बाबा रामदेव ने विदेशों में जमा कालेधन को उजागर करने की पैरवी की है, पर दांव उल्टा पड़ गया और अब उनके वक्तव्यों से खार खाए लोग, उनके ट्रस्ट की संपत्ति का खुलासा करने की मांग कर रहे हैं। यह तो सर्वविदित है कि जिनके घर शीशे को हों, वे दूसरे के घरों पर पत्थर न उछालें, वरना नुकसान शीशे के घर में रहने वालों का ही अधिक होगा। बाबा रामदेव का फेंका हुआ तीर अब बूमरेंग की तरह वापिस लौटकर उन्हीं की तरफ आ रहा है। योगगुरू को यह तो सोच लेना चाहिए था कि राजनीति नाम की तलवार हर क्षेत्र पर लटक रही है, चाहे वह संसद हो, मीडिया हो या फिर अन्य उपक्रम, राजनीति की जद में हर कोई आ चुका है, तो योगगुरू कैसे राजनीति से बच सकते हैं, वह भी तब, जब उन्होंने राजनीति में आने का फैसला कर लिया है।
बहुत पुरानी कहावत है कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे यानि दूसरों को उपदेश देने वाले बहुत मिल जाएंगे। उपदेश देना बहुत आसान है, खुद उन बातों पर अमल करना उतना ही मुश्किल। कलयुग में पाप बढ़े हैं, अत्याचार बढ़े हैं, मानवीयता रोज तिल-तिल कर मरती जा रही है। तो लोगों के मन में आध्यात्मिकता भी जमकर हिलोरें मार रही हैं। लगता है कि सतयुग, तेत्रायुग, द्वापरयुग और कलयुग में से, सबसे ज्यादा आध्यात्मिकता कलयुग में ही हो सकती है। हर रोज नया बाबा, नया प्रवचनकर्ता चैनलों पर दिखने लगे हैं। अहम् बात तो यह है कि तरह तरह के उलजलूल हरकतों, रहन-सहन से मानव जाति ने अपने लिए नई-नई मुश्किलें खड़ी की हैं। अब उनसे उबरने के लिए सबसे सस्ता और सरल तरीका उन्हें यही नजर आता है कि सीधे किसी बाबा की शरण में जाओ। कहा जाता है कि बिना गुरू के, भगवान नहीं मिलते, क्योंकि भगवान तक पहुंचने का ज्ञान और मार्ग गुरू ही बता सकते हैं। लेकिन गुरूओं को लेकर भी कई तरह के भ्रम की स्थिति है। देश में चल रहे एक बड़े पंथ के बाबा कहते हैं कि मांसाहार मत करो, यह राक्षसी प्रवृत्ति है। वहीं उसके समकक्ष चल रहे दूसरे पंथ के बाबा कहते हैं कि जो मन में आए वही करो, यदि मांसाहार करने की इच्छा है तो करो, इसमें कोई बुराई नहीं। बाबाओं के भक्त ऐसे मामले पर अलग-अलग तर्क देते हैं। पानी पियो छान के, गुरू बनाओ जान के जैसी बातें अब दरकिनार होने लगी हैं। लोग एक दूसरे के झांसे में आकर बिना किसी परख के बाबाओं को अपना हितचिंतक, दुख दर्द दूर करने और मुक्ति दिलाने वाला मानने लगे हैं। मुझे भी कई रिश्तेदारों ने तरह-तरह के तर्क देकर किसी गुरू, किसी बाबा का भक्त बनने के लिए कई खूबियां गिनाई। उन्हें चमत्कारी पुरूष बताया। सन् 2005 में दिल्ली में मैंने खुद अंधभक्ति की मिसाल देखी। एक विशाल प्रवचन शिविर में तीन दिनों तक रहा और कई प्रपंच देखे। बाबा की भक्त एक महिला, जो सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। वह सुबह सुबह ही शिविर में आसपास मौजूद भक्तों को मिठाई बांट रही थी और काफी खुश थी। मैंने जिज्ञासावश पूछ लिया कि क्या बात है किस बात की मिठाई बांटी जा रही है। महिला ने बताया कि उसका प्रमोशन हो गया है, अब वह प्रिसीपल बन गई है और यह सब बाबा का चमत्कार है। मैंने बातों ही बातों में उसकी बेटी से कुछ और जानकारियां ली, तो पता चला कि पिछले डेढ़ वर्ष से महिला के प्रमोशन की प्रक्रिया चल रही थी और इसी के तहत् उन्हें स्कूल का प्राचार्य बनाया गया है। भला बताईए, इसमें बाबा ने क्या चमत्कार किया, जो सरकारी प्रक्रिया थी उसी के कारण प्रमोशन हुआ, लेकिन अंधभक्ति या अंधविश्वास के चलते महिला को सबकुछ बाबा का किया धरा दिख रहा था।
आजकल छत्तीसगढ़ प्रदेश में एक बौध्द भंते बुध्द प्रकाश घूम-घूमकर अंधविश्वास के खिलाफ लोगों को जगाने का काम कर रहे हैं और चमत्कार, जादू के सच से परिचित करा रहे हैं। उनका कहना है कि अशिक्षितों की बात तो दूर है, देश का एक बड़ा शिक्षित वर्ग ही अंधविश्वास की चपेट में है। सबसे पहले उन्हें जगाना होगा।
कालेधन की बात करें तो यह 100 फीसदी सच है कि मठों में, धर्मादा ट्रस्टों में, किसी धर्म-कर्म वाले संस्थानों में जो भी धन आता है, क्या वो मेहनत से, ईमानदारी से, बिना किसी छलकपट के कमाया गया धन होता है ? एक और बात सामने आती रही है कि कई पूंजीपति अपना धन कथित कालाधन धार्मिक संस्थानों में लगाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यही दिखता है कि धार्मिक संस्थानों के प्रति लोगों के मन में एक श्रध्दाभाव होता है, जिसे पहली बार में शक की नजर से नहीं देखा जा सकता। ऐसे में उन पूंजीपतियों के कथित कालेधन की रक्षा हो जाती है। उस धन को अन्य धंधों में भी लगाया जा सकता है। एक सच यह भी है कि देश में जितने भी बाबा नामी हैं, प्रसिध्द हैं, शोहरत वाले हैं, कम से कम मैंने उन्हें किसी गरीब की कुटिया में जाकर भोजन करते नहीं देखा, सुना और पढ़ा है। यानि जो धन देगा, वहीं बाबाओं का कृपापात्र होगा। अमीरों और गरीबों के लिए बाबाओं का अलग-अलग मापदंड एक बड़ा भेदभाव नहीं है ? सोचा जा सकता है कि क्या इस तरह के भेदभाव से कोई गुरू, किसी भक्त को भगवान से मिलवा सकता है ? ईश्वर ने तो गरीब रैदास, तुलसी, वाल्मिकी, मीरा और सूरदास को उनकी संपत्ति, धन धान्य और हैसियत देखकर दर्शन नहीं दिए थे। फिर परमपिता परमेश्वर तक पहुंचाने का दावा करने वाले बाबाओं को ऐसी दरकार क्यों ? लोगों को उपदेश देकर व्यवहार सुधारने, लोभ, मोहमाया से दूर रहने, अत्याचार, भेदभाव नहीं करने की सीख देने वाले बाबा क्या खुद इन चीजों से दूर हैं ? शास्त्रों में तो यही लिखा है कि भगवान का सच्चे मन से, निर्मल भाव से, छलकपट से दूर रहकर ध्यान करो तो एक दिन वे जरूर मिलेंगे। आत्मा में परमात्मा है, यह सोचकर ही कोई कार्य करें तो व्यर्थ के प्रपंच से बच सकते हैं, बाकी सब तो कलयुगी करामातें हैं।


सूनी सड़क पर सुबह-सुबह एक काफिला सा चला रहा था, आगे-आगे कुछ लोग अर्थी लिए हुए तेज कदमों से चल रहे थे। राम नाम सत्य है के नारे बुलंद हो रहे थे। शहर में ये कौन भला मानुष स्वर्गधाम की यात्रा को निकल गया, पूछने पर कुछ पता नहीं चला। मैने एक परिचित को रोका, लेकिन वह भी रूका नहीं। मैं हैरान हो गया, हर चीज में खबर ढूंढने की आदत जो है, तो मैने अपने शहर के ही एक खबरीलाल को मोबाईल से काल करके पूछा। उसने कहा घर पर हूं, यहीं जाओ फिर आराम से बताउंगा। मेरी दिलचस्पी और भी बढ़ती जा रही थी। आखिर शहर के भले मानुषों को हो क्या गया है जो एकबारगी मुझे बताने को तैयार नहीं कि धल्ले आवे नानका, सद्दे उठी जाए कार्यक्रम आखिर किसका हो गया था। फिर भी जिज्ञासावश मैं खबरीलाल के घर पहुंच गया। बदन पर लुंगी, बनियान ताने हुए खबरीलाल ने मुझे बिठाया और अपनी इकलौती पत्नी को चाय-पानी भेजने का आर्डर दे दिया। मैंने कहा, अरे यार, कुछ बताओ भी तो सही, तुम इतनी देर लगा रहे हो और मैं चिंता में पड़ा हुआ हूं कि कौन बंदा यह जगमगाती, लहलहाती, इठलाती दुनिया छोड़ गया। खबरीलाल ने कहा थोड़ा सब्र कर भाई, जल्दी किस बात की है।

फिर उसने गला खंखारकर अपना राग खबरिया शुरू किया, क्या है मित्र, दरअसल देश में इन दिनों महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाला, हत्याएं, लूट अब घर के मुर्गे की तरह हो गए हैं। ऐसा मुर्गा, जिसकी दो-चार नहीं, हजार टांगें हैं, कद भी बहुत बड़ा है, सिर पर मन को मोहने वाली कलगी भी लगी है, लेकिन बेचारा पोलियोग्रस्त है, यानि मजबूर है। अब इस हजार टांग वाले मुर्गे की एक-एक टांग खींच-खांचकर कई घोटालेबाजे, इसकी बलि लेने में लग गए हैं। पहले तो इसे काजू, किसमिस, ब्रेड, बिस्किट, चारा, दाना सबकुछ खिलाया, अब इसका मांस नोचने की तैयारी है।
मैंने कहा, मुर्गे की किस्मत में कटना तो लिखा ही होता है। अब इसमें बेचारे घोटालेबाजों का क्या दोष।
खबरीलाल ने फिर से अपना ज्ञान बघारते हुए कहा, तुम समझ नहीं रहे हो। अरे भाई, मुर्गे को पालने वाली मालकिन के बारे में तुम्हें पता नहीं है। उसने इस कलगी वाले मजबूर मुर्गे को क्यों पाला ? यह मुर्गा लड़ाकू मुर्गों जैसा नहीं है। यह तो बिलकुल सीधा-सादा है, इसने अब तक घर के बाहर दूर-दूर क्या, आसपास की गंदगी पर फैला भ्रष्टाचार का दाना भी कभी नहीं चुगा। मालकिन कहती है कि बैठ जा, तो बैठ जाता है, फिर कहती है कि खड़े हो जा, तो खड़े हो जाता है। बेचारा जगमगाती दुनिया में हो रहे तरह-तरह के करम-कुकर्म से दूर है। लेकिन क्या करें, मालकिन के पड़ोसियों की नजर इस पर कई दिनों से गड़ गई है। इसलिए बिना कोई अगड़म-बगड़म की परवाह किए इसे निपटाने के लिए प्रपंच रचते रहते हैं। इतना स्वामीभक्त है कि एक बार इसके साथी मुर्गे ने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है, तो पता है इसने क्या कहा। इसने कहा कि मेरा नाम तो सुंदरलाल है, फिर भी मालकिन से पूछ कर बताउंगा, बताओ भला, कोई और होता तो इतना आज्ञाकारी होता क्या ? अब ऐसे मुर्गे को भाई लोग बलि चढ़ा देना चाहते हैं।
मैंने झल्लाते हुए कहा कि अरे यार, मैं उस अर्थी के बारे में पूछने आया था और तुमने मुर्गा, मालकिन, घोटाला की कहानी शुरू कर दी।
उसने हाथ उठाकर किसी दार्शनिक की तरह कहा, अरे शांत हो जा भाई, यह सब उसी अर्थी से जुड़ी कहानी का हिस्सा है। असल में गांव, शहर, महानगर के भले लोग, रोज-रोज घोटालों से तंग आ चुके हैं। अब घोटाले हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे, तो भलेमानुषों ने सोचा कि जब घोटाला, भ्रष्टाचार करने वाले इतनी दीदादिलेरी से इतरा रहे हैं, खुलेआम घूम रहे हैं, निडर हैं, बेधड़क हैं, शान से मूंछें ऐंठ रहे हैं, तो हम क्यों स्वाभिमानी, ईमानदार, सदाचारी, देशप्रेमी बने रहें। इसीलिए अपना यह सुघ्घड़ सा चोला उतारकर उसकी अर्थी निकाल दी है और उसे फंूकने के लिए शमशान घाट गए हैं। शाम को श्रध्दांजली सभा भी है, तुम चलोगे ?
मैंने खबरीलाल को दोनों हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर कहा कि धन्य हो श्रीमान, आप और आपका ज्ञान दोनों ही सत्य है।
खबरीलाल ने कहा, याद रखो मित्र कि जीवन का अंतिम सच, राम नाम सत्य ही है। जाने कब, इस सीधे-सादे, कलगीवाले, आज्ञाकारी मुर्गे का भी राम नाम सत्य हो जाए ?

देश में करोड़ों बेरोजगार तमाम डिग्रियां लिए नौकरी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं, पर चिपकू भाई को नौकरी मिल गई, जिसके लिए तो डिग्री की जरूरत थी और ही सिफारिश की, ऐसी नौकरी की उसके घरवाले क्या, बाप-दादे भी उम्मीद नहीं रखते थे। शानो-शौकत बढ़ गई, हाथों में चमचमाती सोने-हीरे की अंगूठी, महंगे जूते, सूट-बूट, टाई उस पर खूब फबने लगी थी। इस महोदय का परिचय तो जरा जान लें, आपके आसपास ही मिल जाएगा, इसे चमचा कहते हैं, चमचा यानि जिसके बिना खाने का एक निवाला भी मुंह के अंदर जाए, जिसके बिना नेता पानी भी पी सके। ऐसी ही नौकरी चिपकू भाई ने जुगाड़ कर ली थी। अफसरों पर रौब कि उनका ट्रांसफर करा देंगे, छुटभैयों पर रंग जमाना कि उन्हें फलां मोहल्ले के वार्ड पार्षद की टिकट दिला देंगे, बेरोजगारों के तो वे मसीहा बन गए थे, जहां से भी गुजरते नौकरी पाने की चाह में भटक रहे बेरोजगार नब्बे अंश के कोण की मुद्रा बनाकर सलाम करते थे। ऐसी किस्मत तो आज की तारीख में किसी राजे-महाराजे की भी नहीं हो सकती थी।
यह नौकरी आसानी से नहीं मिलती है, इसके लिए भी हुनर होना चाहिए, ठीक वैसा ही, जैसा देश की सबसे बड़ी कार्पोरेट दलाल राडिया में है, हर्षद मेहता में था, चार्ल्स शोभराज, नटवरलाल भैया में था, जो खड़े-खड़े ही, बातों-बातों में किसी को, कुछ भी बेच सकते हैं। ऐसी हिम्मत और दिगाम का खजाना हर किसी के पास तो होता नहीं। इसलिए चिपकू भाई की किस्मत खुल गई थी। इसके पीछे की हकीकत जानने के लिए मेरे अंदर का खबरनवीस कुछ दिनों के लिए जागा, तो पता चला कि वाह भैया, ये तो हर्रा लगे फिटकिरी, रंग चोखा ही चोखा। चिपकू भाई ने कुछ खास नहीं किया बस फार्मूला चमचागिरी को अपना लिया और अब वह लोगों की नजरों में बहुत बड़ा, पहुंचवाला हो गया। हुआ यूं कि किसी नटवरलाल ने चिपकू भाई को एक आईडिया दिया और वे उस पर अमल करने लग गए। जब भी किसी नेता का जनमदिन होता, चिपकू भाई पहुंच जाते बधाई देने, बातों ही बातों में तारीफों के इतने पुल बांधते कि नेताजी उसके कायल हो जाते, यह फार्मूला शहर से शुरू हुआ, फिर प्रदेश से गुजरता हुआ देश की राजधानी तक पहुंच गया और चिपकू भाई साहब कस्बे से उठकर राजधानी के एक नेताजी के खासमखास हो गए। नेताजी की पत्नी को भले ही याद हो कि उनका जनमदिन कब है, मगर चिपकू भाई बकायदा, नियत तारीख को फूलों का गुलदस्ता लिए सुबह 7 बजे से ही नेताजी के दरवाजे पर पहुंचकर इंतजार करते थे, जब तक नेताजी को बधाई दें, तब तक दरवाजे से हटते नहीं थे। बताइए भला ऐसा कितने लोग कर सकते हैं और अगर नहीं कर सकते तो बेरोजगार तो रहेंगे ही। नेताजी के प्रति चिपकू भाई के समर्पण को हम चाहे कितनी भी गालियां दें, लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि इसके पीछे कितने फायदे हैं ? यूपी वाली मैडम के जूते पोंछने वाले, चरणस्पर्श करने वाले भाई-बंधुओं को इसका कितना फायदा मिलेगा, इसकी कल्पना भी किसी ने की है ? नहीं , अपने राहुल बाबा के ही जूते उठाकर पीछे-पीछे घूमने वाले चव्हाण जी को भूल गए क्या ? तो मिला जुला नतीजा यही है और समझदारी भी कि फार्मूला चमचागिरी हर युग में सुपरहिट है। इसे अपनाईए, खुद भी सुख पाईए, दूसरों को भी सुख दीजिए। और अंत में एक खास बात, जिसका भले ही आपको विश्वास हो, चिपकू भाई इस फार्मूले से अब एक लालबत्ती भी पा चुके हैं, साथ में एक सुरक्षागार्ड भी, गन लिए हुए। यह सुनकर जोर का झटका धीरे से तो नहीं लगा आपको ?

नेपाल रेडियो से गीत-संगीत का सफर शुरू करने वाले बालीवुड के सुप्रसिध्द पार्श्व गायक पद्श्री उदित नारायण पांच दिवसीय जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव में शिरकत करने पहुंचे, जहां उन्होंने तकरीबन दो घंटे तक हिन्दी फिल्मों में खुद के गाए हुए गीत पेश किए। कार्यक्रम खत्म होने के बाद आधी रात को दो बजे कुछ मिनटों के लिए मंच के बाजू में बनाए गए ग्रीन रूम में उदित नारायण ने रतन जैसवानी से संक्षिप्त बातचीत की।

0 बालीवुड में रोज नए-नए गायक उभर रहे हैं, जितनी जल्दी इन्हें मौका मिल रहा है, उतनी से तेजी से वे गुमनाम भी हो जा रहे हैं, क्या वजह लगती है।

00 दरअसल जमाना बदल रहा है, उसके साथ ही संगीत में काफी बदलाव आया है, रियलिटी शो हो रहे हैं, तो नए-नए युवाओं की प्रतिभा भी सामने आ रही है। लेकिन सच तो यही है कि इतनी प्रतिस्पर्धा के बावजूद जो गीत-संगीत की रूह को समझता है, उसे अपनी आत्मा में बसा लेता है, वही यहां टिक पाता है।

0 गीत-संगीत के क्षेत्र में सफर की शुरूआत कैसे हुई ?

00 नेपाल रेडियो में कार्यक्रम पेश करता था, उसके बाद सन् 1980 में मोहम्मद रफी के साथ गाने का मौका मिला तो पहला गीत उन्हीं के साथ गाया। फिल्म थी उन्नीस-बीस, जिसमें संगीतकार राजेश रोशन ने मुझे मौका दिया गाने का।

0 संघर्ष भी करना पड़ा था बालीवुड में ?

00 बिलकुल, मुंबई की मायानगरी में बिना संघर्ष के कुछ नहीं मिलता है। वह दौर नामी गायकों का था, मौसिकी के मसीहा मोहम्मद रफी साहब, हर दिल अजीज बन चुके किशोर दा। बड़े दिलवाला फिल्म में किशोर दा ने गाया था जीवन के दिन छोटे सही, हम भी बड़े दिलवाले। इसी गीत को मैंने और लताजी ने डुएट गाया था।

0 किन-किन भाषाओं में अब तक गाने गाए हैं आपने ?

00 नेपाल रेडियो में था तो नेपाली, मैथिली भाषा में गाता था, फिर बालीवुड पहुंचा तो भोजपुरी, हिंदी गाने गाए, लगभग 30 भाषाओं में गा चुका हूं। लेकिन सबसे बड़ा ब्रेक या कहिए कि मुझे पहचान मिली 1988 में, जब आमिर खान, जूही चावला अभिनीत फिल्म कयामत से कयामत तक में गाने का मौका मिला। फिल्म इतनी हिट हुई कि इसका गीत-संगीत आज भी लोगों को लुभाता है।

0 आपका बेटा भी गायक बन चुका है, पत्नी भी इसी विधा में हैं, कैसा लगता है ?

00 ये तो ईश्वर की देन है कि आदित्य ने मेहनत की, दीपा भी आजकल गा रही हैं। घर में संगीत का माहौल है तो लगता है कि उपरवाले की बहुत कृपा है।0 आपकी सफलता का क्या मंत्र है ?

00 बस यही कि कर्म में विश्वास करना चाहिए, मेहनत में कमी नहीं हो और ईश्वर पर भरोसा होना चाहिए, सफलता आपके कदम चूमेगी।

0 यहां का माहौल कैसा लगा ?

00 सच कहूं तो छत्तीसगढ़ की मिट्टी में अपनेपन की खुशबू है। यहां आकर ऐसा लगा कि जैसे अपने घर में हूं। जवाब नहीं, बहुत मजा आया।

आए दिन न्यूज चैनलों और अखबारों में खबरें छाई हुई हैं कि स्विस बैंकों में भारतीयों का ही सबसे ज्यादा धन जमा है। योगगुरू बाबा रामदेव ने भी अभियान चला रखा है कि विदेशों में जमा काला धन वापस अपने देश लाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को विदेशों में अपना धन जमा रखने वालों के नाम खुलासा करने को कहा है, लेकिन सरकार भी इन धनकुबेरों के नाम खुलासा करना नहीं चाहती। काले धन के मामले में भारतीय नंबर 1 पर हैं। इस खबर पर कोई शक हमें नहीं है, होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि हम चाहे अपने देश के नेताओं को जितना भी कोस लें कि गरीबों का हिस्सा हड़प कर, हक मारकर खुद के लिए तमाम आलीशान ऐशो-आराम के सामान जुटा लेते हैं। अपने देश में एक नंबर या दो नंबर से कमाया हुआ धन स्विस बैंकों में जमा करके आखिरकार विदेशों में देश की साख तो बढ़ा रहे हैं। अमेरिका, जापान, चीन, रूस जैसे देशों को कम से कम हमारे नेता और उद्योगपति किन्ही मामलों में पछाड़ रहे हैं। भारत देश वैसे भी विकासपथ पर लगातार बढ़ रहा है, विकसित देशों को जल्द ही पछाड़ने का दावा भी देश के कई नेता आए दिन करते हुए दिखते हैं। हमारे विकासशील देश को विकसित देशों की श्रेणी में आने में इतना समय नहीं लगता, अगर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझकर काम किया जाता। क्योंकि यह तो बचपन से ही किताबों में पढ़ते आए हैं कि जब देश की तरक्की होगी, तो प्रदेश बढ़ेगा, फिर समाज, शहर, गांव और अंत में परिवार की तरक्की होगी, लेकिन बाकी सब चीजें गौण हो गई, अब रह गया अपना परिवार, अपने बच्चे, अपना घर, गाड़ी, बंगला, शानो-शौकत। देश कहां खो गया, देशप्रेम किधर चला गया ? देश के लिए बात करने हमारे पास सिर्फ दो दिन यानि 15 अगस्त और 26 जनवरी ही रह गए। देश के बारे में सोचते तो हमें नहीं लगता कि अमेरिका, रूस जैसे महाशक्तिशाली देशों का मुकाबला करना कोई मुश्किल होता। राश्ट्रबोध कहीं गुम होकर रह गया और स्वार्थबोध ने मन पर कब्जा कर लिया है। जिस देश में हम रहते हैं, जिस मिट्टी में पलते हैं, जिसका नमक खाते हैं, जिस पर अपनी जिंदगी बिताते हैं, क्या उस देश के प्रति हमारे कोई कर्त्तव्य नहीं। छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का रियायती अनाज अगर धनाढ्य या फिर अपात्र लोग किसी तरीके से हड़प कर जा रहे हैं, तो इसमें नुकसान किसका है, बदनामी किसकी है ? देश के अलावा बात करें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ की तो ईओडब्ल्यू की छापेमारी में अब तक कई अफसरों की करोड़ों की संपत्ति का खुलासा हो चुका है। क्या संपत्ति सिर्फ अफसरों के पास ही बढ़ गई है ? अगर स्वास्थ्य विभाग, पीएचई, खाद्य, आबकारी, नगरीय निकाय, उद्योग, आयकर, खनिज सहित तमाम सरकारी विभागों के बाबूओं की संपत्ति की छानबीन भी की जाए तो कई लोगों की संपत्ति करोड़ रूपए से कम नहीं निकलेगी। क्लर्क स्तर के कर्मचारियों की संपत्ति इतनी हो सकती है तो अफसरों और नेताओं की संपत्तियों के क्या कहने, पर उसे उजागर कौन करेगा, भ्रष्टाचार की नींव पर खड़े हुए धन के अंबार का खुलासा कौन करेगा ? ईओडब्ल्यू चंद कार्रवाईयां कर अपनी पीठ थपथपा ले या फिर लोग अफसरों के करोड़ों की संपत्तियों का खुलासा देखकर हैरान होते रहें, लेकिन सवाल वहीं खड़ा है कि क्या वाकई कथित काला धन हमारे प्रदेश में कम है या फिर यहां धन की कमी है और वह धन किसके हिस्से का है, किनके हक पर डाका डालकर धन कमाया गया है ? बात भारतीयों के काले धन की हो रही थी और विशय थोड़ा बदल गया। हम तो यही मानते है कि स्विस बैंकों में काला धन जमा होना कहा जाना कहीं से उचित नहीं है। क्योंकि 100 रूपए का नोट 100 रूपए की कीमत का ही होगा, बाजार में वह आधे दाम पर नहीं लिया जाएगा, तो फिर धन काला कैसे हुआ ? ये जरूर हो सकता है कि काले कामों से, भ्रष्टाचार से, दो नंबर से कमाई गई दौलत को काला धन कहा जा रहा है, लेकिन हमारा मानना है कि अपने देश में कमाए गए धन को विदेशों में रखने वालों का मन काला है, नियत में खोट है। काले मन वालों को अपना मन साफ करते हुए धन को देश में ही रखना चाहिए ताकि आड़े वक्त में यह देश के काम आ सके। वरना देश को विकसित बनाने का सपना देखने और दावे करने से क्या फायदा ? शर्म का विशय तो यह भी है कि इतना धन भारतीयों के पास होते हुए भी 61 बरस के स्वंतत्र भारत के हालात भी कुछ खास अच्छे नहीं हो सके हैं। भारत की आत्मा गांवों में बसती है, कहने वाले बापू के सपनों का भारत आखिर कहां है ?

कांदादेव अर्थात प्याज देवता, मराठी मानुष बोले तो कांदा और छत्तीसगढ़िया में गोंदली, अँगरेजी में ओनियन, सिंधी बोली में बसर वगैरह-वगैरह। रोज-रोज कांदादेव संबंधी लेख, व्यंग्य, कविता, कहानी, गजल, मुहावरे सुन-सुन के इसकी महिमा से मैं भी नहीं बच पाया। इकलौती पत्नी ने भी ताना मार ही दिया कि बड़े कलमकार बने फिरते हो, पर प्याज देवता के बारे में लिख नहीं सकते। चलो अच्छा ही हुआ कि इसके दर्शन कई-कई दिन बाद हो रहे हैं, नहीं तो बिना मतलब के ये कांदादेव हमारे आंखों में आंसू ला देते थे, अब कुछ दिनों तक छुटकारा तो मिला। मैने कहा-अरी भागवान, प्याज महाराज भी अब देवतातुल्य हो गए हैं। क्योंकि गरीब तो इसे खरीद नहीं सकता और अमीर इसे अपने किचन में सजा कर रख रहे हैं। इससे भी बड़ी खासियत है प्याज की महानता की, जो सरकारों को हिला देता है, सरकारों को गिरा देता है, वह विपक्षी पार्टियों के लिए भी देवता है और सत्तासीन सरकार के लिए भी। जो कांदादेव किचन में नारी को बिना किसी कारण अश्रुपूर्ण कर देता है, उसकी महिमा अब अपने देश से निकलकर विदेश तक पहुंच गई है। अब वही कांदादेव महाराज चाईना से यहां, हमारे अखण्ड भरतखण्डेः देश में पधारने लग गए हैं अर्थात सिंग इज किंग की सरकार हिंदी-चीनी भाई-भाई को चरितार्थ करने लग गई है। जब एक भाई संकट में हो तो दूसरे भाई को उसकी मदद करनी ही चाहिए, यही धर्म है और इसी धर्म के पालन में अब चीन भी लग गया है। वैसे भी चाईना मोबाईल अधिकतर युवा हाथों में पहुंच ही चुका है, बच्चों को चाईनीज ट्वायज यानि खिलौने तो लुभा ही रहे हैं। चाउमीन अब होटलों, रेस्तरां से आगे बढ़कर गांव के ठेलों में भी पहुंच गया है, जिसके स्वाद से गांव के भोले-भाले टेटकू, समारू, मंटोरा भी अब अछूते नहीं रहे, बालीवुड के अक्की भैया यानि अक्षय कुमार भी चांदनी चौक टू चायना तक धूम मचा ही चुके हैं। तो अब हम कौन होते हैं चाईना की महिमा से इंकार करने वाले। हमें भी चाईना ओनियन यानि चीनी प्याज को स्वीकार, अंगीकार करना ही पड़ेगा। चीनी प्रधानमंत्री जिआबाओ और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हाथ मिलाने से आगे अब गले मिलने और दिल मिलाने को भी तैयार हैं। सुना है कि 11 टन चाईनीज कांदादेव महाराज हमारे देश में पधार चुके हैं। मेरी षुभकामना है कि यह 1100 नहीं, 11 करोड़ टन तक पहुंचें और हम जैसे कलमघिस्सूओं तक इसकी खुशबू आ सके। मैं तो अब यह भी सोचने लगा हूं कि चाईनीज भाईयों ने हमारे कान, मुंह, पेट तक पहुंच बना ही ली है, अगर नामकरण संस्कार पर कब्जा कर लिया तो फिर आने वाले समय में बच्चों के नाम झुंग, वांगड़ू, साओ, पाओ, तिन सूक रखने पड़ जाएंगे। जय हो चाईनीज की, जय हो जिआबाओ की और जय हो मनमोहन सिंह की। अथ श्री कांदादेवः कथा समाप्त।


देश के जाने माने योगगुरू बाबा रामदेव अब राजनीतिक पारी खेलने की तैयारी में हैं। योग की घुट्टी पिलाकर रोग भगाने के बाद अब वे राजनीति की खुराक देंगे। तमाम लोग भी चाहते हैं कि राजनीति में बढ़ती जा रही गंदगी पर रोक लगे या फिर उसका सफाया ही हो जाए। लेकिन क्या बाबा रामदेव की मंशा को पंख लग पाएंगे ?आए दिन नई बीमारी, नए रोग और उसके निदान के लिए जूझते देश-विदेश के हजारों वैज्ञानिक, डाक्टर। ऐसे में बाबा रामदेव ने प्राचीन युग से चल रहे योग को लोगों के सामने पेश किया, जिसका नतीजा भी लोगों को देखने को मिला, लाखों लोगों ने योग अपनाया, प्राणायम, अनुलोम-विलोम किया, स्वस्थ भी हुए और देश-विदेश में बाबा रामदेव योगगुरू के रूप में छा गए। पतंजलि योगपीठ नाम की संस्था बनाकर अब देश भर में उन्होंने योग डाक्टर भी नियुक्त किए हैं और योग की क्लिनिक में लोग अपना रोग भगाने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। यहां तक तो ठीक था, लेकिन राजनीति में आने का इरादा कुछ अटपटा सा है क्योंकि राजनीति का इतिहास देखा जाए तो इसका कालापन सदियों से बरकरार है। राजा-रजवाड़ों के दौर में सत्ता की कुर्सी हथियाने के लिए खूनी संघर्ष, धोखेबाजी, युध्द, गद्दारी और तमाम तरह के प्रपंच चलते रहे हैं। आजाद भारत में शुरूआती दौर की राजनीति भी कोई साफ सुथरी नहीं रही, यह हमने कई बार सुना हुआ है कि स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में अधिकतर नेता लौहपुरूष सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के हिमायती थे, लेकिन महात्मा गांधी जिद पर अड़े रहे कि प्रधानमंत्री तो नेहरू जी ही बनेंगे। आखिरकार पंडित नेहरू ही प्रधानमंत्री बने। कहने का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि अगर राजनीति को बाबा रामदेव आसान समझ रहे हैं तो यह शायद उनकी भूल होगी। क्योंकि राजनीति में सफलता के लिए क्या-क्या करना पड़ता है, लोग अब समझने लगे हैं। देश के राजनीतिज्ञों पर यह आरोप तो लगते रहे हैं कि चुनाव में करोड़ों रूपए देकर वोट खरीदे गए, इसलिए कुर्सी तक पहुंचे। लेकिन इसमें दोष सिर्फ उस नेता का ही है जो नोट देकर वोट खरीदते हैं, जनता इसमें शामिल नहीं ? देश की गरीब आबादी, रोजगार की समस्या से जूझते लोगों का चुनाव में नोट मिलते वक्त ईमान नहीं जागता कि अगर नोट लेकर वोट देंगे, तो इसका परिणाम भी हम ही भुगतेंगे ? इसके पीछे कुछ मजबूरियां हो सकती हैं या फिर स्वार्थ, जैसे कि यह दोबारा कब आएगा, इससे अच्छा है नोट ले लो, यही मौका है, जो दे रहा है, ले लो, चुनाव जीत गया तो फिर कुछ मिले न मिले। लेकिन चुनाव में सिर्फ गरीब-गुरबे भी नहीं मध्यम वर्गीय, अमीरों के भी अपने-अपने स्वार्थ होते हैं। मसलन चुनाव जीतने के बाद कहीं नौकरी मिलने की आस, रोजगार मिलने का लालच, तो कहीं करोड़ों रूपए के ठेके मिलने की चाहत होती है। कुल मिलाकर राजनीति का रंग अब भी स्याह ही है, न कि रंगबिरंगा, जिसे देखकर, महसूस करके किसी आम आदमी का मन खिल सके, आनंद महसूस कर सके। बाबा रामदेव ने अगर यह ठाना है कि वे राजनीति में आएंगे, तो इसके परिणामों को लेकर उन लोगों की उम्मीदें जाग गई हैं जो देश में अच्छी और साफ-सुथरी राजनीति के सपने देखते हैं, अपने प्रतिनिधियों को ईमानदार और जुझारू देखना पसंद करते हैं। लेकिन योग भगाए रोग की तर्ज पर राजनीति की घुट्टी आम जनता को पिलाना आसान न होगा, क्योंकि राजनीति, मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज है। योग और अनुलोम-विलोम करके लोग अपनी सांसों तथा मन पर नियंत्रण तो पा सकते हैं, कुछ बीमारियां भी दूर भगा सकते हैं। पर राजनीति के अनुलोम-विलोम से दागदार और भ्रष्टाचारी नेताओं को, किसी रोग की तरह बाहर का रास्ता दिखाना इतना भी आसान नहीं होगा। बाबा रामदेव की राजनीतिक पारी की सफलता के लिए सिर्फ ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले नेता, कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि अपने स्वार्थों से परे, ईमानदार मन वाली, ईमानदार जनता भी चाहिए। क्यांेकि जनता के वोट ही प्रतिनिधि तय करते हैं, क्या ऐसा होना संभव है ?


राखी के इंसाफ ने ली एक जान !
आखिर वह हो ही गया, जिसकी कुछ-कुछ कल्पना हमने की थी। दो दिन पहले ही हमने एनडीटीवी इमेजिन पर दिखाए जा रहे शो राखी का इंसाफ पर लिखा था, राखी का इंसाफ या कानून का मजाक। जैसा कि अनुमान था कि इस तरह इंसाफ से किसी न किसी को खासा नुकसान होना ही था, वह हो गया। बुंदेलखंड के झांसी क्षेत्र के राजगढ़ से इंसाफ मांगने आए शख्स लक्ष्मण को शो पर जितनी बेईज्जती मिली, उसने जिंदा रहने की बजाय मौत को गले लगाना ही उचित समझा। पारिवारिक विवादों तथा ससुराल पक्ष से चल रहे झगड़े को उसने टीवी शो के माध्यम से सुलझाने की चाह में हिस्सा ले लिया और राखी ने उसे कह दिया नामर्द। शो में आए लोगों के अलावा टीवी पर कार्यक्रम देख रहे लोगों के बीच इस तरह का अपमान वह सहन नहीं कर सका। क्या राखी के पास कोई ऐसा पैमाना था कि वह लक्ष्मण की मर्दानगी की जांच कर पाती, या फिर लोगों के बीच अपना बड़बोलापन साबित करने के लिए कुछ भी कहने की उसे छूट है ? लक्ष्मण इतना अपमान बर्दाश्त करने के बावजूद न तो राखी का कुछ बिगाड़ सकता था न ही उसे कोई इंसाफ मिला, जैसी उम्मीद उसने शो में आने से पहले की थी। अपमान का दंश वह कितने दिनों तक सहता लिहाजा उसने अपनी जान ही दे दी। शो पर आए लोगों का अपमान, महिला अधिकारों का हनन, पुरूषों को उटपटांग करने की उसे इतनी छूट मिली हुई है कि वह गंदे शब्दों का इस्तेमाल करके किसी की भी बेईज्जती कर सकती है ?लक्ष्मण तो इस दुनिया से चला गया, पर इंसाफ जैसे पवित्र शब्द के साथ खिलवाड़ करने वाले एनडीटीवी इमेजिन, शो के निर्माता, राखी सावंत सहित जिम्मेदार लोगों पर कोई कड़ी कार्रवाई होगी ? क्या देश की अदालतें इस तरह इंसाफ के नाम पर उड़ाए जा रहे कानून के मजाक पर संज्ञान लेते हुए इस शो से संबंधित लोगों को लक्ष्मण की मौत का जिम्मेदार मानेगी ? या फिर लक्ष्मण की मौत के किस्से को लोग कुछ दिन बाद भूल जाएंगे, और राखी की ऐसी अश्लील लफ्फाजी पर तालियां पीटेंगे ? इससे बड़े शर्म की बात क्या हो सकती है कि ऐसी महाविवादित, मर्यादा को ताक में रखने वाली, सामान्य बातचीत में भी भद्दे लफ्जों का इस्तेमाल करने वाली राखी सावंत एक मशहूर सेलिब्रिटी और आयटम गर्ल मानी जाती है और लोग उसकी घटिया लफ्फाजी को सुनकर मजे करते हैं और तालियां बजाते हैं। शर्म, शर्म और बेहद शर्मनाक........कैसा है यह राखी का इंसाफ, जिसने लक्ष्मण के साथ इंसाफ की बजाय बेइंसाफी कर दी .


एनडीटीवी इमेजिन पर इन दिनों महाविवादित, महा हौसलामंद सेलिब्रिटी राखी सावंत लोगों का इंसाफ करने में जुटी हुई हैं। आप पूरा प्रोग्राम देखकर बताएं कि इसमें राखी इंसाफ करती हुई दिखती है या फिर खुलेआम अश्लीलता का पाठ पढ़ती हुई गंदी टिप्पणी करती है। 7 नवंबर की रात दिखाए जा रहे एपिसोड मंे तो अश्लीलता की सारी हदें पार ही कर दी गई। कास्टिंग काउच का भंडाफोड करने का स्वांग रचकर स्त्री और पुरूष जाति को भद्दे-भद्दे अलफाजों से नवाजा गया, शो पर इंसाफ मांगने आई माडल रितु और कास्टिंग डायरेक्टर वंश पाठक ने एक दूसरे से मारपीट की, एक और माडल ने वंश पाठक पर अपनी सैंडिलें भी फेंकी, जिसके जवाब में वंश ने भी उससे पीटने की कोशिश की। क्या इस तरह किसी शो में हिंसा दिखाना अपराध नहीं ? शो के दौरान राखी सावंत ने यह टिप्पणी भी की, कि ये लड़के महिलाओं को अपने बाप का माल समझते हैं क्या ? मंच पर मौजूद एक शख्स को उसने कह दिया कि तू फट्टू है। यह सब देखकर भी लोग चुप हैं या मजे ले रहे हैं। इस कार्यक्रम में पुरूषों को ही नहीं, महिलाओं को भी अपमानित किया जा रहा है। जब राखी जैसे लोग इंसाफ के नाम पर यह सब करेंगे तो जाहिर है कि वह इंसाफ नहीं कानून का मजाक भी है और इंसाफ जैसे पवित्र काम करने का हक आखिर उसे किसने दे दिया, यह एक बड़ा सवाल है। इसके पहले भी मशहूर आईपीएस अधिकारी रहीं किरन बेदी स्टार प्लस पर आपकी कचहरी के नाम से लोगों के परिवारों की समस्याएं सुलझाने में लगी हुई थीं, उस कार्यक्रम में एक मर्यादा झलकती थी, लोग भद्दे लफ्जों का इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। लेकिन राखी के ऐसे इंसाफ ने तो इंसाफ जैसे पवित्र लफ्ज के मुंह पर तमाचा ही मारा है। इतनी घटिया हरकतें टीवी चैनल पर देखने के बाद तो यही लगता है कि देश का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय कुंभकरण की तरह सो रहा है। जिसे जगाने के लिए बड़े-बड़े ढोल-नगाड़ों, छप्पन भोग, पूरी-पकवानों और 5 डेसीबल से अधिक आवाज वाले पटाखों की जरूरत है, फिर भी यह कुंभकरण जाग जाएगा, इसमें संदेह है।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में पत्रकारिता की मान-मर्यादा कैसे बचेगी, यह किसी को तो सोचना होगा। तमाम दुनिया को आईना दिखाने वाले और खुद को पाक साफ होने का दावा करने वाले चैनल या अखबार क्या वास्तव में वैसे ही हैं, जैसा वे खुद को पेश करते हैं ? पीत पत्रकारिता लगातार हावी होती जा रही है। आए दिन खबरें सुनने को मिल रही हैं कि फलां पत्रकार ब्लेकमेलिंग करते धरा गया, फलां रिपोर्टर महिला शोषण के आरोप में जेल गया, फलां पत्रकार को लोगों ने पीटा। खबरों के साथ खेल करने वाले बढ़ते ही जा रहे हैं और जिस पत्रकारिता को एक महान उद्देश्य मानकर लोग इससे जुड़ने में फक्र महसूस करते थे, वही अब शर्मसार होने लगी है। जिन लोगों को पत्रकारिता की एबीसीडी भी मालूम नहीं, ऐसे लोग बड़ी-बड़ी बातें करके एक प्रेस कार्ड जुटाकर या खरीदकर उसके दम पर खुद को बहुत बड़ा और पहुंचा हुआ पत्रकार बताने से बाज नहीं आते, इसका खामियाजा वे लोग भुगत रहे हैं जो वास्तव में पत्रकारिता को मिशन समझकर इस सेवा में आए। देष के महान संत-कवि कबीर के दोहे कि बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजां आपना, मुझसे बुरा न कोय, को भूलकर चैनल देश के नेताओं, अफसरों और कई अन्य लोगों के भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए तिकड़म करते दिखते हैं। वहीं सत्ताधारियों और नेताओं की चापलूसी भी कई पत्रकारों के रगों में समाने लगी है। दारू पीकर, मुर्गा खाकर, पैसे लेकर खबरें छापना और दिखाना अब पुरानी बात हो चुकी। लेकिन उसका परिणाम क्या मिला यह आजतक गौर नहीं किया जा रहा है, प्रिंट मीडिया फिर भी कुछ हद तक नियमों का पालन करता दिखता है, पर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तो सारे नियम-कायदों को ताक पर धर दिया लगता है। छत्तीसगढ़ में चल रहे क्षेत्रीय चैनलों को देखें तो खुद को आगे दिखाने की होड़ में हर खबर एक्सक्लूसिव बता दी जाती है, लोगो, आईडी कितने भी लगे हों, खबर चाहे अन्य चैनलों पर भी चल रही हो, विजुअल चाहे कहीं से भी कैसे भी हासिल किए जाएं, लेकिन कुछ चैनलों के लिए हर खबर एक्सक्लूसिव है ! क्यों यह होड़ मची है, क्यों खुद को विष्वसनीय बताने की आपाधापी है, क्यों हल्ला मचाया जाता है कि हमारी खबर का असर हुआ है, क्यों यह बताया जाता है कि हम ही सबसे ज्यादा जनता के षुभचिंतक हैं ? एक चैनल पर पिछले दिनों देखा कि कड़वे प्रवचन बोलने वाले क्रांतिकारी मुनि तरूण सागर जी उस चैनल के बारे में मीठे वचन बोल रहे थे। आखिर क्यों चैनलों को जरूरत पड़ रही है खुद को विष्वसनीय बताने के लिए किन्हीं शख्सियतों की। क्योंकि आम जनता का विश्वास अब दारूबाज, वसूलीबाज, नेताओं के चारण-भाट बनते जा रहे पत्रकारों की वजह से पत्रकारिता पर से घटने लगा है। मैं खुद एक चैनल में स्ट्रिंगर हूं, लिहाजा खबर बनाने के लिए कई गांवों में जाना ही पड़ता है, कुछ जगहों पर तो लोगों की बातें सुनकर लगता है कि चैनलों की विश्वसनीयता बढ़ रही है, लेकिन अधिकतर जगहों पर यही ताने सुनने पड़ते हैं कि भैया सामने वाली पार्टी से सेटिंग मत कर लेना। अफसर से पैसे खाकर खबर मत रोक देना। भैया चैनल में खबर आएगी भी या नहीं ? हमारी बनाई खबरें चैनल पर नहीं चल पाएं, इसके और भी कई कारण हो सकते हैं, पर आम जनता सीधे ही अनुमान लगाने लगती है कि संबंधित पत्रकार या स्ट्रिंगर ने सांठगांठ करके खबर भेजी ही नहीं। ऐसी बातें सुनकर मन दुखी होना स्वाभाविक है कि जब अपने पक्ष में कोई नहीं कहता तो बुरा लगता है, लेकिन क्या यह सिर्फ हमारी आलोचना हो रही है या फिर उस चैनल पर भी अविश्वास जताया जा रहा है, जिसके हम कर्मचारी हैं। एक विदेशी मषहूर टीवी एंकर हैं ओपेरा विनफ्रे, जिनके बारे में थोड़ी बहुत जानकारी मुझे है, विनफ्रे टीवी चैनल पर किसी प्रोडक्ट या पुस्तक या फिर किसी व्यक्ति के बारे में बताती है, तो उस पर अधिकतर दर्शकों को विष्वास होता है और संबंधित चीजें लोकप्रिय भी हो जाती हैं। कई बरस पहले देशबंधु में वरिष्ठ पत्रकार और संपादक( वर्तमान में छत्तीसगढ़ के संपादक) रहे सुनील कुमार जी ने अपने स्तंभ आजकल में लिखा था कोई ओपेरा विनफ्रे है यहां ? वाकई वर्तमान में ओपेरा विनफ्रे जैसी शख्सियतों की जरूरत यहां के चैनलों को है, जिससे दर्षकों के बीच विश्वसनीयता का माहौल बन सके। वहीं देशबंधु में ही वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर चैबे जी ने दो महीने पहले लिखा था कि चैनलों का संपादकीय कहां है ? वास्तव में चैनलों में संपादक का कोई रोल दिखता नहीं, चैनल अगर अपने किसी संपादक के विचारों को, देष की वर्तमान स्थितियों को या फिर किसी जरूरी मुद्दे को, आम जनता की आवाज को बिना छेड़छाड़ किए पेश करे तो दर्षकों के बीच विष्वसनीयता का माहौल भी बनेगा और उस चैनल का वैचारिक स्तर भी पता लगेगा कि वह अपनी कही बातों पर कितना खरा उतरता है। आज के दौर मैं तो यही मानता हूं कि वक्त के साथ बदलाव जरूरी है लेकिन पत्रकारों के कदाचरण को बढ़ावा देने से सिर्फ और सिर्फ भविष्य में नुकसान ही होना है। चैनल के जवाबदार ओहदेदार अधिकारी अगर थोड़ा भी अपने पत्रकारों और टीवी रिपोर्टरों को सदाचार सिखाएं, और खुद भी उसका पालन करें तो किसी बाबा, विनफ्रे और शख्सियतों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी कि उनका चैनल अच्छा है, जनता का हितचिंतक है, भ्रष्टाचार का विरोधी है। वर्तमान की पत्रकारिता और माहौल को देखते हुए यह माना जा सकता है कि कोई पत्रकार, नाना पाटेकर की तरह क्रांतिवीर तो नहीं बन सकता, लेकिन जिसके नाम पर पत्रकार सम्मान पाते हैं, जिसके दम पर तमाम सुविधाएं जुटाते हैं, उस पत्रकारिता का सम्मान तो कायम रखें, बनियागिरी यानि व्यापार करने वालों के बीच एक प्रचलित कहावत है कि नियत अच्छी होगी तो धंधा अच्छा होगा। लोग जब इसे धंधा मानने ही लग गए हैं तो पत्रकारों को अपने पेशे से ईमानदारी दिखानी होगी, नियत साफ करनी होगी। वरना पत्रकारिता की मान-मर्यादा को भविष्य में खतरा ही खतरा है। मेरी बात फिलहाल खत्म इस माफी के साथ, कि जो भी पत्रकार मिशन मानकर इस पेशे को अपनाए हुए हैं, यह बातें उनपर लागू नहीं होती।

सन २००९ में छत्तीसगढ़ प्रदेश की सबसे महँगी माँ दुर्गा की मूर्ति थी ३ लाख रुपये की लागत से बनी, १३ अक्टूबर को पढिये हमारे ब्लॉग पर, नवरात्री में बनी देश की सबसे महँगी मूर्ति की रिपोर्ट "७५ लाख की नवदुर्गा" इन्तजार कीजिये सिर्फ २४ घंटे का।








छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले में नैला रेलवे स्टेशन क्षेत्र में ३ लाख रूपये के सिक्कों से माँ दुर्गा की मूर्ति को सजाया गया है, मूर्ति में लगाये गए सभी सिक्के १० रूपये के हैं और इनकी संख्या ३० हजार बताई जा रही है, इस हिसाब से यह छत्तीसगढ़ राज्य ने नवरात्री में स्थापित की गयी माँ दुर्गा की सबसे महँगी मूर्ति हो सकती है,

वो गली हुस्‍न की, ये आशिकी का शहर
दिल में जिंदा है तेरी, तीरे नजर तीरे नजर
वो गली हुस्‍न की....
दिल में तूफ़ान उठा ये चांदनी देखकर
चांद शर्मिंदा हुआ तुझको दिलनशीं पाकर
फिर उठी दर्दे लहर,एक नजर एक नजर
वो गली हुस्‍न की.....

मय से मयकदा से, इश्‍क इक अदा से
जिंदगी है आज मेरी, तेरी ही सदा से
मय से मयकदा से........
सुर्ख सुर्ख आंखों में अश्‍क थे भरे
मेरी ये दिले हालत क्‍या बयां करें
अलविदा करके तुझे हो गए जुदा से
मय से मयकदा से्....
तू नहीं तो ऐ दिलबर, जाम साथ है
फानी दुनिया में जीना अपने हाथ है
अब शिकवा किससे करें, खुद से या खुदा से
मय से मयकदा से.....

केन्‍द्र में सत्‍तारुढ यूपीए नीत गठबंधन की कांग्रेस सरकार अल्‍पमत में आने की स्थिति में है। खिचडी सरकारों का कामकाज वैसे भी सहयोगी दलों के दबाव में चलता है, और कई मुददों पर सत्‍तासीन सरकार को शर्मनाक स्थिति से गुजरना पडता है। आम जनता की हितों के मुददों को राजनीतिक दबाव के चलते रोक दिया जाता है। केन्‍द्र सरकार का कार्यकाल अब अंतिम बरस में है और हर बार कुछ मुददों को लेकर सरकार के खिलाफ आंखे तरेरने वाले वाम मोर्चा का आक्रोश नूरा कुश्‍ती ही साबित होता आया है। कई बार तो वाम दलों का यह खोखला विरोध देखकर लगता है कि उनकी सिर्फ आंखे ही लाल दिखती है और खून में सफेदी आने लगी है,वरना बार बार विरोध करने के बाद किन कारणों के चलते कांग्रेस को समर्थन देकर रखा है। केन्‍द्र सरकार का कार्यकाल पूरा होते देखते हुए वाम मोर्चा अब उंगली कटाकर खुद को शहीद बताने की तैयारी में है। केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों के गठबंधन के मुददे पर समर्थन देना और वापस लेना मेरे हिसाब से पूरी तरह भारतीय लोकतंत्र का मखौल उडाने के समान है। सरकार को जनहित के बजाय खुद के स्‍वार्थों के चलते समर्थन देकर सहयोगी दल खडा रखते हैं और समर्थन वाली सरकार की आड में पार्टी के चेले चप्‍पूओं को लाभ दिलाने का खेल चलता रहता है। भारत में लोकतंत्र के प्रभाव को और मजबूत करने संविधान में बहुत से संशोधन किए जाने की जरुरत है और खिचडी सरकारों के कामकाज से वैसे भी संतुष्टि तो सिर्फ लाभ मिलने वालों और संबंधित पार्टियों के लोगों को होती दिखती है। भारतीय भोजन में खिचडी को सादा और फायदेमंद माना जाता है पर यह खिचडी किसी के लिए घर में तभी बनती है जब कोई बीमार हो या उसे अनाप शनाप खाने पर रोक हो। ऐसी ही खिचडी सरकार बीमार सोच की सरकार बन जाती है। देश में सरकार तो ऐसी हो कि कम से कम जनहित के लिए लागू होने वाले संविधान को पास करने के लिए अतिरिक्‍त समर्थन की जरूरत न पडे। यह तो विडंबना है कि सत्‍ता की कुर्सी पर काबिज होने के लिए तमाम काबिल ना‍काबिल समझौते कर लिए जाते हैं। पिछले चार बरस से केन्‍द्र सरकार वाम मोर्चा को और वाम दल कांग्रेस सरकार को झेलते आ रहे हैं आखिर किसलिए, जनता के हितों के लिए या खुद कुर्सी पर बैठने के लिए। बहरहाल देश भर में वाम दलों की समर्थन वापसी पर सबकी निगाहें हैं और विपक्षी दलों को भी सरकार गिरने का इंतजार है। पर बात बात पर आंखे लाल करने वाले वामपंथी इस तरह से न तो जनता का भला कर सकेंगे और न ही खुद का, सफेद होते खून को अब हीमोग्‍लोवीन की जरुरत है और खून में लाली बनाए रखने के लिए अपनी नीतियों पर मजबूती से कायम रहने की जरूरत है।





कुदरत का करिश्‍मा भी अजीब और चमत्‍कार भरा होता है, कहीं भैंस को पानी में आराम करते देखकर आनंद महसूस होता है,तो कहीं तितली की तरह का कीट देखकर, प्रवासी पक्षी पाउला रुबीनो हो या मटरगश्‍ती करती बत्‍तखें,छायाकार अपने कैमरे को रोक नहीं पाता। ऐसी ही कुछ तस्‍वीरें...







जांजगीर की छात्रा का फर्जीवाडा
खबर एक्‍सप्रेस की खबर हुई सच
जांजगीर चांपा जिले में पिछले चार दिनों से बारहवीं की प्रावीण्‍यता सूची में फर्जीवाडा उजागर होने के बाद शिक्षा जगत में हलचल है, खबर एक्‍सप्रेस में नकल की स्थिति पर लिखा गया आखिर सच साबित हुआ कि किस तरह कामचोरी नकल करके कसडोल क्षेत्र के सेमरा गांव की छात्रा पोरा बाई ने जांजगीर के बिर्रा गांव से बारहवी की परीक्षा दिलाई और प्रदेश के सभी मेधावी छात्र छात्राओं को पीछे छोडते हुए प्रथम स्‍थान हासिल किया, बारहवीं का परिणाम घोषित होने के बाद शंका के आधार पर प्रावीण्‍यता सूची में नंबर एक पर आने वाली पोरा बाई की उत्‍तरपुस्तिका की जांच माध्‍यमिक शिक्षा मंडल के अध्‍यक्ष बी के एस रे ने कराई तो जो सच सामने आया उसने प्रदेश के शिक्षा जगत को तार तार कर दिया पिछले चार दिनों से इस मामले का खुलासा होने के बाद प्रतिभावान विद्यार्थी भी सकते में हैं, नकल के संबंध में हमने कर्मवीरों पर हावी कामचोरों की नस्‍ल में लिखा था कि किस तरह बडे पैमाने पर यहां शिक्षा जैसे पवित्र पेशे को दागदार किया जा रहा है, जब बारहवीं की परीक्षा चल रही थी तब माध्‍यमिक शिक्षा मंडल के अध्‍यक्ष श्री रे ने नकल का असली रुप देखा और उन्‍होंने स्‍वीकार किया था कि जिले भर में बडे पैमाने पर शिक्षा के नाम पर खेल जारी है, पर यह जानने के बाद भी उन्‍होंने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, शिक्षा विभाग के अफसरों कर्मचारियों व निजी स्‍कूलों के संचालकों की मिलीभगत से वर्षों से इस जिले में यह धंधा फल फूल रहा है पर ऐसे सारे अधिकार प्राप्‍त लोगों ने कार्रवाई के बजाए अपना स्‍वार्थ ही देखा और बोर्ड परीक्षा का परिणाम बताने में जल्‍दबाजी कर दी नकल के नाम पर कुख्‍यात हो चुके जांजगीर जिले के बारे में अफसरों को पहले से मालूम था तो प्रावीण्‍यता सूची जारी करने में आखिर जल्‍दबाजी क्‍यों दिखाई गई यह सवाल अब भी अपनी जगह कायम है कि प्रावीण्‍यता सूची में आने वाले विद्यार्थियों की उत्‍तरपुस्तिका की दो तीन बार जांच की जाती है पर ऐसा नहीं किया गया और इस मामले ने शिक्षा विभाग की कार्य प्रणाली को संदेह के दायरे में खडा कर दिया, नियमों को ताक में रखते हुए अनेक परीक्षा केन्‍द्रों को मान्‍यता दी गई और माशिम के तत्‍कालीन सचिव एल एन सूर्यवंशी ने इसे छात्र हित बताया नतीजतन ऐसे छात्रहित को अब प्रतिभावान विद्यार्थियों को झेलना पड रहा है, इस फर्जीवाडे के उजागर होने के बाद अब जांच की जा रही है और इसके लिए कार्रवाई करने बलि के बकरे ढूढे जा रहे हैं सवाल यह भी उठता है कि जिले में शिक्षा के नाम पर चल रहे खेल में अधिकारियों को कोई जिम्‍मेदारी नहीं बनती तो क्‍या ऐसे लोगों को जिम्‍मेदार मानकर उन पर कार्रवाई की जाएगी अब यह तो आने वाले समय में पता चलेगा क‍ि राजधानी में बैठे अधिकारियों की शह पर नासूर बन चुकी नकल को बढावा देने वालों पर भी कोई कार्रवाई होगी या बलि के बकरों से ही काम चलाया जाएगा,

छत्‍तीसगढ की भाजपा सरकार अपनी उपलब्धियों पर काफी खुश दिखती है, विकास यात्रा निकाल कर हूजूर देखना चाहते हैं कि चुनाव के इंतजार में बैठा गली मो‍हल्‍ले और श‍हर की तेज भागती दुनिया से अलग कमाने खाने की चिंता में दुबला होता गरीब किस हालत में है अभी अभी ग्राम सुराज का जिन्‍न पूरे जिलों में घूम घामकर बोतल में बंद हुआ है और अब विकास यात्रा का सैलाब पूरे प्रदेश में आने को बेताब है प्रदेश के बीसों गुना बढ चुके बजट और विकास का अनुपात देखें तो लगता है कि भारी भरकम बजट के अनुरुप आधा काम हो रहा है गांव और गरीब के नाम पर निकलने वाले नोटों से रसूखदार अफसरों ठेकेदारों दलालों के घर भरते जा रहे हैं सरकार की न्‍यायप्रणाली तो जैसे कुंभकरण की तरह छह महीने की नींद के बजाय कई महीनों तक सोई दिखती है सरकार के अन्‍यायपूर्ण फैसलों को लेकर अधिकतर मामलों में लोग हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं
सरकारी अफसरों का अन्‍याय बढता जा रहा है,भ्रष्‍ट अफसर तरक्‍की पा रहे हैं और इन अफसरों की जी हूजूरी कर कर के आम और गरीब भी थकने लगे हैं, राज्‍य का मुखिया कैसा है इस पर कुछ कहना बेमानी होगा पर यह सौ फीसदी सत्‍य है कि उनके मंत्रीमंडल के सदस्‍य और उन मंत्रियों के चहेते अफसर बेखौफ बेलगाम और बेबाक हो कर मनमानी करते हैं,जांजगीर जिले में ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे जहां राजनीतिज्ञों की सरपरस्‍ती के चलते अधिकतर विभागों के अफसर मानों अपनी मर्जी के मालिक हो चुके हों, मुख्‍यमंत्री डा रमन सिंह ने पिछले दिनों कहा था कि वे गरीबी रेखा के तहत मिलने वाले चांवल के बारे में अगले सौ बरसों तक कुछ नहीं सुनेंगे राज्‍य के मुखिया की यह सोच काफी अभिभूत करने वाली है, यह बात तब और भी प्रभावी होती जब वे गरीबों तक राशन पहुंचाने वाले खाद्य विभाग नागरि‍क आपूति और स्‍टेट वेयर हाउस व ठेकेदारों की चांडाल चौकडी पर कोई लगाम लगा पाते, सवाल यह नहीं कि राज्‍य सरकार पर्याप्‍त राशन नहीं दे रही है सवाल तो यह है कि क्‍या वाकई में इसके पात्र गरीब हितग्राही को राशन का लाभ मिल पा रहा है अब सरकार की विकास यात्रा राज्‍य भर के दौरे के लिए निकली हुई है इसके क्‍या प्रभाव पडे यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा पर यह बात तो मुख्‍यमंत्री जी को भली भांति समझनी होगी कि सरकार की प्रणाली आम लोगों को न्‍याय नहीं दे पा रही है सरकार के कई अन्‍यायपूर्ण फैसलों से आम लोग बहुत खुश नहीं हैं जांजगीर चांपा की आने वाली सबसे बडी समस्‍या प्रदुषण और पर्यावरण ही होगी जहां गरीब किसानों की जमीनों पर बडे उद्योग स्‍थापित किए जा रहे हैं किसानों की जमीन पर जब उद्योग लगेंगे तब वह माटीपुत्र बोएगा क्‍या और खाएगा क्‍या यह देखना तो सरकार का काम्‍ा है कि अधिकतर क्षेत्र सिंचित होने के बावजूद धान की फसल पिछले वर्ष की तुलना में कम क्‍यों हुई किसानों के हिस्‍से का पानी जब उद्योगों को दिया जाएगा तब बेचारा किसान अपने सूखते खेतों की प्‍यास कैसे बुझा पाएगा जिले की जीवनदायिनी हसदेव नदी में लगातार उद्योगों का प्रदूषित पानी छोडा जा रहा है इसमें निस्‍तार करने वालों और सिंचाई के उपयोग में आने वाले पानी से क्‍या क्‍या बीमारियां फैल सकती हैं इसकी तनिक भी परवाह किए बिना नित नए उद्योंगो के साथ सरकार एमओयू किए जा रही है औद्योगिक विकास के हम तनिक भी खिलाफ नहीं हैं पर कुदरत को नुकसान पहुंचाए बिना किया गया विकास ज्‍यादा लंबे समय तक चल सकता है छत्‍तीसगढ राज्‍य में कुदरत के नियमों के खिलाफ किया गया औद्योगिक विकास एक न एक दिन कैटरिना, नर्गिस और सुनामी को आमंत्रण ही देगा पूरी दुनिया में आज भी ग्‍लोबल वार्मिंग को लेकर बहस चलती रही है पर सरकार के सरोकार इससे जुडे हो ऐसा दिखता नहीं बहरहाल गरीबों की मसीहाई करने वाले राज्‍य के मुखिया,जरा इधर भी देखें



नकल कैसे रुके ,इसकी चिंता किसे है?



रतन जैसवानी




जांजगीर जिले में नकल ने हर बरस क्षेत्र को पूरे प्रदेश में बदनाम किया हुआ है। पिछले कई बरसों से यह जिला नकल के लिए खासा कुख्यात रहा है। लगभग तीन वर्षो से मैं खुद यहाँ की प‍रीक्षाओं का हाल देख रहा हूं सतही खबरों से छनते-छनते अब थोडा-बहुत इस बारे में सही जानकारी मिलने लगी है। चोर का माल चंडाल खाए, की तर्ज पर स्कूल संचालकों से लेकर शिक्षा विभाग के कर्मचारी,अधिकारी,गांव के दबंग जनप्रतिनिधि जिसे जैसा मौका मिला,स्वार्थ सिध्द करने में नहीं चूकते। हर साल परीक्षाओं के शुरू होने से लेकर खत्म होने तक अखबार और टीवी पर जांजगीर जिले की नकल की खबरें अमूमन रोज देखने को मिलती हैं,और शिक्षा में सुधार की गुंजाइश को सरकारी अमला सिरे से खारिज करते अपने ही तर्क-कुतर्क पेश करता है। बोर्ड परीक्षाएं शुरु होने के दूसरे दिन जिले के दौरे पर पहुंचे माध्यमिक शिक्षा मंडल के अध्यक्ष बी के एस रे ने दो दिनों तक ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया। अखबार वाले इस फिराक में बैठे रहे कि माशिम अध्यक्ष से कब वार्ता हो और नकल के संबंध उन्हें घेरा जाए। मगर श्री रे इस मामले में काफी चतुर निकले, जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा पत्रकारों को यह खबर मिली कि वे दूसरे दिन परीक्षा केन्द्रों का दौरा करने के बाद बातचीत करेंगे। पर दूसरे दिन वे बलौदा क्षेत्र का दौरा करने के बाद वापस ही नहीं लौटे और वहीं से बिलासपुर होते हुए रायपुर वापस चले गए। उनके साथ पत्रकार वार्ता नहीं हो सकी।




सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कि श्री रे साहब के दौरे के दूसरे दिन हम सुबह आठ बजे ही उनके काफिले के पीछे लग चुके थे। बलौदा क्षेत्र के करमंदा, पहरिया,पोंच,पंचगवां के स्कूलों में, नकल कैसे होती है यह पहली बार करीब से देखने को मिला। स्कूलों के आसपास नकल कराने वालों की भीड़,और अंदर में बेखौफ नकल करने वाले छात्र-छात्राएं हाथों में पुस्तक कापियां चिट के पुर्जे लिए हुए थे। रे साहब तो यह देखकर हैरत में ही पड़ गए थे कि नकल इस तरह भी होती है। पोंच के परीक्षा केन्द्र के बाहर उनसे कुछ देर खड़े-खड़े ही बातचीत हो सकी। बातचीत के दौरान उन्होंने माना कि नकल को रोकना यहाँ बहुत कठिन है। कोई कड़क नीति बनाए बिना यह संभव ही नहीं कि आने वाले बरसों में यहाँ नकल होना रुक जाए या निजी स्कूलों के फर्जीवाड़े को रोका जा सका। यह सब देखकर भी वे इसे रोकने के बारे में कोई ठोस कदम उठाने की चर्चा से बचते रहे। फिर वे वहाँ से बिलासपुर की ओर निकल गए।




सत्रह मार्च को परीक्षा के मूल्यांकन हेतु बनाए गए केन्द्र का निरीक्षण करने माध्यमिक शिक्षा मंडल के सचिव एल.एन. सूर्यवंशी यहाँ पहुंचे तो इत्तेफाकन पता चलने के बाद रेस्ट हाउस में उनसे बातचीत हुई। लगभग एक घंटे की बातचीत में उन्होंने हर प्रश्न का जवाब घुमा फिरा कर दिया।




कार्रवाईयों के आधार पर देखें तो जितना बड़ा गोलमाल नकल के नाम पर होता है। उसके बनिस्बत मामूली सी कार्रवाईयां हुई,पुलिस ने सौ-पचास लोगों को नकल कराने के आरोप में हवालात की राह दिखाई। उड़नदस्तों की टीम ने लगभग एक हजार नकल प्रकरण बनाए।




नकल के विषय में काफी बातों को गौर करने के बाद यह भी समझ में आता है कि या बातों की लप्फाजी से इसका हल निकल पाएगा या विधानसभा के उपचुनाव की तरह एसएएफ बटालियन के साए में एकाध बार बोर्ड परीक्षाएं कराई जाएंगी?




एक बात और है कि अभिभावक भी ऐसे मामलों में अपने बच्चों का साथ देते दिखते हैं। बच्चों को डिग्रियां दिलाने और उसके जायज नाजायज कर्मों पर नजर न रखने वाले,उसे रोकने में कोताही बरतने वाले या इस अव्यवस्था के दोषी नहीं हैं?


नकल के विषय को लेकर मैं इतना क्‍यों सोचता हूं और भी कई बुध्दजीवी इस बारे में सोचते हैं। पर मुझे यह लगता है कि शिक्षा की अव्यवस्था,सोचा-समझा और संगठित भ्रष्टाचार आने वाले दिनों में क्‍या- क्‍या नतीजे लाएगा,इस पर सरकार भी गंभीर नहीं दिखती।



फोटो फाईल



आठ से दस फरवरी तक जांजगीर में हुए जाज्वल्य देव लोक महोत्सव में पहुंचे ख्यातिलब्ध संगीतकार,गायक रविन्द्र जैन, मशहूर शायर व गजलकार निदा फाजली, लाफटर चैलेंज शो में प्रतिभागी रहे नागौद क्षेत्र के कवि अशोक सुंदरानी।

चांपा को कोसा,कांसा और कंचन की नगरी कहा जाता है। कोसे ने चांपा को अंतर्राष्‍टीय पहचान दिलाई है। कोसा बुनते बुनकरों के कुछ फोटो।

एक गरीब के आत्महत्या की कहानी
जांजगीर-चांपा जिले के गोविंदा गांव का मामला
रतन जैसवानी

जांजगीर से 30 किमी। दूर बम्हनीडीह विकासखंड के गोविंदा ग्राम पंचायत में रामशनि पटेल ने 5 मार्च को कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। चांपा विधायक मोतीलाल देवांगन ने इस खबर की विज्ञप्ति व एक सीडी ६ मार्च की शाम को लगभग सभी अखबारों के कार्यालयों में भिजवाई थी। साथ में वहां की महिला सरपंच द्वारा विधायक को इस मौत के बारे में दी गई शिकायत की प्रतिलिपि भी भेजी गई थी। दूसरे दिन कुछ अखबारों में विधायक के हवाले से यह खबर छपी थी कि रामशनि ने रोजगार गारंटी का भुगतान न मिलने के कारण आत्महत्या कर ली, इस बात का उल्लेख भी था कि उसकी पत्नी गर्भवती थी और रामशनि आर्थिक अभाव के कारण उसका इलाज कराने में असमर्थ था जिसके कारण गर्भ में पल रहे दो बच्चों की मौत हो गई। पर पूरी तरह से रोजगार गारंटी का तीन हफतों तक भुगतान न मिलने वाली बात को इसका कारण ठहराया गया था।

मार्च को इस खबर की विस्तृत जानकारी लेने के लिए मैं और सहारा समय के संवाददाता राजेश सिंह क्षत्री मोटर सायकिल पर गोविंदा गांव पहुंचे। उस वक्त दिन के लगभग साढ़े ग्यारह बज रहे थे। मुख्य सड़क से लगा हुआ ग्राम पंचायत भवन है। जब हम वहाँ पहुंचे तो ग्राम पंचायत भवन के साथ बने हुए मंच पर चांपा के एसडीएम सुशील चंद्र श्रीवास्तव,ग्रामीण यात्रिंकी विभाग के कार्यपालन यंत्री पी। के। गुप्ता,बम्हनीडीह जनपद की सीईओ वंदना गबेल और कुछ अन्य अफसर गांव के ही कुछ ग्रामीणों से बात कर रहे थे। हमने वहां मौजूद अफसरों से रामशनि की आत्महत्या के बारे में चर्चा की। एसडीएम श्रीवास्तव ने कहा कि रामशनि ने निश्चित ही आर्थिक अभाव के कारण आत्महत्या की है। पर रोजगार गारंटी का भुगतान न होना इसका कारण नहीं है। उन्होंने गांववालों से बात की है जिसमें यह तथ्य सामने आया है कि पत्नी का इलाज न करा पाने से वह बहुत दुखी था। फिर हमने गांव के सरपंच के बारे में पूछा तो ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ महिला सरपंच है, ग्राम पंचायत का अधिकतर कामकाज उसका पति रामसहाय सोनवानी ही देखता है। वह कहाँ मिलेगा, पूछने पर गांववालों ने बताया कि वह सामने पान दुकान पर बैठा हुआ है।

हम दोनों मंच से उठे और पान दुकान पर पहुंचे। उसे अपना परिचय देने के बाद हमने रामशनि के संबंध में बात की। उसने भी यह कहा कि तीन हफतों की मजदूरी का पैसा नहीं मिलने से वह परेशान था,आत्महत्या के एक दिन पहले ही वह उससे मिला था और पैसे मांगे,रामसहाय ने पैसे नहीं होने की बात कही तब उसने आक्रोश में कहा था कि वह सरपंच को मार डालेगा या खुदकुशी कर लेगा। दूसरे दिन सुबह उसने कीटनाशक पीकर जान दे दी। हमने रामशनि के परिजनों से मिलने की बात कही तो रामसहाय ने कहा कि अभी कुछ देर पहले ही उसके परिवार के लोग अस्थि फूल चुनने के बाद तालाब से लौटे हैं,एकाध घंटे बाद ही मिलना ठीक रहेगा। इसी बीच एसडीएम व अन्य अफसर मंच से उतर कर अपने चार पहिया वाहनों में वापस हो गए।

हम वहीं एक घंटा इतजार करते रहे। एक घंटे के बाद हम तीनों एक ही मोटर सायकल पर बैठकर रामशनि के घर पहुंचे। रामशनि का घर ग्राम पंचायत से लगभग आधा किमी। दूर था। जब हम लोग वहाँ पहुंचे तब उसके परिवार के लोग व कुछ रिश्तेदार घर के अंदर भोजन करते दिखे,हम तीनों पड़ोस के एक मकान के बरामदे में बैठकर इंतजार करने लगे। लगभग पंद्रह मिनट बाद रामशनि के पिता श्यामलाल पटेल ने हमसे बात की। उन्होंने बताया कि रामशनि के पास कमाई का कोई जरिया नहीं था। पिछले साल ही उसकी शादी हुई थी तब उसके पिता ने ही सारा खर्च उठाया था। उसकी पत्नी अनिता और वह मजदूरी करके गुजर-बसर करते थे। कुछ माह पहले ही उन्होंने बँटवारा कर लिया था। इस बार खेती से उसे चार बोरा धान मिला था जिसे वह आर्थिक अभाव के कारण बेचने की बात करता तो पत्नी व उसकी मां ने मना कर दिया। पैसों के अभाव में वह परेशान रहा करता था। कई लोगों से कर्ज ले लिया था,इसलिए पत्नी के इलाज के लिए उसे कहीं से पैसा नहीं मिला। गांव में ही रोजगार गारंटी योजना के तहत नए तालाब निर्माण में उसने कुछ दिन काम किया था,जिसका भुगतान अब तक किसी को नहीं मिला है। दो हफतों का भुगतान पहले मिला था,उसके बाद पैसा नहीं मिला। बताते वक्त श्यामलाल की आंखों में आंसू आ गए। उसके बाद हम वहाँ से लौटे। रामसहाय को ग्राम पंचायत भवन के पास छोड़कर वापस लौट गए। लौटते वक्त रामसहाय ने कहा कि अफसर उसे जेल भेजने की धमकी दे रहे थे। पर वे ग्रामीणों की गालियां खाने से अच्छा है कि पद से हटा दिया जाए या भले ही जेल भेज दिया जाए। इसके बाद लौटते वक्त बम्हनीडीह जनपद में एसडीएम की गाड़ी खड़ी देखकर हम उनसे मिलने रूक गए।

जनपद कार्यालय में एसडीएम श्रीवास्तव,सीईओ वंदना गबेल बैठे हुए थे तथा रोजगार गारंटी के मस्टररोल की जांच कर रहे थे। मैंने और राजेश ने भी वहाँ रखे मस्टर रोल को लगभग 40 मिनट तक देखा, कि आखिर रामशनि को कितने दिन की मजदूरी का भुगतान मिलना बाकी था। पांच हफतों के मस्टररोल देखने के बाद पाया कि पहले व दूसरे हफते के काम का भुगतान उसे मिल चुका था। तीसरे हप्ते में उसने 4 दिन व उसकी पत्नी अनिता ने 6 दिन मजदूरी की थी जिसका कुल भुगतान 690 रूपए उन्हें नहीं मिला था। चौथे व पांचवें हप्ते के मस्टररोल में उनका कहीं नाम नहीं था। गोविंदा का सचिव दिलहरण केंवट भी वहीं मौजूद था। उससे इस संबंध में बात की गई तो उसने बताया कि 5 मार्च को तीन हप्तों के मस्टररोल जमा किए थे। और उसी दिन रामशनि ने आत्महत्या कर ली थी। रोजगार गारंटी का मूल्यांकन करने वाले उप-अभियंता भी हड़ताल पर रहे जिसके कारण कार्य का मूल्यांकन नहीं हो पाया। ग्रामीणों और अफसरों से एक और बात पता चला कि रोजगार गारंटी में नए तालाब की प्रशासकीय स्वीकृति से ज्यादा का काम कराया गया है और इसके भुगतान को लेकर विवाद बना हुआ है।

रामशनि की मौत आर्थिक अभाव के कारण ही हुई है, पत्नी का इलाज न करा पाने से वह काफी दुखी था और उसके दो बच्चे जन्म से पहले ही काल कवलित हो गए थे। पर इससे सिर्फ रोजगार गारंटी के भुगतान न होने को कारण ठहराना उचित नहीं है। गोविन्दा गांव के रामशनि की आत्महत्या के जिम्मेदारों पर पूरी जांच पड़ताल के विश्लेषण के बाद कार्रवाई होना भी जरुरी है।

रतन जैसवानी

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