
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