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इन्टरव्यू
कुमार सानू, प्रख्यात गायक।
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0 सिने पार्श्व गायक पद्मश्री कुमार सानू से रतन जैसवानी की बातचीत
जिनकी आवाज में गायकी के मसीहा किशोर कुमार साहब की झलक मिलती है। वह शख्स कुमार सानू हिंदी सिनेमा में आज एक जाना पहचाना नाम हैं। कोलकाता में जन्में कुमार सानू का मूल नाम केदारनाथ भट्टाचार्य है। उनके पिता पशुपति भट्टाचार्य खुद एक अच्छे गायक और संगीतकार थे। उन्होंने ही सानू को गायकी और तबला वादन सिखाया। गायक किशोर दा को अपना आदर्श मानने वाले सानू ने पहले तो उनके गाए हुए गीतों को टी सीरीज कैसेट कंपनी के मालिक गुलषन कुमार की पहल पर अपनी आवाज में गाकर काफी वाहवाही बटोरी, उसके बाद निर्माता, निर्देषक महेश भट्ट की राहुल रॉय व अनु अग्रवाल अभिनीत फिल्म ‘आशिकी‘ के रोमांटिक गानों से एकाएक हिंदी सिनेमा जगत पर छा गए। सन् 2000 में उन्हें ‘हम दिल दे चुके सनम‘ के गीत ‘ आंखों की गुस्ताखियां‘ के लिए अंतर्राष्ट्रीय आईआईएफए अवार्ड भी मिल चुका है। अब तक उन्होंने लगभग 17 हजार गाने हिंदी व बांग्ला फिल्मों में गाए हैं। एक ही दिन में 28 गानों की रिकार्डिंग करने वाले, 2009 में पद्मश्री अवार्ड से नवाजे गए और 5 बार सर्वश्रेष्ठ पुरूष गायक का पुरूस्कार पाने वाले प्रख्यात सिने पार्श्व गायक कुमार सानू ने अपनी जिंदगी के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश इंडस्ट्रीज चांपा के गेस्ट हाउस में रतन जैसवानी से बातचीत की। वे जांजगीर में आयोजित जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव में अपनी प्रस्तुति देने पहुंचे थे।
0 हिंदी फिल्मों में एकाएक किशोर दा जैसी आवाज लोगों के दिलोदिमाग पर छा गई, कैसे हुआ ये सब और आशिकी के पहले कैरियर किस तरह का था ?
00 पारिवारिक माहौल संगीत का था, मां को संगीत में बहुत रूचि थी, बड़ी बहन रेडियो पर गाती थी, पिता शास्त्रीय संगीत के शिक्षक, तो जाहिर है कि मेरे लिए संगीत सीखना बहुत मुश्किल नहीं था, किशोर दा साहब को मैं अपना आदर्श मानता हूं। उन्हीं की गाए हुए काफी गीतों को मैंने टी सीरीज कैसेट के जरिए अपनी आवाज में श्रोताओं तक पहुंचाया। आशिकी के पहले सन् 1989 में जगजीत सिंह साहब ने संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी से मिलवाया और उन्होंने ही मुझे फिल्म ‘जादूगर‘ में गाने का पहला मौका दिया। फिर भट्ट कैंप की फिल्म आशिकी ने मेरे कैरियर को रातोंरात बुलंदी पर पहुंचाया।
0 22 साल के फिल्मी कैरियर की कुछ खास यादें ?
00 दरअसल आशिकी के बाद, साजन, सड़क, फूल और कांटे सहित लगातार कई फिल्मों में गाए गीतों को श्रोताओं का अच्छा प्रतिसाद मिला, लेकिन जिंदगी में दो ऐसे शख्स, जो मेरे लिए मील का पत्थर हैं। एक हैं किशोर दा, जो मेरे गायकी के आदर्श हैं, दूसरे आर. डी. बर्मन साहब, बर्मन दा के लिए मैंने उनकी लयबध्द की हुई आखिरी फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी‘ में कई गीत गाए, लेकिन सबसे खास यह था कि ‘जब मैंने इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा‘ गाया‘ तो बर्मन दा ने मुझे बहुत गालियां दी। मैंने पूछा कि आप मुझे गालियां क्यों दे रहे हैं। तो उनके असिस्टेंट भरतजी ने बताया कि जब बर्मन दा किसी के काम से खुश होते हैं, तो ऐसे ही गालियां देते हैं। जिंदगी का एक सुनहरा मौका मेरे हिस्से में नहीं आया अफसोस मैं किशोर दा से कभी मुलाकात नहीं कर पाया, सचिन देव बर्मन के साथ नहीं गा पाया।
0 आपका एक एलबम आया था ‘नशा‘, उसके बाद क्या हुआ, कुछ और तैयारी है ?
00 अभी तीन नए एलबम पर काम चल रहा है, एक तो संभवतः इसी वेलेंटाईन डे पर रिलीज होगा, उसके बाद दो और एलबम मार्केट में आएंगे। फिलहाल बांग्ला फिल्मों में गाने का दौर चल रहा है।
0 रियलिटी शो के बारे में ......
00 कोई खास नहीं कहना चाहता इस बारे में, रियलिटी शो लोगों को मंच तो दे रहे हैं, लेकिन वर्तमान संगीत के दौर में सुर, ताल, लय खो रही है। रियलिटी शो से कितने लोग गायकी का मकाम हासिल कर पाएंगे, ये बड़ा सवाल है।
0 छत्तीसगढ़ में आपने कई शो किए हैं, कैसा लगता है यहां ?
00 छत्तीसगढ़ में मैंने बिलासपुर, रायपुर में कुछ शो किए हैं, यहां का माहौल काफी अच्छा और सादगीपूर्ण है। मैं भी पड़ोसी राज्य कोलकाता का हूं, तो एक आत्मीयता सी लगती है यहां के माहौल में, बड़ा सुकून मिलता है यहां आकर। मुंबई में कैरियर है, लेकिन शोर-शराबा है, तेज भागती जिंदगी है।
0 वर्तमान में कौन सा संगीतकार आपको प्रभावित कर पाया ?
00 अब तो बहुत से संगीतकार फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। लेकिन ए. आर. रहमान की धुनों में एक अलग सा जादू है। रहमान का काम मुझे प्रभावित करता है।
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बाक्स में
21 बार ‘जैसे‘
सुप्रसिध्द संगीतकार राहुल देव बर्मन के संगीत निर्देशन में बन रही फिल्म 1942 ए लव स्टोरी का सुपरहिट गीत ‘इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा‘ में जैसे शब्द का इस्तेमाल 21 बार हुआ है। बर्मन दा ने कुमार सानू को इस गीत को हिट करने का सुझाव दिया और कहा कि तुम गाने में जैसे शब्द को हर बार अलग अंदाज में गाओगे तो गाना अपने आप ही सुपरहिट हो जाएगा। कुमार सानू ने उनके बताए अनुसार जैसे शब्द को हर बार अलग अंदाज में गाया और गाना सुपरहिट हो गया।
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स्व. राहुल देव बर्मन, संगीतकार
जन्मतिथि- 27 जून 1939
जिसके रोने से पंचम सुर निकलता था और पारंपरिक वाद्य यंत्रों से हटकर नए प्रयोगों का केमिकल लोचा जिनके दिमाग में भरा हुआ था। सुमधुर संगीत की रचना में जिनका कोई सानी आज भी नहीं है, संगीत की ऐसी मसीहाई शख्सियत शायद ही दोबारा इस नश्वर संसार में जन्म लेगी। नाम था आर. डी. यानि राहुल देव बर्मन यानि पंचम दा, मां-पिता ने तो उसका नाम राहुल ही रखा था, लेकिन हीरे की पहचान जौहरी ही कर सकता था, अभिनय के क्षेत्र की जानी-मानी शख्सियत दादा मुनि अशोक कुमार ने उनकी असल पहचान की और उन्हें पंचम का उपनाम दिया। उनका कहना था कि रोते वक्त उनके गले से सरगम का पांचवा सुर ‘प‘ निकलता था।
विश्व के श्रेष्ठतम संगीतकारों में से एक और भारतीय संगीत के लिए अलग ही मुकाम बनाने़ वाले राहुल का जन्म 27 जून 1939 में हुआ था। पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। कलकत्ता में बंगाली परिवार में पैदा हुए राहुल देव के संगीत का चरम 70 के दशक में पूरे यौवन पर था और संगीतकार पिता सचिन देव बर्मन के सानिध्य में वाद्य यंत्रों की समझ और उनका प्रयोग करने की ललक पैदा हुई, उस्ताद अकबर अली खां से उन्होंने सरोद बजाने की तालीम ली। उन्होंने कंघी, कांच के गिलास, टेबल, झाड़ू का प्रयोग करके सुमधुर संगीत की रचना कर डाली। आशा भोंसले और रफी साहब का गाया यादगार गीत ‘‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को‘‘जब भी बजता है, तो आर डी के अनूठे प्रयोगों की याद ताजा हो जाती है। पंचम दा को माउथ आर्गन बजाने का बहुत शौक था, देवानंद अभिनीत फिल्म सोलहवां साल के गीत ‘है अपना दिल तो आवारा‘ में उन्हें आर्गन बजाने का मौका मिला तथा ‘दोस्ती‘ फिल्म के यादगार गीतों में संगीत संयोजन कर रहे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए आर डी ने माउथ आर्गन बजाया।

पिता एस. डी. बर्मन की संगीत रचनाओं में सहयोगी के रूप में कैरियर की शुरूआत करते हुए राहुल ने सन् 1957 में गुरूदत्त की फिल्म प्यासा तथा 1958 में गांगुली बंधु यानि अशोक, किशोर व अनूप कुमार अभिनीत ‘चलती का नाम गाड़ी‘ से अपने सफर की शुरूआत की। उसके बाद सन् 1961 में स्वतंत्र रूप से महमूद की फिल्म ‘छोटे नवाब‘ में राहुल ने संगीत दिया। इसके बावजूद वे अपने पिता के संगीत संयोजन में सहयोगी बने रहे। एस. डी. की अंतिम फिल्म आराधना थी, जिसके संगीत को राहुल ने पूरा किया।
पाश्चात्य संगीत का प्रयोग भी भारतीय फिल्मों में उन्होंने ही किया और दम मारो दम, दुनिया में लोगों को, ओ हसीना जुल्फों वाली, दोस्तों से प्यार किया जैसे गीतों पर युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। 70 के दशक में किशोर कुमार की गायकी, राजेश खन्ना के अभिनय और राहुल देव बर्मन के सुमधुर संगीत ने तो जैसे धूम ही मचा दी थी। कहा जाता है कि राजेश खन्ना के कैरियर को उंचाई तक मुकाम देने में पंचम दा के संगीत का बहुत बड़ा हाथ था। शम्मी कपूर अभिनीत तीसरी मंजिल फिल्म में संगीत देने के लिए जब नासिर हुसैन ने राहुल देव बर्मन को चुना, तो शम्मी नाखुश थे, वे शंकर-जयकिशन को बतौर संगीतकार लिए जाने की सिफारिश करते रहे। पर जब तीसरी मंजिल में मोहम्मद रफी तथा आशा भोंसले के गीतों ने देश भर में धूम मचाई, तब शम्मी को अहसास हुआ पंचम दा की अनोखी प्रतिभा का। उनके जीवन का अहम् मुकाम ‘पड़ोसन फिल्म के साथ भी जुड़ा हुआ है। हास्य रस से भरपूर इस फिल्म के गीत आज भी लोग गुनगुनाते हैं, खास कर ‘मेरे सामने वाली खिड़की में‘। जितना दम उनके पाश्चात्य संगीत से सजे गीतों में होता था, उतनी ही कशिश और गंभीरता गुलजार के गीतों पर दी गए धुनों में भी होती थी। आंधी, किनारा, खूशबू, परिचय, इजाजत जैसी फिल्मों का संगीत अलग ही अहसास दिलाता है।

उनका विवाह 1966 में रीता पटेल से हुआ लेकिन मनमौजी आरडी उनसे 5 साल में ही अलग हो गए और सुरों की मलिका आशा भोंसले से 1980 में शादी कर ली। पंचम दा ने आशा ताई के साथ कई गाने भी गाए। 2 फिल्मों अभिनय व 18 फिल्मों में गाने गाने वाले गुणी संगीतकार पंचम दा के कैरियर में आर्थिक तंगी भी आड़े आती रही, पर वे पूरी तन्मयता के साथ संगीत के क्षेत्र में डटे रहे। शोले, यादों की बारात, खेल खेल में, महबूबा, आपकी कसम, किनारा, कारवां, मासूम, बेताब, सागर जैसी फिल्मों में संगीत देकर कई पुरूस्कार जीते और भारतीय संगीत के मसीहा के रूप में स्थापित हो गए। अपने जीवन का अंतिम संगीत उन्होंने फिल्म 1942-ए लव स्टोरी के लिए दिया और फिल्म रिलीज होने से पहले ही वे 4 जनवरी 1994 को दुनिया छोड़ गए। मौसिकी के ऐसे अभूतपूर्व मसीहा राहुल देव बर्मन को मेरा शत् शत् नमन्।
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