
देश भर से निर्मल सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा के विरोध की खबरें आ रही हैं, और अब उनके समर्थन में भी कुछ लोग जुट रहे हैं। विरोध और समर्थन के बीच मीडिया की भूमिका बहुत सोच-समझकर कदम रखने और गौर करने वाली है।लेकिन अहम् सवाल तो यह भी है कि क्या चमत्कार का दावा सिर्फ अकेले निर्मल बाबा ही कर रहे हैं या अन्य माध्यमों से भी लोगों को झांसा दिया जा रहा है। कुछ अखबारों में लघु विज्ञापन प्रकाशित किए जा रहे हैं कि वशीकरण से मनचाही प्रेमिका पाएं, मनचाही नौकरी पाएं, संतान पाएं, जीवन की हर समस्या दूर करें, क्या यह अंधविश्वास नहीं है ? टीवी चैनलों पर लक्ष्मी कवच, कुबेर यंत्र, शनिकृपा यंत्र, नजर रक्षा कवच आदि यंत्रों-तंत्रों को जोर शोर से प्रचारित किया जाता है, तो ऐसे यंत्रों तंत्रों की क्या प्रमाणिकता है, क्या ऐसे चमत्कार का दावा अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है, वशीकरण से किसी को अपना बनाने की विधि अपराध नहीं है ?
दरअसल भारतभूमि ऋषियों-तपस्वियों, महामानवों, संतों की भूमि रही है। लोगों में आस्था को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशीलता है। बिना जाने-सुने अंधभक्ति और कुतर्क करने वालों को कोई कैसे समझा सकता है कि वर्षों पूर्व लिखे गए रामायण, गीता, बाईबिल, कुरान, वेद-शास्त्र, ग्रंथों में यह बात स्पष्ट है कि जितना कुछ आदमी को अपने जीवन में मिलता है, वह उसका मन ही निर्धारित करता है, आदमी के अंदर अदृष्य रूप से विद्यमान मन ही हमें हर समस्या, खुशी, सफलता, असफलता से सामना कराता है। चैनलों पर प्रसारित किए जा रहे भक्ति कार्यक्रमों में से कुछ में यह बातें बताई ही जाती हैं कि कर्म, मेहनत, अच्छी नियत, लगन और सब्र ही आदमी को जीवन में सफलता देता है, ऊंचाईयां देता है, शांति देता है, प्रसिध्दि देता है। सफलता के मापदंड तय हैं, इसका पालन करने से ही आदमी जीवन को सार्थक बना सकता है। कोई यंत्र-कोई तंत्र, कोई अन्य तरह के गंडे-ताबीज तब तक आदमी को सफल नहीं बना सकते, जब तक उसके अंदर सफल होने की नियत और जज्बा न हो। अगर कोई चमत्कार आदमी को सफलता दिला सकता है तो वह है मन की शक्ति। दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें। इंसान अपने मन को पहले जीते, फिर तो वह दुनिया को जीत लेगा ही। एक और बात जो मुझे खटकती है वो है मीडिया की जिम्मेदारी की। अब निर्मल बाबा प्रकरण में ही देखिए, इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका पर लोग तरह-तरह की बातें बना रहे हैं, कोई कहता है कि बाबा ने फलां चैनल को विज्ञापन नहीं दिया, इसलिए उसके खिलाफ यह सब शुरू हो गया है। आज वही चैनल बाबा प्रकरण में विरोध जताने के लिए उठ खड़े हुए हैं। लाखों रूपए लेकर ऐसे कार्यक्रम प्रसारित करने से पहले क्या चैनलों में बैठे जिम्मेदार लोगों को सोचना नहीं चाहिए कि वे किस तरह का प्रोग्राम पेश करने जा रहे हैं, उससे दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर कैसा प्रभाव-कुप्रभाव पड़ सकता है। सिर्फ एक लाईन लिख देने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है कि
ऐसे यंत्र-तंत्र खरीदने में अपने विवेक का उपयोग करें, क्या मीडिया में बैठे लोगों का कोई विवेक नहीं, कोई जवाबदारी नहीं। प्रोडक्ट बेचना बाजारवाद की एक प्रक्रिया है, लेकिन पढ़ने से ज्यादा श्राव्य और उससे ज्यादा दृष्य का प्रभाव मन मस्तिष्क पर पड़ता है। लोग सफलता के लिए शार्टकट चाहते हैं, क्योंकि इस दौर में हर कोई व्यस्त है, किसी के पास
समय नहीं है। काम क्या है, मालूम नहीं, लेकिन व्यस्त हैं ! ऐसे दौर में जब एक बाबा के खिलाफ अंधविश्वास का आरोप खड़ा हुआ है, तो बाकी फैले अंधविश्वासों को बढ़ावा देना गलत नहीं है ?
टाईटैनिक हादसे के सौ बरस - 1912-2012
0 मिस एनी सी. फंक का बलिदान
0 जांजगीर के मिशन कम्पाउंड में एनी की यादें आज भी बसी हैं
आज से ठीक 100 बरस पहले, 10 अप्रेल 1912 के दिन टाईटैनिक पर उसने अपनी यात्रा शुरू की थी। विशालकाय चलता फिरता शहर सा टाईटैनिक, जिसमें 2223 यात्री बिना किसी हादसे की शंका से निश्चिंत होकर सवार हुए थे। इन सहयात्रियों के बीच उसने अपना आखिरी जन्मदिन जहाज की डेक पर मनाया और जब टाईटैनिक विशाल हिमशैल से टकराकर हादसे का शिकार हुआ, तो अपना जीवन बचाने से पहले उसे दूसरों की जिंदगी की फिक्र हो गई। मानवता परवान चढ़ चुकी थी, जीवनरक्षक नौका सामने थी, मगर अपनी जगह एक अन्य महिला व बच्चे को देकर उसने खतरे की परवाह नहीं की, आखिरकार 15 अप्रेल को टाईटैनिक के साथ समन्दर की अथाह गहराईयों में समा गई। यूनाईटेड स्टेट अमेरिका के पेनसिलवेनिया शहर की रहने वाली मिस एनी क्लेमर फंक के त्याग और बलिदान की यह कहानी इतिहास के पन्नों में दर्ज है और साथ ही उनकी यादें बसी हैं जांजगीर के मिशन कंपाउड के खंडहर में तब्दील होते एक भवन के साथ, जहां एनी ने गरीब बालिकाओं को पढ़ाने के लिए स्कूल खोला और वहीं अनाथालय व हास्टल संचालित किया था।
दिसंबर सन् 1906 में, मेनोनाईट चर्च ऑफ अमेरिका की ओर से मिशनरी के पद पर नियुक्त की गई मिस एनी सी. फंक ने जांजगीर के मिशन कम्पाउंड में गरीब व बेसहारा बालिकाओं को पढ़ाने के लिए स्कूल शुरू किया था, 17 लड़कियों को एनी ने यहां पढ़ाती थी साथ ही अनाथालय व हॉस्टल भी संचालित करती थी। एनी का परिवार अमेरिका के पेनसिलवेनिया शहर में रहता था, पिता जेम्स की पहले ही मौत हो चुकी थी, मां सूसन और भाई होरेंस। अप्रेल 1912 के शुरूआती दिनों में एनी को टेलीग्राम से संदेश मिला कि उसकी मां बहुत बीमार है। मां की तबीयत की फिक्र करते हुए एनी वापस अपने वतन लौटने के लिए जांजगीर से रेलयात्रा कर बाम्बे पहुंची, जहां से पानी जहाज में यात्रा करते हुए वह इंग्लैंड पहुंची और वहां से अमेरिका जाने के लिए हेवरफोर्ड नामक पानी जहाज पर सवार हुई, लेकिन कोयला-हड़ताल के चलते हेवरफोर्ड ज्यादा दूर नहीं जा सका और एनी को थॉमस एंड कुक संस ने टाईटैनिक में कुछ अधिक कीमत देकर टाईटैनिक से अमेरिका जाने का आग्रह किया, जिसे एनी ने मान लिया, 13 पाउंड में टिकट खरीदा, जिसका नंबर था 237671, एल 13, वह द्वितीय श्रेणी की यात्री थी। 10 अप्रेल 1912 को न्यूयार्क के साउथएम्टन से एनी टाईटैनिक में सवार हुई। समन्दर के विशालकाय सीने पर धड़धड़ाता हुआ टाईटैनिक अपने गंतव्य की ओर चला जा रहा था। इसी दौरान विशाल हिमशैल होने की सूचना जहाज के चालक दल को मिल रही थी, मगर टाईटैनिक की खूबियों को भरोसेमंद मानने वाले दल को इसकी फिक्र कहां थी। 12 अप्रेल को एनी ने अपना 38 वां जन्मदिन जहाज पर ही सहयात्रियों के बीच मनाया। 14 अप्रेल की रात 11.40 बजे एक विशाल हिमशैल से टकराने के बाद जहाज में बहुत बड़ा छेद हो गया था, टाईटैनिक डूबने लगा था, तब अपने केबिन में सो रही एनी को कर्मचारियों ने जगाकर हादसे की सूचना दी। किसी तरह जहाज की डेक पर पहुंची, तो जीवनरक्षक नौकाओं से यात्रियों को बचाने की मुहिम जारी थी। नौकाएं पर्याप्त नहीं थी, इसलिए अपनी जान बचाने की फिक्र में यात्रियों के बीच होड़ मची हुई थी और जब जीवनरक्षक नौका में बैठने की बारी आई, तभी पीछे से एक महिला ने एनी की बांह पकड़ ली, रोते हुए उसने गुहार लगाई। नौका में एक ही सीट बाकी थी और महिला के साथ एक बच्चा। कुछ पलों तक सोचने के बाद एनी ने निर्णय लिया कि वह पहले उस महिला और बच्चे को नौका में जाने दे। महिला और बच्चा जीवनरक्षक नौका में बैठकर वहां से दूर निकल गए। एनी टाईटैनिक और अपनी जिंदगी के कम होते पलों को ताकती रही। अचानक ही जोर से कुछ टकराने की आवाज आई, जहाज दो टुकड़ों में विभक्त हो गया और धीरे धीरे समन्दर के गहरे और ठंडे जल में समाने लगा। 15 अप्रेल 1912 को अलसुबह अटलांटिक महासागर के विशाल जल में 1517 लोगों के साथ टाईटैनिक दफन हो गया। सागर में जलमग्न एनी का मृत शरीर नहीं मिल सका।
अपने जीवन की परवाह न कर दूसरों की फिक्र करने वाली एनी की यादें जांजगीर के मिशन कम्पाउंड में बसी हुई हैं। यहां खंडहर होते भवन के बाहरी हिस्से में मिस एनी क्लेमर फंक के नाम का शिलालेख लगा हुआ है। उनकी मौत के बाद यहां एनी सी. फंक मेमोरियल स्कूल सन् 1960 तक संचालित होता रहा। उसके बाद रखरखाव के अभाव में भवन खंडहर में तब्दील होता गया और स्कूल बंद हो गया। खंडहर की दरो-दीवारें भले ही दिन ब दिन टूटकर बिखरकर मिट्टी के आगोश में समा जाएंगी, लेकिन अविस्मरणीय खूबियों वाले टाईटैनिक के साथ-साथ, एनी के त्याग और बलिदान की इतिहास के पन्नों में दर्ज कहानी आसानी से नहीं भुलाई जा सकेगी।
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टाईटैनिक से जुड़ी खास बातें -
0 टाईटैनिक का निर्माण लंदन की व्हाईट स्टार लाईन कंपनी ने कराया था।
0 टाईटैनिक का वजन 52310 टन, कुल लंबाई 882 फीट 9 इंच, ऊंचाई 175 फुट थी।
0 चालक दल व यात्रियों सहित टाईटैनिक की क्षमता 3547 लोगों की थी और जीवनरक्षक नौकाएं 20 थी, जो 1178 यात्रियों की सुरक्षा में उपयोग की जा सकती थीं।
0 टाईटैनिक पर स्वीमिंग पूल, लिफ्ट, जिम, कैफे, पुस्तकालय, सैलून सहित तमाम सुविधाएं मौजूद थीं।
0 31 मार्च 1912 को टाईटैनिक पूरी तरह बनकर तैयार हुआ था और पहली यात्रा 10 अप्रेल को शुरू की, 15 अप्रेल की सुबह उसकी पहली यात्रा, अंतिम यात्रा साबित हुई।
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0 राज्य में इस बार लाएंगे कृषि बजट - डा. रमन सिंह
0 जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं कृषि मेले का समापन
किसान धान, दलहन-तिलहन की फसल के साथ-साथ अपने मवेशियों को विकसित करें तथा दुग्ध सहकारी संघ बनाएं। जमीन हमारे लिये पूजनीय है। हम जमीन की जितनी सेवा करेंगे वह हमें उतना ही लाभ देगी। कृषि कार्यों में रोपाई से पहले जमीन की तैयारी आवश्यक है, जिससे अधिक उपज प्राप्त होगी। हमें अपनी उत्पादकता को निरंतर बढ़ाते रहना आवश्यक है, जिससे हम प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में विकसित राज्यों पंजाब, हरियाणा की बराबरी कर सकें। हमें अपने साधनों का अच्छे से उपयोग करना चाहिये। उन्होंने किसानों को एक फसल से दो फसल तथा दो से तीन फसल लेकर अपनी उत्पादक क्षमता बढ़ानी चाहिए, इस पर काफी ध्यान देने की जरूरत है। पानी खेती के लिये सबसे आवश्यक है तथा इसे प्रदाय करने लिये शासन प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि जांजगीर-चांपा जिले में कृषि के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, किसानों की जागरूकता एवं जिज्ञासा उन्हें प्रगति के पथ पर ले जाएगी। आने वाले समय में भी यह क्षेत्र देश को नई दिशा देगा।
जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं कृषि मेला 2012 के समापन अवसर पर पहुंचे छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए कहा कि यहां पहुंची किसानों की भीड़ से पता चलता है कि क्षेत्र में कृषि को लेकर काफी जागरूकता है। मेले-मड़ई की संस्कृति को सराहते हुए उन्होंने अपने विचार रखे।
समापन अवसर में बतौर कार्यक्रम अध्यक्ष के रूप में शामिल हुए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि इस बार वे राज्य में कृषि बजट लाएंगे, जिसमें किसानों के हितों को ध्यान में रखा जाएगा। धान का प्रति हेक्टेयर उत्पादन क्षमता में वृध्दि के लिए जैविक खाद के प्रयोग, उन्नत यंत्रों का प्रयोग किया जाना जरूरी है। कृषि की उत्पादन लागत कम करने एवं प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दिया जायेगा। गरीबों को 1 रूपए, 2 रूपए किलो चांवल उपलब्ध कराने से लेकर उनके बच्चों को स्कूल जाने के लिए साईकिलें, गरीब बेटियों के विवाह के लिए कन्यादान योजना भी हमारी सरकार ने चलाई है। मुख्यमंत्री डा. सिंह ने कहा कि छत्तीसढ़ में सर्वाधिक धान खरीदी जांजगीर-चांपा जिले में हुई है। यहां का किसान केवल धान ही नहीं, वरन् सब्जी उत्पादन तथा अन्य क्षेत्रों में उन्नत है। पूरे छत्तीसगढ़ में अभी तक 52 लाख मैट्रिक टन धान खरीदा जा चुका है तथा अकेली छत्तीसगढ़ सरकार ही किसान का एक-एक दाना धान खरीद रही है। देश के किसी भी अन्य प्रदेश की सरकार किसान का पूरा धान नहीं खरीद रही है।
उन्होंने किसानों को कृषि के साथ ही उद्यानिकी, मत्स्यपालन, पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन में आगे बढ़ने को प्रेरित किया।
कार्यक्रम की शुरूआत में राज्यपाल शेखर दत्त तथा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पुराना कलेक्टोरेट परिसर में आयोजित विशाल पशुधन एवं कुक्कुट प्रर्दशनी का निरीक्षण किया। उन्होंने पशुपालक किसानों से चर्चा की।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि जिले के प्रभारी मंत्री दयालदास बघेल, कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू, विस उपाध्यक्ष नारायण चंदेल, सांसद कमला पाटले ने भी उपस्थित जनों को संबोधित किया। जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेले के समापन अवसर पर राज्यपाल, मुख्यमंत्री ने जाज्वल्यदेव स्मारिका का विमोचन किया। कार्यक्रम के दौरान भाजपा नेता व्यास कश्यप व जिला पंचायत के उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा ने राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री को खुमरी पहनाकर उनका स्वागत किया। अंत में राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री सहित सभी उपस्थित अतिथियों को शाल, श्रीफल एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया।
0 सड़क दुर्घटनाओं पर चिंता जताई मुख्यमंत्री ने
सड़क दुर्घटनाओं में हर साल के आंकड़े देखें तो आप सब आश्चर्यचकित हो जाएंगे। 10 हजार मौतों में से 70 प्रतिशत दुर्घटनाएं दोपहिया वाहनों से हुई हैं और उसमें भी 16 वर्ष के युवाओं से लेकर 40 वर्ष उम्र तक के लोग काल कवलित हुए हैं। गांवों में अब साईकिलों से अधिक मोटरसायकिलें हो गई हैं। तेज रफ्तार से वाहन चलाने वाले युवा ये भी नहीं सोचते कि उनकी ऐसी लापरवाही से देश, प्रदेश का कितना नुकसान हो रहा है। लोग 50 हजार रूपए का वाहन तो खरीद सकते हैं, पर हजार, बारह सौ रूपए का हेलमेट खरीदने में कोताही करते हैं।
जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव व कृषि एग्रीटेक मेले के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने सड़क दुर्घटनाओं पर चिंता जताते हुए सुरक्षा के उपाय करने की जरूरत बताई। उन्होंने आगे कहा कि राखी के त्योहार में बहनों को अपने भाई से वचन मांगना चाहिए कि वे सड़क पर सुरक्षात्मक तरीके से वाहन चलाएं और सुरक्षा की अनदेखी न करें।
राज्य में पिछले साल से शुरू की गई संजीवनी 108 एम्बुलेंस सेवा की तारीफ करते हुए मुख्यमंत्री डा. सिंह ने कहा कि एक साल में ही संजीवनी एम्बुलेंस में लगभग 600 बच्चों का जन्म हुआ है और हजारों लोगों की जान भी बचाई गई है। मानव जीवन बचाना हम सबका परमधर्म है, आने वाले समय में इस सेवा से राज्य की मृत्यु दर में कमी आएगी।
इन्टरव्यू
कुमार सानू, प्रख्यात गायक।
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0 सिने पार्श्व गायक पद्मश्री कुमार सानू से रतन जैसवानी की बातचीत
जिनकी आवाज में गायकी के मसीहा किशोर कुमार साहब की झलक मिलती है। वह शख्स कुमार सानू हिंदी सिनेमा में आज एक जाना पहचाना नाम हैं। कोलकाता में जन्में कुमार सानू का मूल नाम केदारनाथ भट्टाचार्य है। उनके पिता पशुपति भट्टाचार्य खुद एक अच्छे गायक और संगीतकार थे। उन्होंने ही सानू को गायकी और तबला वादन सिखाया। गायक किशोर दा को अपना आदर्श मानने वाले सानू ने पहले तो उनके गाए हुए गीतों को टी सीरीज कैसेट कंपनी के मालिक गुलषन कुमार की पहल पर अपनी आवाज में गाकर काफी वाहवाही बटोरी, उसके बाद निर्माता, निर्देषक महेश भट्ट की राहुल रॉय व अनु अग्रवाल अभिनीत फिल्म ‘आशिकी‘ के रोमांटिक गानों से एकाएक हिंदी सिनेमा जगत पर छा गए। सन् 2000 में उन्हें ‘हम दिल दे चुके सनम‘ के गीत ‘ आंखों की गुस्ताखियां‘ के लिए अंतर्राष्ट्रीय आईआईएफए अवार्ड भी मिल चुका है। अब तक उन्होंने लगभग 17 हजार गाने हिंदी व बांग्ला फिल्मों में गाए हैं। एक ही दिन में 28 गानों की रिकार्डिंग करने वाले, 2009 में पद्मश्री अवार्ड से नवाजे गए और 5 बार सर्वश्रेष्ठ पुरूष गायक का पुरूस्कार पाने वाले प्रख्यात सिने पार्श्व गायक कुमार सानू ने अपनी जिंदगी के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश इंडस्ट्रीज चांपा के गेस्ट हाउस में रतन जैसवानी से बातचीत की। वे जांजगीर में आयोजित जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव में अपनी प्रस्तुति देने पहुंचे थे।
0 हिंदी फिल्मों में एकाएक किशोर दा जैसी आवाज लोगों के दिलोदिमाग पर छा गई, कैसे हुआ ये सब और आशिकी के पहले कैरियर किस तरह का था ?
00 पारिवारिक माहौल संगीत का था, मां को संगीत में बहुत रूचि थी, बड़ी बहन रेडियो पर गाती थी, पिता शास्त्रीय संगीत के शिक्षक, तो जाहिर है कि मेरे लिए संगीत सीखना बहुत मुश्किल नहीं था, किशोर दा साहब को मैं अपना आदर्श मानता हूं। उन्हीं की गाए हुए काफी गीतों को मैंने टी सीरीज कैसेट के जरिए अपनी आवाज में श्रोताओं तक पहुंचाया। आशिकी के पहले सन् 1989 में जगजीत सिंह साहब ने संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी से मिलवाया और उन्होंने ही मुझे फिल्म ‘जादूगर‘ में गाने का पहला मौका दिया। फिर भट्ट कैंप की फिल्म आशिकी ने मेरे कैरियर को रातोंरात बुलंदी पर पहुंचाया।
0 22 साल के फिल्मी कैरियर की कुछ खास यादें ?
00 दरअसल आशिकी के बाद, साजन, सड़क, फूल और कांटे सहित लगातार कई फिल्मों में गाए गीतों को श्रोताओं का अच्छा प्रतिसाद मिला, लेकिन जिंदगी में दो ऐसे शख्स, जो मेरे लिए मील का पत्थर हैं। एक हैं किशोर दा, जो मेरे गायकी के आदर्श हैं, दूसरे आर. डी. बर्मन साहब, बर्मन दा के लिए मैंने उनकी लयबध्द की हुई आखिरी फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी‘ में कई गीत गाए, लेकिन सबसे खास यह था कि ‘जब मैंने इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा‘ गाया‘ तो बर्मन दा ने मुझे बहुत गालियां दी। मैंने पूछा कि आप मुझे गालियां क्यों दे रहे हैं। तो उनके असिस्टेंट भरतजी ने बताया कि जब बर्मन दा किसी के काम से खुश होते हैं, तो ऐसे ही गालियां देते हैं। जिंदगी का एक सुनहरा मौका मेरे हिस्से में नहीं आया अफसोस मैं किशोर दा से कभी मुलाकात नहीं कर पाया, सचिन देव बर्मन के साथ नहीं गा पाया।
0 आपका एक एलबम आया था ‘नशा‘, उसके बाद क्या हुआ, कुछ और तैयारी है ?
00 अभी तीन नए एलबम पर काम चल रहा है, एक तो संभवतः इसी वेलेंटाईन डे पर रिलीज होगा, उसके बाद दो और एलबम मार्केट में आएंगे। फिलहाल बांग्ला फिल्मों में गाने का दौर चल रहा है।
0 रियलिटी शो के बारे में ......
00 कोई खास नहीं कहना चाहता इस बारे में, रियलिटी शो लोगों को मंच तो दे रहे हैं, लेकिन वर्तमान संगीत के दौर में सुर, ताल, लय खो रही है। रियलिटी शो से कितने लोग गायकी का मकाम हासिल कर पाएंगे, ये बड़ा सवाल है।
0 छत्तीसगढ़ में आपने कई शो किए हैं, कैसा लगता है यहां ?
00 छत्तीसगढ़ में मैंने बिलासपुर, रायपुर में कुछ शो किए हैं, यहां का माहौल काफी अच्छा और सादगीपूर्ण है। मैं भी पड़ोसी राज्य कोलकाता का हूं, तो एक आत्मीयता सी लगती है यहां के माहौल में, बड़ा सुकून मिलता है यहां आकर। मुंबई में कैरियर है, लेकिन शोर-शराबा है, तेज भागती जिंदगी है।
0 वर्तमान में कौन सा संगीतकार आपको प्रभावित कर पाया ?
00 अब तो बहुत से संगीतकार फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। लेकिन ए. आर. रहमान की धुनों में एक अलग सा जादू है। रहमान का काम मुझे प्रभावित करता है।
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बाक्स में
21 बार ‘जैसे‘
सुप्रसिध्द संगीतकार राहुल देव बर्मन के संगीत निर्देशन में बन रही फिल्म 1942 ए लव स्टोरी का सुपरहिट गीत ‘इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा‘ में जैसे शब्द का इस्तेमाल 21 बार हुआ है। बर्मन दा ने कुमार सानू को इस गीत को हिट करने का सुझाव दिया और कहा कि तुम गाने में जैसे शब्द को हर बार अलग अंदाज में गाओगे तो गाना अपने आप ही सुपरहिट हो जाएगा। कुमार सानू ने उनके बताए अनुसार जैसे शब्द को हर बार अलग अंदाज में गाया और गाना सुपरहिट हो गया।
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- 14 जुलाई पुण्यतिथि पर विशेष
रूह में समा जाने वाली कशिश भरी आवाज, जिसे सुनकर मदन मोहन साहब के बारे में जानने की उत्सुकता जाग उठती है। सेना में बंदूक थामने वाले हाथ जाने कब हारमोनियम पर संगीत रचाने लगे, यह पता ही न चला और देश के महान संगीतकारों में से एक मदन मोहन का नाम भी इस क्षेत्र में मील का पत्थर बन गया। 1950 से 1970 तक के तीन दशकों में जिनके गीतों की धूम रही, ऐसे रूहानी संगीत के अनूठे फनकार, गजल के शहजादे का पूरा नाम था मदन मोहन कोहली।
इराक के बगदाद में 25 जून 1924 को रायबहादुर चुन्नीलाल के घर मदन मोहन का जन्म हुआ। पिता रायबहादुर साहब इराकी सेना में एकाउंटेट जनरल थे। भारत आने के बाद रायबहादुर फिल्म व्यवसाय से जुड़ गए और फिल्मीस्तान जैसे मशहूर स्टूडियो में साझीदार बन गए थे। वे फिल्मी दुनिया के मिजाज को समझते थे, इसलिए मदन मोहन को सेना में भर्ती होने के लिए देहरादून भेज दिया। जहां सन् 1943 में वे लेफ्टीनेंट बन गए। सेना में नौकरी करते हुए मदन मोहन का स्थानांतरण दिल्ली हो गया। वहां उनका मन सेना के कार्य में नहीं लगा और संगीत की तरफ खिंचाव होने लगा। तब उन्होंने सेना छोड़कर लखनऊ आकाशवाणी में नौकरी कर ली, जहां सुरों की मलिका सुरैया भी उनके साथ गाती थी।
इसी दौरान उस्ताद अकबर अली खान, उस्ताद फैयाज खान, तलत मेहमूद और बेगम अख्तर जैसे नामी गिरामी फनकारों से उनकी मुलाकात हुई। अपनी विलक्षण संगीत प्रतिभा के दम पर मदन मोहन को ख्यातिलब्ध संगीतकारों सी. रामचंद्र, एस. डी. बर्मन, श्याम सुंदर के साथ सहायक के रूप में काम करने का मौका मिला। उसके बाद पहली बार सन् 1950 में देवेन्द्र गोयल द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आंखें‘ के लिए स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनकर अपनी धुनें दी। नए-नवेले संगीतकार मदनमोहन के साथ उस जमाने के मशहूर गायक मुकेश, मो. रफी, शमशाद बेगम, राज खोसला तो गाने को तैयार हो गए, लेकिन लता मंगेशकर ने इंकार कर दिया। तब ‘मेरी अटरिया पे कागा बोले‘ गीत उन्होंने मीना कपूर से गवाया। यहां से शुरू हुआ संगीत का सफर तो जैसे तीन दशक तक बिना सांस लिए लगातार चलता रहा। उसके बाद लता जी भी उनके संगीत की कायल हो गईं और आपकी नजरों ने समझा, मेरा साया साथ होगा, नैना बरसे, नैनों में बदरा छाए, माई री मैं कासे कहूं, अगर मुझसे मोहब्बत है, खेलो न मेरे दिल से, लग जा गले, न तुम बेवफा हो, वो भूली दास्तां, मैं तो तुम संग नैन मिलाके सहित लगभग 210 गाने मदन मोहन की धुनों पर गाए। तलत महमूद, मुकेश, शमशाद बेगम, मो. रफी, मन्नाडे, आशा भोंसले, गीता दत्त,

किशोर कुमार आदि गायकों के साथ मदन मोहन के संगीत का सफर तीन दशक तक लगातार चलता रहा। लेकिन लता मंगेशकर के साथ तो उनकी संगत जैसे ईश्वर द्वारा नियत की गई कोई रूहानी रचना थी। संगीतकार ओ. पी. नैयर ने कभी लता जी से गाना नहीं गवाया, लेकिन दोनों के बारे में उन्होंने कहा था कि जिस तरह देश को लता दोबारा मिलना मुश्किल है, ठीक उसी तरह मदन जी जैसे संगीतकार भी दोबारा शायद ही मिलें। संगीतकार एस. डी. बर्मन ने कहा था कि जैसा संगीत मदन मोहन ने फिल्म हीर-रांझा में दिया था, वे उसका आधा संगीत भी नहीं दे सकते थे। लता जी उन्हें ‘गजल का शहजादा‘ कहती थीं। हंसते जख्म फिल्म का गीत ‘आज सोचा...तो आंसू भर आए‘ गाते वक्त लता जी रो पड़ी थीं। गीतकार जयदेव ने कहा कि मदन मोहन जैसा संगीतकार दूसरा नहीं हो सकता। मदन जी अति संवेदनशील इंसान थे, एक बार अगर कोई बात उनके दिल पे लग जाती थी तो उसे ताउम्र नहीं भूलते थे। ऐसा ही एक वाक्या सन् 1972 में तब हुआ, जब उनकी संगीत टीम के सितारवादक राईस खान ने अपने एक अन्य दोस्त के यहां दावत में गाने को कहा और यह पूछ लिया कि वहां गाने के कितने पैसे लोगे ? इस बात से मदन मोहन को दिल पर इतनी चोट लगी कि उस दिन के बाद से अपनी मृत्यु होने तक अपने संगीत में सितार का प्रयोग ही बंद कर दिया। चराग दिल का जलाओ, फिर वही शाम, वही गम, मेरी याद में तुम न आंसू बहाना, इक हसीन शाम को, रंग और नूर की बारात, तेरी आंखों के सिवा, हम चल रहे थे जैसे कई सुपरहिट गीतों पर अपनी संगीत रचना देने वाले मदन मोहन के जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आए। यह एक तरह का दुर्भाग्य ही था कि जिन फिल्मों में उन्होंने संगीत दिया, उनमें से अधिकतर बाक्स आफिस पर टिक नहीं सकीं। लेकिन उनके द्वारा रचित संगीत से सजा हर गीत सुनने के बाद लगता है

कि जैसे समां ठहर गया हो। फिल्मी दुनिया के स्वार्थ, खेमेबाजी, गुटबाजी के चक्कर में उन्हें कई बार नुकसान हुआ। जिसके कारण वे शराब के आदी हो गए थे। अंततः 14 जुलाई सन 1975 में लीवर में क्षति के कारण उनकी मौत हो गई। उनके संगीत निर्देशन में बन रही फिल्म मौसम व लैला मजनू उनकी मौत के बाद रिलीज हुई और सन् 2004 में यश चोपड़ा की फिल्म वीर-जारा में मदन मोहन की उन धुनों को लिया गया, जिन्हें वे अपने जीते-जी प्रयोग नहीं कर सके थे। संगीतकार होने के साथ-साथ वे अच्छे गायक भी थे। कुछ गीत जिन पर उन्होंने अपना संगीत तो दिया, लेकिन वे लोगों के सामने नहीं आ पाए। उनमें से एक गीत ‘कैसे कटेगी जिंदगी तेरे बगैर‘ मो. रफी ने गाया था और दूसरा दुर्लभ गीत ‘मेरे अश्कों का गम न कर ऐ दिल‘ लता जी ने गाया था। वैसे इस गीत की रिकार्डिंग उनके प्रशंसकों के पास स्व. मदन मोहन जी की पुरकशिश आवाज में भी सुनने को मिल जाती है। दुनिया से जो दर्द उन्हें मिला, उसकी तड़प इस दुर्लभ, अनछुए गीत से रूह को भी झकझोर देती है।
मेरे अश्कों का गम न कर ऐ दिल, अपनी बरबादियों से डर ऐ दिल,
सिलसिला रोक बीती बातों का, वरना तड़पेगा रात भर ऐ दिल।।

स्व. राहुल देव बर्मन, संगीतकार
जन्मतिथि- 27 जून 1939
जिसके रोने से पंचम सुर निकलता था और पारंपरिक वाद्य यंत्रों से हटकर नए प्रयोगों का केमिकल लोचा जिनके दिमाग में भरा हुआ था। सुमधुर संगीत की रचना में जिनका कोई सानी आज भी नहीं है, संगीत की ऐसी मसीहाई शख्सियत शायद ही दोबारा इस नश्वर संसार में जन्म लेगी। नाम था आर. डी. यानि राहुल देव बर्मन यानि पंचम दा, मां-पिता ने तो उसका नाम राहुल ही रखा था, लेकिन हीरे की पहचान जौहरी ही कर सकता था, अभिनय के क्षेत्र की जानी-मानी शख्सियत दादा मुनि अशोक कुमार ने उनकी असल पहचान की और उन्हें पंचम का उपनाम दिया। उनका कहना था कि रोते वक्त उनके गले से सरगम का पांचवा सुर ‘प‘ निकलता था।
विश्व के श्रेष्ठतम संगीतकारों में से एक और भारतीय संगीत के लिए अलग ही मुकाम बनाने़ वाले राहुल का जन्म 27 जून 1939 में हुआ था। पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। कलकत्ता में बंगाली परिवार में पैदा हुए राहुल देव के संगीत का चरम 70 के दशक में पूरे यौवन पर था और संगीतकार पिता सचिन देव बर्मन के सानिध्य में वाद्य यंत्रों की समझ और उनका प्रयोग करने की ललक पैदा हुई, उस्ताद अकबर अली खां से उन्होंने सरोद बजाने की तालीम ली। उन्होंने कंघी, कांच के गिलास, टेबल, झाड़ू का प्रयोग करके सुमधुर संगीत की रचना कर डाली। आशा भोंसले और रफी साहब का गाया यादगार गीत ‘‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को‘‘जब भी बजता है, तो आर डी के अनूठे प्रयोगों की याद ताजा हो जाती है। पंचम दा को माउथ आर्गन बजाने का बहुत शौक था, देवानंद अभिनीत फिल्म सोलहवां साल के गीत ‘है अपना दिल तो आवारा‘ में उन्हें आर्गन बजाने का मौका मिला तथा ‘दोस्ती‘ फिल्म के यादगार गीतों में संगीत संयोजन कर रहे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए आर डी ने माउथ आर्गन बजाया।

पिता एस. डी. बर्मन की संगीत रचनाओं में सहयोगी के रूप में कैरियर की शुरूआत करते हुए राहुल ने सन् 1957 में गुरूदत्त की फिल्म प्यासा तथा 1958 में गांगुली बंधु यानि अशोक, किशोर व अनूप कुमार अभिनीत ‘चलती का नाम गाड़ी‘ से अपने सफर की शुरूआत की। उसके बाद सन् 1961 में स्वतंत्र रूप से महमूद की फिल्म ‘छोटे नवाब‘ में राहुल ने संगीत दिया। इसके बावजूद वे अपने पिता के संगीत संयोजन में सहयोगी बने रहे। एस. डी. की अंतिम फिल्म आराधना थी, जिसके संगीत को राहुल ने पूरा किया।
पाश्चात्य संगीत का प्रयोग भी भारतीय फिल्मों में उन्होंने ही किया और दम मारो दम, दुनिया में लोगों को, ओ हसीना जुल्फों वाली, दोस्तों से प्यार किया जैसे गीतों पर युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। 70 के दशक में किशोर कुमार की गायकी, राजेश खन्ना के अभिनय और राहुल देव बर्मन के सुमधुर संगीत ने तो जैसे धूम ही मचा दी थी। कहा जाता है कि राजेश खन्ना के कैरियर को उंचाई तक मुकाम देने में पंचम दा के संगीत का बहुत बड़ा हाथ था। शम्मी कपूर अभिनीत तीसरी मंजिल फिल्म में संगीत देने के लिए जब नासिर हुसैन ने राहुल देव बर्मन को चुना, तो शम्मी नाखुश थे, वे शंकर-जयकिशन को बतौर संगीतकार लिए जाने की सिफारिश करते रहे। पर जब तीसरी मंजिल में मोहम्मद रफी तथा आशा भोंसले के गीतों ने देश भर में धूम मचाई, तब शम्मी को अहसास हुआ पंचम दा की अनोखी प्रतिभा का। उनके जीवन का अहम् मुकाम ‘पड़ोसन फिल्म के साथ भी जुड़ा हुआ है। हास्य रस से भरपूर इस फिल्म के गीत आज भी लोग गुनगुनाते हैं, खास कर ‘मेरे सामने वाली खिड़की में‘। जितना दम उनके पाश्चात्य संगीत से सजे गीतों में होता था, उतनी ही कशिश और गंभीरता गुलजार के गीतों पर दी गए धुनों में भी होती थी। आंधी, किनारा, खूशबू, परिचय, इजाजत जैसी फिल्मों का संगीत अलग ही अहसास दिलाता है।

उनका विवाह 1966 में रीता पटेल से हुआ लेकिन मनमौजी आरडी उनसे 5 साल में ही अलग हो गए और सुरों की मलिका आशा भोंसले से 1980 में शादी कर ली। पंचम दा ने आशा ताई के साथ कई गाने भी गाए। 2 फिल्मों अभिनय व 18 फिल्मों में गाने गाने वाले गुणी संगीतकार पंचम दा के कैरियर में आर्थिक तंगी भी आड़े आती रही, पर वे पूरी तन्मयता के साथ संगीत के क्षेत्र में डटे रहे। शोले, यादों की बारात, खेल खेल में, महबूबा, आपकी कसम, किनारा, कारवां, मासूम, बेताब, सागर जैसी फिल्मों में संगीत देकर कई पुरूस्कार जीते और भारतीय संगीत के मसीहा के रूप में स्थापित हो गए। अपने जीवन का अंतिम संगीत उन्होंने फिल्म 1942-ए लव स्टोरी के लिए दिया और फिल्म रिलीज होने से पहले ही वे 4 जनवरी 1994 को दुनिया छोड़ गए। मौसिकी के ऐसे अभूतपूर्व मसीहा राहुल देव बर्मन को मेरा शत् शत् नमन्।

17 जून का इतिहास यानि दो प्रसिध्द नारियों पर चर्चा का दिन, इसलिए कि आज ही के दिन एक ने जंग के मैदान में अपनी मर्दानगी दिखाकर अंग्रेजों के हौसले पस्त कर दिए और मातृभूमि पर कुर्बान हो गई। दूसरी पर किस्मत ही इतनी ज्यादा मेहरबान थी कि उसकी मौत के बाद उसके मजार पर दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत गढ़ी गई। जिसे लोग प्रेम का अनूठा प्रतीक मानते हैं। पर इनमें एक समानता है कि वे दोनों ही मातृत्व सुख नहीं पा सकीं।
पहली नारी मनु यानि खूब लड़ी मर्दानी, झांसी वाली रानी लक्ष्मीबाई की चर्चा आती है, तो नारियों के रौद्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हाथ में तलवार लेकर अंग्रेजों को ललकारती तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। वाराणसी के भदैनी में 19 नवंबर 1828 को मोरोपंत तांबे के घर जन्मी मणिकर्णिका उर्फ मनु का बचपन ही संघर्षों से शुरू हुआ, 4 वर्ष की उम्र में उसकी मां दुनिया छोड़ गए।
पिता मोरोपंत की लाडली छबीली ने कम उम्र में ही अस्त्र शस्त्र थाम लिए, और मराठा सम्राट पेशवा बाजीराव के राज्य की अपनी प्रतिभा के बल पर अलग पहचान बनाई।

सन् 1842 में झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर से परिणय के बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन वह भी चार महीने बाद काल कवलित हो गया। गंगाधर राव का स्वास्थ्य भी खराब रहता था, उन्होंने दामोदर राव को दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया और एक दिन वह भी छोड़ गए दुनिया को। उसके बाद झांसी का राजकाज रानी लक्ष्मीबाई ने सम्हाला। अंग्रेज हिन्दुस्तान को अपनी हड़प नीति के तहत् कब्जाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और खजाने पर कब्जा कर लिया। लेकिन फौलादी इरादों से लबरेज लक्ष्मीबाई आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की फौज भी तैयार की। तात्या टोपे के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए और 17 जून 1858 को अंग्रेजों से लोहा लेते वक्त रानी घायल हो गई तथा ग्वालियर में दम तोड़ दिया। इतिहास के पन्नों में दर्ज रानी लक्ष्मीबाई की मर्दानी छवि आज भी नारी शक्ति का प्रतीक है।
चर्चा अब दूसरी नारी पर यानि ताजमहल की मलिका, शाहजहां की बेगम मुमताज महल की। विश्वप्रसिध्द सबसे खूबसूरत मकबरा तो मुमताज महल की किस्मत में ही लिखा था, जिसे संसार में कोई पार नहीं पाया। जीते जी मुमताज ने यह स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी याद में बना ताजमहल विश्व की अनमोल धरोहरों में से एक होगा। शाहजहां की प्रेमसे लबालब परिकल्पना और मंजे हुए कारीगरों के सिध्दहस्त से निकली कलाकारी ने ताज को जो मशहूरियत दी, उसकी

कोई दूसरी मिसाल अब तक नहीं मिल सकी है। अप्रेल 1593 में मुगल सम्राट जहांगीर की मलिका नूरजहां के भाई अब्दुल हसन असफ खान के यहां जन्मी अर्जुमंद का निकाह शाहजहां से 19 वर्ष की उम्र में हुआ था। अर्जुमंद को शाहजहां ने मुमताज का नाम दिया। वह शाहजहां की तीसरी पत्नी थी, लेकिन खूबसूरत मुमताज मुगल सम्राट की सबसे चहेती बन गई। 17 जून 1631 को बुरहानपुर में बेटी गौहारा बेगम को जन्म देने के बाद मुमताज चल बसी। उसे आगरा में जिस स्थान पर दफनाया गया, उस मजार पर शाहजहां ने संगमरमर से ताजमहल बनवाया। जो आज विश्व प्रसिध्द धरोहर बन चुका है।
शाहजहां के प्रेम का चरम अद्भुत था, जिसकी कल्पना को साकार करने के लिए हजारों हाथी, घोड़े, कारीगर लगाकर वर्षों की मेहनत के बाद एक खूबसूरत ताज बन सका। लेकिन इतिहास में शाहजहां की एक कलंकित करने वाली गलती सदियों तक मानवता के नाम पर लानत बनी रहेगी कि जिन हाथों ने ताज को खूबसूरत शक्ल दी, बादशाह ने उन कारीगरों के हाथ तक कटवा दिए, ताकि कोई दूसरा ताजमहल न बन सके। एक इतिहासकार पी एन ओक ने ‘ताजमहल इज ए आफ हिन्दू टेम्पल पैलेस‘ नामक पुस्तक में 100 से अधिक तर्क दिए हैं कि यहां भगवान शिव का पांचवा रूप अग्रेश्वर महादेव नागेश्वर नाथ विराजित है। हालांकि चर्चा इस विषय से अलग है, इसलिए आगे की बात नारी सशक्तिकरण पर, दुनिया में नारी शक्ति ने समय समय पर अनेक मिसालें कायम की है।
आधुनिक होते भारत में अलग-अलग विधाओं, कलाओं से नारियों ने देश को गौरन्वित किया है, मान बढ़ाया है। लेकिन नारी का प्रतिनिधित्व मुमताज महल और वीरांगना लक्ष्मीबाई ही करती दिखती हैं। लक्ष्मीबाई साहस का, संघर्ष का प्रतीक है और दुनिया के अलग-अलग हिस्से में
साहस के साथ, समाज के बंधनों व मर्यादाओं के बीच, जुल्म सहती, आस्तित्व के लिए जूझ रही नारी किसी न किसी रूप में महारानी लक्ष्मीबाई को आत्मसात करती दिखती है। वहीं दूसरी ओर आधुनिक परिवेश में बदलती संस्कृति के बीच प्रेम की पींगे बढ़ाने वाली युवतियां मुमताज महल जैसी किस्मत पाने को बेचैन दिखती हैं। शाहजहां के प्रेम का अनोखा और खूबसूरत मकबरा ताजमहल देखकर जैसे मन में एक टीस उठती है और हिलारें मारते प्रेम का पावन पाठ पढ़ते हुए अपने प्रेमी से प्रेमिका इठलाती हुई कहती है, तुम मेरे लिए ताजमहल कब बनवाओगे !
14 जून - विश्व रक्तदाता दिवस पर विशेष
छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर की हरी-भरी धरती आए दिन लहू से लाल हो रही है। रोजाना लोग मारे जा रहे हैं, कभी पुलिस जवान, कभी नक्सली, कभी एसपीओ तो कभी भोले-भाले आदिवासी। बड़ा सवाल है कि आखिर ये अंधा युध्द कब खत्म होगा ? ऐसा लग रहा है जैसे अंग्रेजी उपान्यासकार ब्रैम स्टोकर का काल्पनिक पात्र डैकुला बस्तर में अपनी रक्तपिपासु इच्छा के साथ पूरे वेग से वर्चस्व कायम कर रहा है। दुनिया को अमन चैन की जरूरत है न कि नरसंहार की। इसीलिए जब भी धरती से किसी आततायी का अंत होता है तो पूरे विश्व में उस पर तीखी प्रतिक्रिया होती है, लोगों को तसल्ली होती है, दिली सूकुन मिलता है। धरती को लहू से सराबोर करने वालों का अंत कभी अच्छा नहीं रहा है, इतिहास इसका गवाह है। एडोल्फ हिटलर, मुसोलिनी, नेपोलियन बोनापार्ट, सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन लादेन समेत दुनिया में तमाम आततायी हुए हैं, जिन्होंने मानवता को कलंकित किया है, खून की होलियां खेली हैं, इन सबका हश्र दुनिया को पता है।वर्तमान परिवेश में भले ही दुनिया की दूरी लोगों से सिमटकर कम होती जा रही है और विश्व के किसी भी कोने का परिदृश्य चंद मिनटों
में जाना जा सकता है। आधुनिक होते युग में बस्तर का नक्सलवाद भले ही अत्याधुनिक हथियारों के बल पर जवानों का खून बहाता रहे, एंटी लैंडमाइन गाड़ियों को ध्वस्त कर अपनी सफलता पर खुश होता रहे या फिर पुलिस और फौजी जवान नक्सलियों को मारकर फक्र महसूस करते रहें। लेकिन सच तो यही है कि ऐसे अंधे युध्द से न तो मानव जाति का भला हो सकता है और न ही किसी तरह का कोई विकास हो सकता है। दुनिया में मानववाद के लिए तमाम प्रयोग हुए हैं और कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। जिस रक्त की एक बूंद का महत्व अधिकतर लोग अब तक नहीं समझ पाए है, उसके लिए सैकड़ों वर्षों से वैज्ञानिकों ने कितना परिश्रम किया है। यह जानकर हैरानी होगी कि लगभग 500 वर्षों की मेहनत के बाद आज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह सफलता मिल सकी है कि किसी भी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का खून सुरक्षित तरीके से आधान कर उसकी जान बचाई जा सकती है। यदि एक व्यक्ति अपने शरीर का अनमोल रक्त देकर दूसरे की जिंदगी बचाता है तो ऐसा कार्य महादान की श्रेणी में आता है। रक्तदान और आधान के संबंध में जो जानकारियां अब तक सामने आई हैं वे कम दिलचस्प नहीं हैं। रक्ताधान के संबंध में 17 वीं शताब्दी के इतिहास लेखक स्टीफैनो इन्फेसुरा ने प्रथम ऐतिहासिक प्रयास का सर्वप्रथम वर्णन करते हुए लिखा है कि सन् 1492 में जब पोप इन्नोसेंट गहन मूर्छा (कोमा) में चले गए,
तो एक चिकित्सक के सुझाव पर जीवन के अंतिम क्षणों में पोप (बिशप) के शरीर में तीन लड़कों का रक्त डाला गया (मुख से, क्योंकि परिसंचरण की अवधारणा एवं अंतःशिरा प्रवेश की विधियां उस समय अस्तित्व में नहीं थी)। लड़के दस वर्ष की उम्र के थे, और उनमें से प्रत्येक को एक सोने के सिक्के देने का वचन दिया गया था. हालांकि पोप नहीं बच सके। कुछ लेखकों ने इन्फेसुरा पर पोपवाद का विरोधी होने का आरोप लगाते हुए उसके विवरण को सही नहीं माना।
रक्ताधान संबंधी परिष्कृत अनुसंधान 17 वीं सदी में शुरू हुआ, जिसमें पशुओं के बीच रक्ताधान संबंधी सफल प्रयोग हुए। लेकिन मनुष्यों पर किए जाने वाले क्रमिक प्रयासों का परिणाम घातक बना रहा। सर्वप्रथम पूर्ण रूप से दस्तावेजीकृत मानव रक्ताधान फ्रांस के सम्राट लुई के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. जीन बैप्टिस्ट डेनिस द्वारा जून 15, 1967 में किया गया। उन्होंने एक भेड़ का रक्ताधान एक 15 वर्ष के लड़के में किया, जो रक्ताधान के बाद जीवित बच गया। डेनिस ने एक मजदूर का भी रक्ताधान किया और वह भी जीवित बच गया। दोनों उदाहरण संभवत रक्त की छोटी मात्रा के कारण थे जिसका वास्तव में इन लोगों में रक्ताधान किया गया था. इसने उन्हें ऐलर्जी संबंधी प्रतिक्रिया का सामना करने की अनुमति प्रदान की. रक्ताधान से गुजरने वाला डेनिस का तीसरा मरीज स्वीडिश व्यापारी बैरन बॉन्ड था. उन्होंने दो आधान प्राप्त किए. दूसरे आधान के बाद बॉन्ड की मृत्यु हो गई। पशु रक्त के साथ डेनिस के प्रयोगों ने फ्रांस में एक गर्म विवाद छेड़ दिया, अंततः 1670 में इस प्रक्रिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सही समय पर, ब्रिटिश संसद और यहां तक कि पोप ने भी यही किया. रक्ताधान अगले 150 वर्षों के लिए गुमनामी में चला गया।
रक्त आधान का विज्ञान 19 वीं सदी के प्रथम दशक के समय तक पुराना है जब भिन्न रक्त प्रकारों के परिणामस्वरूप आधान के पूर्व रक्त दाता एवं रक्त प्राप्तकर्ता के कुछ रक्त मिश्रित करने की परिपाटी शुरू हुई।
1818 में, ब्रिटिश प्रसूति-विशेषज्ञ, डॉ. जेम्स ब्लूनडेल ने प्रसवोत्तर रक्तस्राव का उपचार करने के लिए मानव रक्त का प्रथम सफल रक्ताधान संपादित किया. उन्होंने मरीज के पति का दाता के रूप में उपयोग किया, और उसकी पत्नी में आधान करने के
लिए उसकी बांह से चार औंस रक्त निकाला। वर्ष 1825 और 1830 के दौरान डॉ. ब्लून्डेल ने 10 आधान संपादित किए, जिनमें से पांच लाभप्रद रहे, और उन्होंने उनका परिणाम प्रकाशित किया. उन्होंने रक्त के आधान के लिए कई उपकरणों का भी आविष्कार किया. अपने प्रयास से उन्होंने बहुत अधिक मात्रा में रूपया अर्जित किया, जो लगभग 50 मिलियन (1827 में लगभग 2 मिलियन) वास्तविक डॉलर (मुद्रास्फीति के लिए समायोजित) था।
1840 में सेंट जार्ज मेडिकल स्कूल लंदन में डॉ. ब्लून्डेल की सहायता से सैमुएल आर्मस्ट्रांग लेन ने प्रथम संपूर्ण रक्ताधान संपादित किया। रक्त संबंधी प्रयोगों के लिए जॉर्ज वॉशिंगटन क्राइल को क्लीवलैंड क्लिनिक में सीधे रक्ताधान का उपयोग कर शल्य-चिकित्सा संपादित करने का श्रेय दिया जाता है। सन् 1901 तक कई रोगियों की मृत्यु हो चुकी थी, जब ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिक डा. कार्ल लैंडस्टेनर ने मानव रक्त समूहों की खोज की, जिससे रक्ताधान सुरक्षित हो गया। दो व्यक्तियों के रक्त का मिश्रण रक्त का एकत्रीकरण या संलग्नता उत्पन्न कर

सकता है, एकत्रित लाल कोशिकाओं में दरार पड़ सकती है और वे विषाक्त प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर सकती हैं जिनके घातक परिणाम हो सकते हैं। कार्ल लैंडस्टेनर ने देखा कि रक्त का एकत्रीकरण एक रोगक्षमता संबंधी प्रक्रिया है जो उस समय उत्पन्न होता है जब रक्ताधान के प्राप्तकर्ता में दाता रक्त कोशिकाओं के विरुद्ध रोग-प्रतिकारक (ए,बी, ए एवं बी दोनों, या कोई भी नहीं) होते हैं. कार्ल लैंडस्टेनर के कार्य ने रक्त समूहों (ए, बी, एबी, ओ) के निर्धारण को संभव बना दिया एवं इस प्रकार सुरक्षित रूप से रक्ताधान क्रियान्वित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इस खोज के लिए उन्हें 1930 में शरीर विज्ञान एवं चिकित्सा के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हीं की याद में विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है।
1930 के अंतिम दशक एवं 1940 के दशक के आरंभ में, डॉ. चार्ल्स आर. ड्रियू के अनुसंधान ने इस खोज को जन्म दिया कि रक्त को रक्त प्लाज्मा एवं लाल रक्त कोशिकाओं में विभाजित किया जा सकता है एवं प्लाज्मा को अलग से जमाया जा सकता है। इस तरह से जमाया गया रक्त अधिक लंबे समय तक कायम रहा एवं उसके दूषित हो जाने की संभावना काफी कम थी।
1939-40 में एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली, जब डा. कार्ल लैंडस्टेनर, एलेक्स वीनर, फिलिप लेविन, एवं आर.ई. स्टेटसन ने रीसस रक्त समूह प्रणाली की खोज की, जिसे उस समय तक आधान संबंधी बहुसंख्यक प्रतिक्रियाओं का कारण माना गया। तीन साल बाद, जे.एफ. लूटिट एवं पैट्रिक एल. मॉलिसन के द्वारा स्कन्दनरोधी की मात्रा को कम करने वाले एसिड- साइट्रेट-डेक्स्ट्रोज (एसीडी) के घोल के व्यवहार ने अधिक परिमाण में रक्ताधान एवं दीर्घावधि तक भंडारण की अनुमति प्रदान की।
कार्ल वाल्टर और डब्ल्यू. पी. मर्फी जूनियर ने 1950 में रक्त संग्रह के लिए प्लास्टिक बैग के व्यवहार की शुरूआत की. भंगुर कांच के बोतलों की जगह टिकाऊ प्लास्टिक बैग के व्यवहार ने खून की एक संपूर्ण यूनिट से बहु रक्त अवयव की सुरक्षित एवं सरल तैयारी के लिए सक्षम एक संग्रह प्रणाली के विकास की अनुमति प्रदान की। इस तरह दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने मानव जाति को जीवन देने संबंधी रक्तदान पर अपना योगदान दिया है। मेरा स्वयं का अनुभव रहा है कि अपने सगे संबंधियों परिचितों को रक्तदान करने से कई लोग परहेज करते हैं। शहरी क्षेत्रों में तो कई संस्थाएं ऐसे कार्यों में लगी होती हैं, जिससे आसानी से खून उपलब्ध हो जाता है। लेकिन ग्रामीण तथा कस्बाई क्षेत्रों में जागरूकता के अभाव में यह समस्या अब भी बरकरार है। डाक्टरों के अनुसार एक बार रक्तदान करने के बाद तीन महीने तक दोबारा रक्त नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन कुछ लोग मजबूरी के चलते या फिर नशे से पीड़ित अपना शौक पूरा करने के लिए खून बेच देते हैं। लहू चाहे बस्तर में बहे या भारत-पाकिस्तान की सरहद पर या फिर विश्व के किसी भी हिस्से में, उसे किसी भी तरह से सही नहीं माना जा सकता। मानवता के लिए विश्व को शांति की जरूरत है न कि अंधे युध्द की। ऐसे में किसी का रक्त बहाने से ज्यादा जरूरी है जीवन देना। इसलिए रक्तपिपासा छोड़कर रक्तदाता बनना बेहतर है। इसीलिए तो कहा गया है कि
जीना तो है उसी का, जिसने ये राज जाना,
है काम आदमी का, औरों के काम आना।
विश्व भर में हवाई मौतों का सिलसिला खतरनाक हो चला है। आए दिन आसमानों की उड़ान भरने वाले विमान, हैलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त होते रहते हैं। ऐसे हादसों में लोगों का बचना नामुमकिन होता है। हवा में उड़ती मौतों ने अब तक हजारों जानें ली हैं। एक मामूली सी लापरवाही कई जिंदगियों को लील लेती है। हवाई सेवाओं के खतरों से लोग अनजान नहीं हैं। पहले भी ऐसी वारदातें हुई हैं, जिन्होंने मानव मन को झकझोरा है। ग्वालियर राजघराने के माधवराव सिंधिया, आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत हैलीकाप्टर हादसे से हुई थी। अब अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू भी इस हवाई मौत के शिकार हो गए।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि शिल्पराज विश्वकर्मा देव ने ब्रह्मा के लिए एक पुष्पक नाम के विमान का निर्माण किया था। जो इच्छा अनुसार छोटा या बड़ा किया जा सकता था और आदेश मात्र से ही वह स्वामी की आज्ञा का पालन करता था। कलयुग में वैज्ञानिकों ने विमान और हैलीकाप्टर का अविष्कार किया, जिससे विदेशों में आवागमन के साधन हो सकें और यह धनाढ्य वर्ग, नेताओं, मंत्रियों को कहीं दूर दराज तक कम समय में पहुंचाने का बेहतरीन उपाय भी था। लेकिन समय-समय पर इन विमानों और हैलीकाप्टरों से हुए हादसों ने हजारों लोगों की जानें भी ली हैं। विमानों से हुए कुछ बड़े हादसे इस प्रकार हैं, 1 जनवरी 1978 को अरब सागर में गिरे एयर इंडिया विमान से 213 लोगों की मौत, 19 अक्टूबर 1988 को अहमदाबाद में विमान हादसे से 124 मौतें, 14 फरवरी 1990 में बैंगलोर विमान हादसे में 92 मौतें, 16 अगस्त 1991 को इंफाल विमान हादसे में 69 मौतें, 26 अप्रेल 1993 में औरंगाबाद में हुए हादसे में 55 मौतें, 17 जुलाई 2000 में पटना हवाई अड्डे पर विमान हादसे से 60 मौतें हुई हैं। इसी तरह पिछले वर्ष मैंगलोर हवाई अड्डे पर एक बड़े विमान हादसे में 158 लोगों की मौत हो गई थी।
इसी तरह छत्तीसगढ़ सरकार का हैलीकाप्टर मैना सन् 2007 में लापता हो गया था, कई महीनों तक तलाश के बाद उसका मलबा मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में मिला था और उसमें सवार 4 लोगों की मौत हो चुकी थी। सन 2009 में आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी का हैलीकाप्टर भी लापता हो गया था और कई दिनों की तलाश के बाद हैलीकाप्टर का मलबा मिला था। 5 दिन पूर्व अरूणाचल के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू का विमान भी इसी तरह लापता हो गया था। अब जाकर उसका मलबा मिला है और उनकी मौत हो चुकी है। सवाल यह है कि आखिर हवाई सेवाओं के खतरों से लोग इतने लापरवाह क्यों हैं ? मौसम की खराबी से , पायलट की लापरवाही से, हवाई अड्डों पर विमान उतारते समय हादसे होते रहे हैं। यह तो तय है कि हवाई दुर्घटना में जितना भयानक विध्वंस होता है, उससे किसी का बच पाना नामुमकिन होता है। भौतिकवादी युग में पुष्पक की तरह का विमान बनाया नहीं जा सकता। मशीनी युग के विमानों ने जितनी ज्यादा उपलब्धियां हासिल की हैं, उससे ज्यादा गहरे जख्म भी दिए हैं। आधुनिक परिवेश के इन पुष्पक विमानों से आखिर किस तरह खतरे कम हो पाएंगे ? क्या ऐसे उपाय नहीं किए जा सकते कि हवाई सेवाओं से होने वाले खतरों को टाला जा सके। हमारा मानना तो यह भी है कि मानव चाहे जितनी तरक्की कर ले, प्रकृति से जीत नहीं सकता। क्योंकि प्रकृति से बड़ा कोई भगवान नहीं है।
जिंदगी में सफल होने के लिए दो चीजों की काफी जरूरत है, हिम्मत और मेहनत। हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, मेहनत करने वाले कभी विफल नहीं होते। दुनिया की संरचना में भी मेहनत करने वाले श्रमवीरों ने समय-समय पर नए इतिहास रचे हैं। अपना पसीना बहाकर आसमान छूती इमारतों को खड़ा करने वाले आज भी जमीन पर हैं और बुलंद इमारतों के उपर खड़ा धनाढ्य वर्ग मुस्कुराता हुआ इठला रहा है।
आज जिस खूबसूरत इमारत ताजमहल को देखने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। इस अजूबे को देखकर रोमांच सा महसूस करते हैं, शाहजहां को याद करते हैं, मुमताज की कहानियां कहते हैं, इसे प्यार का प्रतीक बताते हैं, पर उन श्रमवीरों को भूल जाते हैं, जिनकी कारीगरी का कोई सानी नहीं था। इतना सुंदर ताजमहल खड़ा करने के एवज में उन्हें क्या मिला ? बादशाह ने उनके हाथ कटवा दिए। इसलिए कि वे कोई दूसरा ताजमहल न बना सकें। क्या उनकी कारीगरी का यही वाजिब इनाम था ?
श्रमिकों का शोषण तो हर सदी में होता रहा है। मुगल काल में भी मजदूर वर्ग गुलाम की तरह थे। अंग्रेज भारत में आए तो यहां के लोगों को मजदूर से अधिक नहीं समझते थे। कोई भी मेहनत का काम वे भारतीयों से ही कराते थे। मजदूरों पर अत्याचार का सिलसिला आजाद भारत में भी खत्म नहीं हुआ और अब जब देश में कई यूनियन बन गए तब भी मजदूर वहीं का वहीं है। मजदूरों के हित में बने संगठन उनका कितना भला करते हैं, यह कहने को बाकी नहीं रहा। कुछेक मामले अपवाद हो सकते हैं, पर अधिकतर मामलों में मजदूर को उनका हक नहीं मिल पाता। छत्तीसगढ़ के मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के समय में एक क्रांति शुरू हुई थी मजदूरों को वाजिब हक दिलाने की। नियोगी की तर्कशक्ति और आक्रोश के आगे अच्छे-भले उद्योगपति ठहर नहीं पाते थे। लेकिन शोषक वर्ग की आंख का कांटा बन चुके नियोगी को मौत की नींद सुला दिया गया। यह दुनिया का दस्तूर ही है कि जो संघर्ष के लिए आगे आएगा, उसे तमाम समस्याएं झेलनी तो पड़ेंगी ही। मजदूरों के लिए सरकारों ने कई तरह के नियम-कानून बनाए हैं ताकि उन्हें उनके हक की कमाई मिलनी सके। लेकिन राजनीति की शह पर पलती नौकरशाही और उद्योगपतियों की मिलीजुली साजिशों ने श्रमवीरों के पसीने का पूरा हक नहीं मिलने दिया है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में पलायन की समस्या अब भी बरकरार है। सवाल यह उठता है कि जब सरकारें मजदूरों के लिए कई काम प्रदेश में ही उपलब्ध करा रही है, तो आखिर पलायन क्यों ? अपने बीवी बच्चों को लेकर दूसरे प्रदेशों में जाने वाले मजदूर वर्ग कई बार ठेकेदारों और दबंगों के चंगुल में फंस जाते हैं। उसके बाद तो न उनका परिवार सुरक्षित रह पाता है और न ही उसकी मेहनत की कमाई उसे मिल पाती है। आए दिन प्रशासन के पास बंधुआ मजदूरों के मामले आते रहते हैं। मजदूर की मजबूरी का फायदा उठाने
वालों को सोचना चाहिए कि आखिर उसकी मेहनत और कारीगरी से ही हम एक अदद घर-मकान में रहने का सुख हासिल कर पाते हैं। आखिर किसने धरती पर खड़ी इमारतों को विशाल और बुलंद बनाया, दुनिया में मिली सुख-सुविधाओं के लिए किसने पसीना बहाया, यह गंभीर सोच का विषय है। मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसके हक की कमाई मिल जानी चाहिए। लेकिन मजदूरों का खून चूस चूस कर एयर कंडीशनर कमरों में बैठने वाले, महंगी
लग्जरी गाड़ियों में घूमने वाले, मजदूरों को हेय दृष्टि से देखने वाले यह तक नहीं सोचते कि दुनिया में मजदूर न होते तो यह विश्व कैसा दिखता, कैसा लगता ? मजदूर, कालका, मजदूर जिन्दाबाद, कुली, काला पत्थर, इंसाफ की आवाज जैसी कई फिल्मों में मजदूर वर्ग के साथ हो रहे शोषण को दिखाया गया है। ऐसे मौके पर दिलीप कुमार अभिनीत मजदूर फिल्म का यह गीत भारत के एक मजदूर की आकांक्षा को चिन्हांकित करता है।
हम मेहनतकश इस दुनिया से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे
इक बाग नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।
आने वाले दिनों में मजदूरों की जीवनशैली बदलेगी, उनके हक की कमाई मिलेगी या फिर शोषक वर्ग मजदूरों की मेहनत और पसीने की कमाई पर साजिशें रचकर, उनका हक मारकर ऐसे ही इठलाता रहेगा, यह अंत्यंत सोचनीय है ।
कितना औद्योगिकरण जरूरी है ?
उद्योगों की चिमनियों से निकलता काला-सफेद धुआं, सरकारी जमीनों पर कब्जा करती राख, कम होती कृषि भूमि और जनता का विरोध, इन उद्योगों के लगने से देश, प्रदेश, शहर, गांव का विकास होगा, या फिर लोगों के हि
स्से में आएगा धूल, धुआं और राख, बढ़ेगा तापमान, तो गर्मी से कैसे निजात पाएंगे लोग, धान का कटोरा बन जाएगा का राख का कटोरा, इसलिए ऐसे औद्योगीकरण के पहले ग्लोबल वार्मिंग पर विचार करना भी जरूरी है। पर्यावरण के सौदागर भूल चुके हैं कि जो हम प्रकृति को देंगे, उसके बदले में हमें भी वैसा फल मिलेगा।जिले में विद्युत संयंत्र लगाने के लिए सरकार ने उद्योगपतियों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। 34 पावर प्लांट लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने देश भर की नामी कंपनियों केएसके महानदी, वीडियोकान, मोजरबेयर, डी. बी. पावर, कर्नाटका पावर, श्याम सेंचुरी आदि से एमओयू हस्ताक्षरित किए हैं। 70 प्रतिशत से अधिक सिंचाई और कृषि प्रधान जिले में इतनी बड़ी संख्या में पावर प्लांट लगाए जाने से होने वाले नुकसान की फिक्र यहां की आम जनता को ही नहीं, जनप्रतिनिधियों को सता रही है। उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण से जिले की कृषि भूमि का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। पावर प्लांट प्रबंधन, जमीन दलालों, अधिकारियों और नेताओं की चौकड़ी की कुटिल रणनीति में फंसकर किसान अपनी दो फसली जमीन बेच रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में उद्योगों के लिए अनुमति दिए जाने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं, जैसे कि इन उद्योगों के लिए पानी कहां से आएगा, उद्योगों से निकलने वाले धुएं से लोगों के स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ेगा, तापमान बढ़ेगा, भारी वाहनों के आवागमन से दुर्घटनाएं बढ़ेंगी और सबसे अहम् सवाल है कि इन उद्योगों से निकलने वाली राख आखिर कहां जाएगी ?
जिले की तस्वीर भले ही औद्योगिक विकास से सुधर जाए लेकिन तकदीर आने वाले दिनों में बिलकुल भी अच्छी नहीं होगी। 70 प्रतिशत से अधिक खेती के लिए सिंचित जांजगीर-चांपा जिले के लिए सरकार ने 34 से अधिक पावर प्लांट के लिए एमओयू किया है। जिसके बाद आम जनता के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। जनसुनवाई में उद्योगों के खिलाफ जनता का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। आम जनता के अलावा जनप्रतिनिधि भी सरकार के इस कदम से खुश नहीं हैं। लेकिन वे सरकार का खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं।
सरकारी जमीनों पर उद्योगों से निकलती राख फेंकी जा रही है, उद्योग प्रबंधनों की मनमानी इत
नी बढ़ गई है कि बिना अनुमति लिए ही नेशनल हाईवे के किनारे, नालों में और सरकारी भूमि पर राख फेंकी जा रही है। इस मामले में प्रशासन तो जैसे उद्योगों की हाथों की कठपुतली बन गया है। जिस तरह जांजगीर-चांपा जिले में पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं, वह उचित नहीं है, आने वाले दिनों में इससे कई तरह के नुकसान होंगे, लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा, उद्योगों में नौकरी नहीं मिलने पर पलायन होगा और कृषि भूमि भी कम होती जाएगी। सबसे बड़ी समस्या होगी तापमान की, प्रदेश में सबसे ज्यादा तापमान इसी जिले मंे होता है, उद्योग लगने के बाद गर्मी बढ़ेगी तो लोगों का जीना हराम हो जाएगा। कोरबा में उद्योग लगने के पहले वहां का तापमान 5 डिग्री कम था, आज जाकर वहां की स्थिति देख सकते हैं।जिले में अब तक पांच बड़े उद्योग स्थापित हैं और 7 उद्योगों के लिए जनसुनवाई हो चुकी है। स्थापित हो चुके उद्योगों से आसपास के इलाके के ग्रामीण खासे परेशान हैं, चिमनियों से निकलता काला धुआं लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन के अधिकारियों के सामने इसकी शिकायत भी की है, लेकिन उद्योगों के हाथों की कठपुतली बन चुके अधिकारी इस मामले पर कोई पहल नहीं करते। प्रदूषण रोकने के लिए उद्योगों में लगाए गए ईएसपी संयंत्र बिजली बिल बचाने के चक्कर में बंद रखे जाते हैं, जिसकी वजह से धुआं आसपास के पंद्रह किलोमीटर क्षेत्र को प्रभावित करता है। उद्योग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, ग्रीन बेल्ट की स्थापना नहीं की जा रही है, जिससे लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। विधायकों द्वारा विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया गया है। लेकिन सरकार र्प्यावरण और प्रदूषण पर गंभीर नहीं है।
कुल मिलाकर इतने सारे उद्योगों के पक्ष में न तो आम जनता है और न ही अधिकतर जनप्रतिनिधि, फिर भी कृषि प्रधान जिले में इतने अधिक उद्योग लगाए जाने के नुकसान के बारे में सोचा नहीं जा रहा है। उद्योगों के बढ़़ने से जिले का विकास तो होगा, लेकिन इनसे निकलने वाली राख, धूल, धुआं और गर्मी आम जनता के हिस्से में ही आएगा, आने वाले दिनों में धान का कटोरा कहलाने वाला यह जिला और प्रदेश राख के कटोरे में तब्दील हो जाएगा। यह समझने की जरूरत है कि ऐसे औद्योगिकरण से जिले का विकास होगा या विनाश ? ग्लोबल वार्मिंग को लेकर पूरे विश्व में चिंता की जा रही है। लेकिन औद्योगिक प्रदूषण पर सरकारें लगाम नहीं लगा पा रही हैं। प्रकृति को दिए जा रहे जख्मों का बदला समय समय पर मानव समाज को मिल रहा है। जापान में हुई तबाही इसका ज्वलंत उदाहरण है। प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले भविष्य में क्या इसके विध्वंस से जनजीवन को बचा पाएंगे ? सिकंदर जब इस दुनिया से गया था तो उसके दोनों हाथ कफन के बाहर निकाले गए थे ताकि दुनिया को सबक मिल सके कि जो दुनिया से जाता है वह अपने साथ कुछ भी नहीं ले जाता। इस पाठ को वे लोग भूल चुके हैं, जिन्हें हर काम में लक्ष्मी प्राप्ति अहम् लगती है। क्या ऐसे लोग अपने साथ कफन में छुपाकर कुछ ले जा पाएंगे ?
0 बुजुर्ग ग्रामीण ने मुख्यमंत्री से कहा
0 कोसमंदा में उतरा मुख्यमंत्री का उड़नखटोला
मुख्यमंत्री डॉं. रमनसिंह जब कोसमंदा गांव पहुंचे तो एक बुजुर्ग ग्रामीण को भीड़
में जद्दोजहद करते देखकर उन्होंने अपने पास बुला लिया और पूछा - राम राम बबा, कईसे आए हस, कुछु समस्या हे का। तब बुजुर्ग ने मुख्यमंत्री को जवाब दिया - नईं साहेब, तूंहर दरसन करे आए हवं। ग्रामीण की भावना से मुख्यमंत्री डा. सिंह काफी द्रवित हो गए, उसके बाद गांव की कई समस्याओं का निराकरण करने की लिए सौगातों की झड़ी लगा दी। मुख्यमंत्री ने गांव के युवकों की किक्रेट टीम को सामान खरीदने के लिए 10 हजार रूपए अनुदान देने की घोषणा भी की।
में जद्दोजहद करते देखकर उन्होंने अपने पास बुला लिया और पूछा - राम राम बबा, कईसे आए हस, कुछु समस्या हे का। तब बुजुर्ग ने मुख्यमंत्री को जवाब दिया - नईं साहेब, तूंहर दरसन करे आए हवं। ग्रामीण की भावना से मुख्यमंत्री डा. सिंह काफी द्रवित हो गए, उसके बाद गांव की कई समस्याओं का निराकरण करने की लिए सौगातों की झड़ी लगा दी। मुख्यमंत्री ने गांव के युवकों की किक्रेट टीम को सामान खरीदने के लिए 10 हजार रूपए अनुदान देने की घोषणा भी की।ग्राम सुराज अभियान के तहत चौथे दिन सवेरे राजधानी से हेलीकाप्टर द्वारा रवाना होकर सबसे पहले अचानक जांजगीर-चांपा जिले के विकासखण्ड डभरा के ग्राम कोसमंदा पहुंचे। मुख्यमंत्री ने गांव में चौपाल शैली में ग्रामीणों के साथ बैठकर स्थानीय समस्याओं और जरूरतों के बारे में लोगों से पूछताछ की। डॉं. सिंह ने कोसमंदा में ग्रामीणों की वर्षो पुरानी मांग को पल भर में स्वीकृति देते हुए वहां सिंचाई सुविधा के लिए नहर निर्माण कराने का ऐलान किया। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री की इस घोषणा का स्वागत् किया। किसानों का कहना था कि नहर बन जाने पर संपूर्ण कोसमंदा गांव व आसपास के गांवों में पर्याप्त सिंचाई हो सकेगी, इससे वहां हर मौसम में खेती हो सकेगी। मुख्यमंत्री ने सपोस से कोसमंदा नहर निर्माण हेतु ग्रामीणों की सहमति प्राप्त कर नहर निर्माण की कार्यवाही करने के निर्देश दिये।
मुख्यमंत्री ने ग्राम कोसमंदा तथा बगरैल में मंगल भवन निर्माण की मांग भी तुरंत पूरी कर दी। उन्होंने वहां सपोस से कोसमंदा और बगरैल तक 25 कि.मी.डब्ल्यू.बी.एम. सड़क निर्माण करने के निर्देश दिये जिसे बाद में मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना में शामिल करने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री ने कोसमंदा एवं बगरैल में सीमेंट कांक्रीट सड़क बनवाने की घोषणा की। उन्होने कोसमंदा में तालाब गहरीकरण कार्य कराने कहा। मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने ग्रामीणों की मांग पर कोसमंदा में एक अतिरिक्त ट्रांसफार्मर लगाने तथा पानी टंकी का निर्माण करने के निर्देश भी दिये। डॉं. सिंह ने ग्रामीणों की मांग पर गाड़ापाली में अतिरिक्त नल कूप खनन एवं पम्प लगाने के भी निर्देश दिये। डॉं. सिंह ने ग्रामीणों को ग्राम सुराज अभियान के उद्देश्यों की भी जानकारी दी। उन्होने ने ग्रामीणों की अन्य समस्याओं के निराकरण हेतु अधिकारियों को गॉंव में शिविर लगाने के निर्देश दिये। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार ग्राम कोसमंदा में 24 अप्रैल 2011 को शिविर लगाया जायेगा जिसमें विभागीय अधिकारी उपस्थित रहकर ग्रामीणों की समस्याओं का निराकरण करेगें। इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों सहित जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।
0 जलस्तर में लगातार गिरावट
0 10 वर्षों बाद उपजेगा घोर जल संकट
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने जांजगीर-चांपा जिले में 34 पावर कंपनियों से 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए एमओयू करके आम जनता के भविष्य को संकट में डाल दिया है। 40 हजार मेगावाट के विद्युत उत्पादन के लिए प्रतिवर्ष 16000 लाख घनमीटर पानी की जरूरत होगी, समझा जा सकता है कि इतनी बड़ी मात्रा में जब उद्योगों को पानी दिया जाएगा, तो आम जनता के लिए पानी कहां से आएगा ? सबसे खास बात यह है कि हर साल गर्मी के मौसम में इस जिले के जलस्तर में खासी गिरावट आ जाती है, तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे हालात में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जीवनदायिनी बनी नदियों का पानी सरकार ने उद्योगों को देने का फैसला कर भविष्य के लिए परेशानी पैदा कर दी है।
प्रदेश में सत्तासीन भाजपा सरकार ने उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से अपने हाथ खोल रखे हैं। देश की जानी मानी कंपनियां वीडियोकान, मोजरबेयर, केएसके महानदी, कर्नाटका पावर, एस्सार पावर आदि प्रदेश में अरबों-खरबों रूपए का निवेश बिजली उत्पादन के क्षेत्र में करने जा रही हैं। सरकार की इस सोच को हर कोई सराह सकता है कि उद्योगों से होने वाले विकास से आम जनता की आर्थिक परेशानियां कम होंगे, रोजगार के अवसर बढ़ेगे, अच्छी सड़कें बनेंगी, पढ़ाई का स्तर उंचा होगा और लोगों की बेरोजगारी खत्म होगी, लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरे पहलू पर गौर करें तो विकास के साथ साथ एक तरह का विनाश भी समानांतर चलता है। उद्योगों से होने वाले विनाश को देखें तो पता चलता है कि जहां जहां उद्योग लग रहे हैं, उन क्षेत्रों में सड़क दुर्घटनाओं में इजाफा हो रहा है, अपराध बढ़ रहे हैं, संयंत्र से निकलने वाले प्रदूषण से आम जनजीवन काफी प्रभावित होता है। संयंत्र से निकलने वाली राख का क्या वाजिब उपयोग होगा, इस बारे में कोई ठोस रणनीति सरकार नहीं बना सकी है, वहीं संयंत्रों की मशीनें चलने से तापमान भी बढ़ेगा। संयंत्रों की सुविधा के लिए राखड़ बांध बना दिए जाते हैं, जिससे हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि बेकार चली जाती है। हाल ही में पता चला है कि बिलासपुर जिले के सीपत में स्थापित नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन के राखड़ बांध में संयंत्र के अपशिष्ट जल के प्रवाह से रलिया तथा भिलाई गांव की 150 एकड़ भूमि दलदल हो गई है।
जांजगीर-चांपा जिला 80 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र माना जाता है, जहां नदियों का पानी नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुंचता हैऔर यहां के किसान साल भर में दो फसलें उत्पादन करते हैं। हरियाली से समृध्द ऐसे जिले में सरकार ने एक दो नहीं बल्कि 34 पावर कंपनियों से बिजली उत्पादन संयंत्र लगाने के लिए एमओयू कर लिया। इन कंपनियों द्वारा कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक एक हजार मेगावाट संयंत्र को 400 लाख घनमीटर पानी आदर्श अवस्था में प्रति वर्ष लगता है, लेकिन व्यवहारिक स्थिति में इससे भी ज्यादा पानी का उपयोग होता है। महानदी पर बनाए गए गंगरेल बांध की जलभराव क्षमता 800 लाख घनमीटर है तथा सहायक नदियां पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, अरपा, हसदेव, जोंक, तेल आदि हैं। राज्य सरकार ने पानी की उपलब्धता का गहन अध्य
यन किए बगैर लगभग 20000 लाख घनमीटर पानी उद्योगों को देने का करार कर लिया है। यह आबंटन विगत तीस वर्षों के जल प्रवाह के आंकड़ों के हिसाब से काफी अधिक है।
जिले के नौ विकासखंडों में से डभरा, सक्ती व मालखरौदा में गर्मी के मौसम में जल संकट बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, यहां पर 250 मीटर तक जलस्तर नीचे चला जाता है, जिससे कई हैंडपंप सूख जाते हैं। इन क्षेत्रों की जमीन में शैल निर्मित चट्टानें हैं, जिसके कारण जल का स्तर वैसे भी काफी नीचे होता है। अधिकतर तालाब तेज गर्मी की वजह से सूख ही जाते हैं, तब ग्रामीणों को आसपास बहने वाले नदी के भरोसे रहना पड़ता है। गर्मी के दिनों में वैसे भी आजकल नदियों में दूर दूर तक रेत ही नजर आती है, पानी के नाम पर छोटा सा नाला बहता दिखाई देता है, ग्रामीण नालेनुमा बह रही नदी के जल का उपयोग पीने में भी करते हैं और नहाने में भी। बरसात के मौसम में वर्षा जल से ही नदियों में पानी आता है। लेकिन जब इतनी बड़ी मात्रा में उद्योगों को पानी दे दिया जाएगा, तो आगामी 10 वर्षों में ग्रामीणों का जीना दूभर हो जाएगा और जल संकट से आम जनता को खासी परेशानियां झेलनी पड़ेंगी, यह भी हो सकता है कि बाजार में बिकने वाले पानी के दाम पांच गुने हो जाएं और यह भी संभव है कि पानी की एक एक बूंद के लिए आम जनों को तरसना पड़े। ऐसे हालात पैदा होने से पहले सरकार को चिंतन करना चाहिए कि आम जनता के हितों के हिसाब से कितना औद्योगीकरण जरूरी है। अंधाधुंध औद्योगीकरण से त्रस्त आम जनता ने अब उद्योगों को स्थापित किए जाने का विरोध भी शुरू कर दिया है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश में 19 अप्रेल से ग्राम सुराज अभियान का आगाज हो चुका है। गांवों, गरीबों की समस्याओं की सुध लेने तथा उसे हल करने के लिए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह सहित कई मंत्री, विधायक, सरकारी अधिकारी गांवों में पहुंच रहे हैं, पर इस बार ग्रामीणों के तीखे तेवरों से नेताओं और अधिकारियों को दो चार होना पड़ रहा है। कारण साफ है कि पिछले वर्षों में चलाए गए सुराज अभियान के तहत् मिले आवेदनों, समस्याओं का निपटारा अब तक नहीं हुआ है। अधिकारियों कर्मचारियों ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए हजारों शिकायतें तथा लाखों आवेदन कागजों में निराकृत कर दिए। जाहिर है कि ऐसी खोखली कार्रवाईयों से छत्तीसगढ़ में सुराज तो आने से रहा। केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के मिश्रित अनुदान से चलने वाली कई योजनाओं में वैसे भी भ्रष्टाचार चरम पर है।
प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार के मुखिया डा. रमन सिंह ने तमाम प्रयासों से राज्य के विकास के लिए नए नए प्रयोग किए हैं, मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद राज्य का स्वरूप बदला भी है, लेकिन उतनी ही तेजी से भ्रष्टाचार बढ़ा है और सरकारी मशीनरी की मनमानी भी बढ़ गई है। भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ तमाम शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, वहीं आम जनता के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भी खासा घालमेल है। हालांकि मुख्यमंत्री पर सीधे तौर पर न तो कोई गंभीर आरोप लगे हैं और न ही भ्रष्टाचार के मामले विपक्ष सहित अन्य विरोधी दल उन पर साबित कर सके हैं। वर्ष 2010 के अप्रेल माह में चलाए गए ग्राम सुराज अभियान के तहत् सरकार को 7 लाख 40 हजार 298 आवेदन, शिकायतें मिली थी। जिनमें से 60 प्रतिशत मामलों का कागजों में निराकरण कर दिया गया है। जब पिछले वर्षों के दौरान मिले आवेदनों, शिकायतों का वास्तविकता में निराकरण हुआ ही नहीं, तो दोबारा उन्हीं गांवों में जा रहे नेताओं, अधिकारियों को आक्रोश तो झेलना पड़ेगा ही। कई गांवों में ग्रामीणों ने सुराज अभियान का बहिष्कार करने की ठान ली है। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में तो ग्रामीणों ने अनोखे तरीके से सुराज अभियान का बहिष्कार किया। गांव के सैकड़ों लोगों ने मुंडन कराकर सुराज अभियान की अर्थी निकाल दी। सवाल यह उठता है कि आखिर इस तरह कागजी निराकरण से क्या प्रदेश की समस्याएं खत्म हो जाएंगी, क्या सरकार की मंशा यही है कि समस्याओं का निराकरण इस तरह से हो ? प्रदेश के मुखिया छत्तीसगढ़ में सुराज लाना चाहते हैं और अधिकारी इसमें पलीता लगा रहे हैं तो जाहिर है कि ऐसे में छत्तीसगढ़ प्रदेश की जनता को सुराज का बरसों बरस इंतजार करना पड़ेगा।
ग्राम सुराज अभियान के पहले दिन ही कई सुराज दलों को ग्रामीणों के आक्रोश से दो चार होना पड़ा। बिर्रा क्षेत्र में प्रस्तावित मोजरबेयर पावर कंपनी के प्लांट का विरोध करते हुए सिलादेही के ग्रामीणों ने सुराज दल को स्कूल के अंदर जाने ही नहीं दिया। सुराज दल को रोके जाने की सूचना पर गांव पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को भी कई घंटे बिठाए रखा और सुराज अभियान का बहिष्कार कर दिया।
बम्हनीडीह विकासखंड के गांव सिलादेही के प्राथमिक शाला में सुराज अभियान हेतु ग्रामीणों से बातचीत व शिकायतों के लिए पहले दिन 19 अप्रेल को जैसे ही अधिकारी पहुंचे, सैकड़ों ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया और स्कूल

के अंदर जाने से रोक दिया। सूचना मिलने पर एसडीएम चांपा सी. डी. वर्मा, नायब तहसीलदार बी. एस. कंवर, जनपद पंचायत के सीईओ सी. एस. चंद्रा, थाना प्रभारी उषा सोंधिया गांव पहुंचे। तब कहीं जाकर सुराज दल
को स्कूल के अंदर जाने दिया गया। अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाईश देकर सुराज में हिस्सा लेने के लिए उनकी समस्याएं पूछी तो ग्रामीणों ने दो टूक अपनी मांगें रख दी। ग्रामीणों ने अधिकारियों से साफ तौर पर कहा कि मोजरबेयर पावर प्लांट यहां स्थापित न किया जाए, वहीं सरपंच व उपसरपंच का इस्तीफा स्वीकार किया जाए। अधिकारियों ने पावर प्लांट के मामले को शासन स्तर का बताते हुए ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि वे उनकी बात सरकार तक पहुंचा देंगे। वहीं जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे के संबंध में जानकारी लिए जाने पर पता चला कि सरपंच व उपसरपंच ग्रामीणों के दबाव में आकर इस्तीफा दे रहे हैं।
विदित हो कि बम्हनीडीह विकासखंड के बिर्रा क्षेत्र में मोजरबेयर पावर कंपनी द्वारा 1320 मेगावाट के दो संयंत्र प्रस्तावित हैं। पावर प्लांट की स्थापना के लिए सिलादेही, गतवा तथा बिर्रा की लगभग 1000 एकड़ भूमि अधिग्रहित की जानी है। सिलादेही के ग्रामीणों ने गांव पहुंचने वाले कंपनी प्रबंधन को भी दुर्व्यवहार कर लौटा दिया था, वहीं कंपनी द्वारा स्कूली बच्चों को बस्ता बांटे जाने का विरोध करते हुए हंगामा भी किया था। सैकड़ों की संख्या में कलेक्टोरेट पहुंचकर किसान अपना विरोध जता चुके हैं कि मोजरबेयर पावर कंपनी को वे अपनी जमीन नहीं देना चाहते, लेकिन प्रशासन के अधिकारी इसे आवश्यक अधिग्रहण बता कर प्रक्रिया में लगे हुए हैं। सिलादेही के ग्रामीण हर कदम पर पावर कंपनी का विरोध करने में जुटे हुए हैं। इसी वजह से उन्होंने ग्राम

सुराज अभियान का भी बहिष्कार कर दिया और वहां पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को चार घंटे तक बिठाए रखा लेकिन एक भी आवेदन नहीं दिया।
सबसे बड़ी समस्या पावर कंपनी
सिलादेही के ग्रामीणों का कहना है कि आने वाले दिनों में उनकी सबसे बड़ी समस्या पावर कंपनी की स्थापना किए जाने से होगी। इस क्षेत्र में द्विफसली कृषि भूमि है, अधिकतर किसान सिंचाई सुविधा के चलते यहां साल भर में दो फसलें उपजाते हैं, लेकिन शासन के अधिकारी पावर कंपनी से मिलीभगत के चलते कृषि भूमि को बंजर बताकर प्लांट के लिए देने की तैयारी में हैं। यहां के किसानों की मुख्य आजीविका कृषि ही है। पावर प्लांट को जमीन दिए जाने के बाद किसान कहां जाएंगे ? इसके अलावा उद्य़ोग लगने से प्रदूषण तथा अन्य समस्याएं भी क्षेत्र में पैदा हो जाएंगी।
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